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पारंपरिक छोड़ औषधीय खेती से कमा रहे मुनाफा
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कानपुर देहात। परंपरागत खेती छोड़ कर तुलसी की औषधीय खेती करके मुनाफा कमाने के बाद अब अन्य किसानों को प्रेरित कर रहे हैं। फसलों की वैराइटी को भी ध्यान रखने के लिए कहते हैं। वहीं, औषधीय खेती कर जमीन को उपजाऊ भी बना रहे हैं।
सिकंदरा तहसील क्षेत्र के बैजामऊ निवासी धनंजय सिंह यादव ने बताया कि उन्होंने एमए राजनीति से किया है। जबकि भोगनीपर तहसील क्षेत्र के पटेल महाविद्यालय में प्राइवेट क्लर्क हैं। वर्तमान में दो वर्ष से पुखरायां देहात गांव में रह रहा हूं। बताया कि मेरा परिवार में लोग खेती-किसानी करते रहे हैं। पिता मथुरा प्रसाद यादव आर्मी से बहुत पहले सेवानिवृत्त हो चुके हैं। पारंपरिक खेती तो सभी करते हैं। कुछ अलग तरह खेती करने की सोच उत्पन्न हुई। इसके लिए परिवार की अनुमति भी ली। उनके भाई ताम्रध्वज शिक्षक हैं। जिन्होंने एग्रीकल्चर से बीएससी किया है। उन्होंने औषधीय खेती के लिए प्रेरित किया। पुखरायां देहात गांव के पास ही दुर्गदासपुर गांव के एक पारंपरिक किसान सर्वेंद्र कुमार से बात करके पहले एक बीघे में तुलसी की खेती करने के लिए तैयार किया। 2018 में खेत तैयार करके उसमें गोबर की खाद डाली। पहली बरसात जून के अंतिम सप्ताह और जुलाई के प्रथम सप्ताह में तुलसी के बीज बोए। लगभग जब 20 से 25 दिन का पौधा हो गया तो उसकी निराई करा दी। जिससे खरपतवार का पौधे पर असर न पड़े। तुलसी का पौधा बड़ा हो जाने के बाद खरपतवार को अपने नीचे से स्वयं नष्ट कर देती है। पहली कटिंग सितंबर में पौधे को तीन से चार अंगुल छोड़कर काट लिया। जिसकी कानपुर लेकर जाकर पेराई कराई। जिसमें 25 लीटर तेल निकला। इसकी बिक्री 1200 रुपये प्रति लीटर होने से 30,000 रुपये की आमदनी हुई। इसके बाद लागत मात्र 6,000 रुपये आई। पेराई कराने पर वहां पता चला कि तुलसी की वह प्रजाति मिश्रित है।
तुलसी की रामा और श्यामा प्रजाति बोने से और अधिक फायदा होता है। उसको किसी औषधीय संस्थान को बेचने पर लकड़ी की भी कीमत मिलती है। जिससे और अधिक फायदा होगा। वहीं खेत में छोड़े गए डंठल में फिर पानी लगा दिया और निराई करा दी। दोबारा फिर वही फसल तैयार हो गई। जिसकी पेराई कराने पर फिर 25 लीटर तेल निकला, जो 30,000 रुपये का बिका। लागत 12,000 रुपये निकाल कर कुल 48,000 रुपये का फायदा हुआ। कंपोस्ट खाद का प्रयोग करने से खेत की उत्पादन क्षमता भी बढ़ गई। इसमें इस समय गेहूं की अच्छी फसल है। बताया कि इस बार औषधीय फसल का फायदा मिलने और खेत की मिट्टी उपजाऊ होने से हौसला बढ़ा है। अब तुलसी के साथ ही पांच बीघे में अश्वगंधा की खेती करेंगे। जिसकी पैदावार ऊसर जमीन में अधिक होती है। बाद में जमीन भी उपजाऊ हो जाती है। अश्वगंधा की फसल 18 से 24 महीने की होती है। जिसका सात गुना फायदा होगा। वह स्वयं तो ऐसी औषधीय फसल कंपोस्ट खाद से करेंगे ही, अन्य किसानों को भी प्रेरित कर रहे हैं। ताकि कंपनियां स्वयं आकर खेतों से खरीद कर सकें।
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वर्तमान समय में औषधीय पौधों की मांग बढ़ती ही जा रही है। किसान भी अधिक मुनाफा मिलने के कारण इन पौधों की खेती कर रहे हैं। इनमें तुलसी, अश्वगंधा, स्टीविया, लेमन ग्रास, शतावर और एलोवेरा की खेती प्रमुखता से की जा रही है।
फोटो संख्या 03एकेबीपी19- खेत में खड़ी तुलसी की फसल।
पारंपरिक छोड़ औषधीय खेती से कमा रहे मुनाफा
- तुलसी के साथ अश्वगंधा की भी करेंगे पैदावार
- अन्य किसानों के लिए भी बन रहे प्रेरणा स्रोत
सुनील शुक्ल
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सिकंदरा तहसील क्षेत्र के बैजामऊ निवासी धनंजय सिंह यादव ने बताया कि उन्होंने एमए राजनीति से किया है। जबकि भोगनीपर तहसील क्षेत्र के पटेल महाविद्यालय में प्राइवेट क्लर्क हैं। वर्तमान में दो वर्ष से पुखरायां देहात गांव में रह रहा हूं। बताया कि मेरा परिवार में लोग खेती-किसानी करते रहे हैं। पिता मथुरा प्रसाद यादव आर्मी से बहुत पहले सेवानिवृत्त हो चुके हैं। पारंपरिक खेती तो सभी करते हैं। कुछ अलग तरह खेती करने की सोच उत्पन्न हुई। इसके लिए परिवार की अनुमति भी ली। उनके भाई ताम्रध्वज शिक्षक हैं। जिन्होंने एग्रीकल्चर से बीएससी किया है। उन्होंने औषधीय खेती के लिए प्रेरित किया। पुखरायां देहात गांव के पास ही दुर्गदासपुर गांव के एक पारंपरिक किसान सर्वेंद्र कुमार से बात करके पहले एक बीघे में तुलसी की खेती करने के लिए तैयार किया। 2018 में खेत तैयार करके उसमें गोबर की खाद डाली। पहली बरसात जून के अंतिम सप्ताह और जुलाई के प्रथम सप्ताह में तुलसी के बीज बोए। लगभग जब 20 से 25 दिन का पौधा हो गया तो उसकी निराई करा दी। जिससे खरपतवार का पौधे पर असर न पड़े। तुलसी का पौधा बड़ा हो जाने के बाद खरपतवार को अपने नीचे से स्वयं नष्ट कर देती है। पहली कटिंग सितंबर में पौधे को तीन से चार अंगुल छोड़कर काट लिया। जिसकी कानपुर लेकर जाकर पेराई कराई। जिसमें 25 लीटर तेल निकला। इसकी बिक्री 1200 रुपये प्रति लीटर होने से 30,000 रुपये की आमदनी हुई। इसके बाद लागत मात्र 6,000 रुपये आई। पेराई कराने पर वहां पता चला कि तुलसी की वह प्रजाति मिश्रित है।
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तुलसी की रामा और श्यामा प्रजाति बोने से और अधिक फायदा होता है। उसको किसी औषधीय संस्थान को बेचने पर लकड़ी की भी कीमत मिलती है। जिससे और अधिक फायदा होगा। वहीं खेत में छोड़े गए डंठल में फिर पानी लगा दिया और निराई करा दी। दोबारा फिर वही फसल तैयार हो गई। जिसकी पेराई कराने पर फिर 25 लीटर तेल निकला, जो 30,000 रुपये का बिका। लागत 12,000 रुपये निकाल कर कुल 48,000 रुपये का फायदा हुआ। कंपोस्ट खाद का प्रयोग करने से खेत की उत्पादन क्षमता भी बढ़ गई। इसमें इस समय गेहूं की अच्छी फसल है। बताया कि इस बार औषधीय फसल का फायदा मिलने और खेत की मिट्टी उपजाऊ होने से हौसला बढ़ा है। अब तुलसी के साथ ही पांच बीघे में अश्वगंधा की खेती करेंगे। जिसकी पैदावार ऊसर जमीन में अधिक होती है। बाद में जमीन भी उपजाऊ हो जाती है। अश्वगंधा की फसल 18 से 24 महीने की होती है। जिसका सात गुना फायदा होगा। वह स्वयं तो ऐसी औषधीय फसल कंपोस्ट खाद से करेंगे ही, अन्य किसानों को भी प्रेरित कर रहे हैं। ताकि कंपनियां स्वयं आकर खेतों से खरीद कर सकें।
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वर्तमान समय में औषधीय पौधों की मांग बढ़ती ही जा रही है। किसान भी अधिक मुनाफा मिलने के कारण इन पौधों की खेती कर रहे हैं। इनमें तुलसी, अश्वगंधा, स्टीविया, लेमन ग्रास, शतावर और एलोवेरा की खेती प्रमुखता से की जा रही है।
फोटो संख्या 03एकेबीपी19- खेत में खड़ी तुलसी की फसल।
पारंपरिक छोड़ औषधीय खेती से कमा रहे मुनाफा
- तुलसी के साथ अश्वगंधा की भी करेंगे पैदावार
- अन्य किसानों के लिए भी बन रहे प्रेरणा स्रोत
सुनील शुक्ल