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‘बिना भय के नहीं होती प्रीति’
ब्यूूराे/अमर उजाला, कन्नौज
Updated Sat, 30 Jan 2016 12:14 AM IST
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क्षेत्र के गांव लाड़पुर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा
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के पांचवें दिन भागवत कथा को सुनने के लिए आसपास क्षेत्रों से बड़ी संख्या
में महिलाओं और पुरुषों की भीड़ उमड़ पड़ी। इस दौरान कथावाचक ने उनको कथा
का रसपान कराया।
आचार्य सुखलेस शास्त्री ने श्रद्धालुओं को बताया कि बिना भय के प्रीति नहीं होती है। रामचरित मानस के अनुसार, जब रामचंद्र हनुमान के बताने के बाद लंका पर चढ़ाई करने गए तो समुद्र के उस पार बसी लंका नगरी में जाने के लिए रास्ता न होने पर समुद्र की प्रार्थना की, पर कई दिनों के बाद भी जब समुद्र द्वारा रास्ता नहीं दिया गया, तब भगवान श्रीराम ने क्रोधवस होकर समुद्र को सुखाने को अग्निबाण का प्रयोग किया।
अग्निबाण का प्रयोग होते देख समुद्र देवता भगवान श्रीराम के सामने आए और क्षमा प्रार्थना कर उनसे कहा कि नल नील द्वारा राम लिखकर पत्थर समुद्र में डाले जाएं तो पत्थर पानी में तैरने लगेंगे। जिसके बाद समुद्र पर सेतु का निर्माण हुआ। यही नहीं भक्त भगवान को विपत्ति के समय याद करते हैं। जिसके लिए लिखा गया है कि दु:ख में सुमरन सब करैं, सुख मैं करैं न कोय, सुख मैं सुमरन जो करै तो दुख काहे का होय।
आचार्य सुखलेस शास्त्री ने श्रद्धालुओं को बताया कि बिना भय के प्रीति नहीं होती है। रामचरित मानस के अनुसार, जब रामचंद्र हनुमान के बताने के बाद लंका पर चढ़ाई करने गए तो समुद्र के उस पार बसी लंका नगरी में जाने के लिए रास्ता न होने पर समुद्र की प्रार्थना की, पर कई दिनों के बाद भी जब समुद्र द्वारा रास्ता नहीं दिया गया, तब भगवान श्रीराम ने क्रोधवस होकर समुद्र को सुखाने को अग्निबाण का प्रयोग किया।
अग्निबाण का प्रयोग होते देख समुद्र देवता भगवान श्रीराम के सामने आए और क्षमा प्रार्थना कर उनसे कहा कि नल नील द्वारा राम लिखकर पत्थर समुद्र में डाले जाएं तो पत्थर पानी में तैरने लगेंगे। जिसके बाद समुद्र पर सेतु का निर्माण हुआ। यही नहीं भक्त भगवान को विपत्ति के समय याद करते हैं। जिसके लिए लिखा गया है कि दु:ख में सुमरन सब करैं, सुख मैं करैं न कोय, सुख मैं सुमरन जो करै तो दुख काहे का होय।