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समाजवादी गढ़ को बचाने की चुनौती
अमर उजाला ब्यूराो/कन्नौज
Updated Sun, 15 Jan 2017 10:03 PM IST
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सपा में घमासान
- फोटो : सोशल मीडिया
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समाजवादी पार्टी के बिखरने के इंतजार में बैठे मुख्य विपक्षी दल बसपा, भाजपा ने तीनों विधानसभा क्षेत्रों में घेराबंदी शुरू कर दी है। पिता-पुत्र के आमने-सामने आने से समाजवादी गढ़ कहे जाने वाले कन्नौज को बचाने की सबसे बड़ी चुनौती होगी। सिंबल सीज होने की स्थिति में अखिलेश टीम के प्रत्याशियों की मुश्किलें बढ़ेंगी और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को इस क्षेत्र को बचाने की सबसे बड़ी चुनौती होगी। पिछले कई दशकों से यह क्षेत्र समाजवादी गढ़ रहा है।
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वर्ष 1999 के उप चुनाव से अखिलेश यादव ने कन्नौज से ही राजनीति में इंट्री की थी। पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के सीट छोड़ने पर वह कन्नौज से चुनाव लड़े थे। अखिलेश यादव आस्ट्रेलिया से पढ़ाई पूरी कर लौटे थे। मीडिया से मुखातिब होने के दौरान जब वह बीच में अटके तो मीडिया के सवालों के जवाब मुलायम सिंह यादव ने दिए। 1996 से समाजवादी पार्टी कन्नौज सदर में जीतती आई है। तिर्वा विधानसभा क्षेत्र के परिणाम कुछ अलग रहे हैं।
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इस विधानसभा में सपा वर्ष 2007 का चुनाव हारी है। तब बसपा ने यह सीट छीन ली थी। छिबरामऊ में सपा का दबदबा कायम है। वर्ष 2002 में यह सीट भाजपा के खाते में भी जा चुकी है। अभी तक मुलायम व अखिलेश दोनों की लिस्ट में तीनों प्रत्याशी एक ही हैं। किसी तरह का बदलाव नहीं हुआ। यदि मुलायम प्लान बी के तहत मैदान में आए तो नए प्रत्याशी भी सामने आ सकते हैं। ऐसे में पिता-पुत्र के आमने-सामने आने से चुनावी गणित बिगड़ने की आशंका है।
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रूठों को न मनाया गया तो बिगाड़ेंगे काम
समाजवादी पार्टी में तीनों विधानसभा क्षेत्रों में टिकट के लिए काफी अर्से से दावेदारी कर रहे लोगों के हाथ निराशा हाथ लगी है। टिकट की चाहत वाले नेता किसी के पक्ष में खुलकर सामने नहीं आ रहे हैं। इनकी भितरघात से पार्टी को काफी बड़ा नुकसान हो सकता है।