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‘सद्गुरु संगत से दूर होते दुख’

Tue, 03 Nov 2015 12:16 AM IST
ब्यूूराे/अमर उजाला, कन्नौज
ब्यूूराे/अमर उजाला, कन्नौज Updated Tue, 03 Nov 2015 12:16 AM IST
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" The master has suffered from consistent '

पूर्वी बाईपास स्थित संत निरंकारी भवन में आयोजित

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सत्संग में प्रवचन करते हुए महात्मा नरेशचंद्र वर्मा ने कहा कि संत हो या सन्यासी, ज्ञानी हो या अज्ञानी, दुख सभी के जीवन में आता है। फर्क इतना है कि ज्ञानी अपने ज्ञान का सहारा लेकर दुख से मुक्ति पा लेता है जबकि अज्ञानी को दुख निपटा देता है।

उन्होंने कहा कि केवल सद्गुरु की संगत से ही दुख दूर हो सकते हैं। उन्होंने हा कि सद्गुरु का स्मरण करते रहने से संत कभी दुखी नहीं होते। इसी तरह जब हम सद्गुरु की शरण में होते हैं, तब दुख हमसे कोसों दूर रहता है। जब हम परमात्मा रूपी सद्गुरु को भूल जाते हैं, तब हमें दुख घेर लेते हैं।

कहा कि दुनिया में अमीर हो या गरीब समस्या सभी के सामने हैं। गरीब की समस्या है भूख लगे तो क्या खाए और अमीर की समस्या है क्या खाए जो भूख लगे। मानव जितना प्रेम रुपये से करता है, उतना प्रभु से नहीं करता, इसलिए उसके मन में भटकाव रहता है।

कहा कि जो भक्त सद्गुरु की शरण में चले जाते हैं उनका उद्धार हो जाता है। कहा कि तुम्हारी वजह से किसी की आंख में आंसू आएं तो यह सबसे बड़ा पाप है। कहा कि जिंदगी में कुछ ऐसा काम करो कि मरने के बाद लोग तुम्हारे लिए रोएं। यही सबसे बड़ा पुण्य है। संत कुछ मांगने नहीं, बल्कि कुछ देने आते हैं।

संतों का आना सौभाग्य की बात होती है, क्योंकि वह तो बहती नदी के जल की भांति होते हैं जिनका न तो कोई ठिकाना होता है और न ही कोई बेगाना होता है।

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