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रिसर्च के क्षेत्र में आगे बढ़े स्टूडेंट्स-डीजीएमई

Sat, 19 Sep 2015 12:10 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो कन्नौज
अमर उजाला ब्यूरो कन्नौज Updated Sat, 19 Sep 2015 12:10 AM IST
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students go for Research -DGME
राजकीय मेडिकल कालेज के आडीटोरियम हाल में शुक्रवार सुबह चिकित्सा शिक्षा के महानिदेशक डा. वीएन त्रिपाठी ने सेमिनार का उद्घाटन किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि कन्नौज मेडिकल कालेज में आयोजित इस सेमिनार के जरिए इसकी ख्याति पूरे देश में फैलेगी। इसका संदेश दूर-दूर तक मेडिकल स्टूडेंट्स में पहुंचेगा।
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इससे यहां पढ़ने वाले छात्रों का ज्ञान के साथ मनोबल भी बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि स्टूडेंट्स सेमिनार के जरिए अपना ज्ञान बढ़ाएं। रिसर्च के क्षेत्र में आगे बढ़ें। इसके बाद उन्होंने प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा अनूप पांडेय का मैसेज स्टूडेंट्स को सुनाया।
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कार्यक्रम के दौरान डीजीएमई ने पीजीआई सैफई से आए डा. पंकज जैन, बीएचयू मेडिकल कालेज के मानसिक रोग विशेषज्ञ डा. एससी तिवारी को शाल व प्रतीक चिन्ह भेंटकर सम्मानित किया। मेडिकल कालेज के प्राचार्य डा. डीएस मारतोलिया ने ईएनटी के एचओडी डा. संदीप कौशिक व डा. आशा अग्रवाल को प्रतीक चिन्ह और शाल भेंट किया।
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60 फीसदी लोग मानसिक रोगों के शिकार
तिर्वा। आडीटोरियम हाल में केजीएमयू लखनऊ के मानसिक रोग विशेषज्ञ डा. एससी तिवारी ने मेंटल हेल्थ केयर पर प्रकाश डाला। इस दौरान उन्होंने फिजिकल हेल्थ और मेंटली हेल्थ के अंतर को समझाया। उन्होंने बताया कि देश में प्रति लाख आबादी पर 60.5 फीसदी लोग मानसिक रोग से ग्रस्त हैं।

यूपी में यह आंकड़ा 9.9 फीसदी प्रति लाख है। इन मरीजों का उपचार करने के लिए प्रदेश भर में 1660 मानसिक रोग डाक्टरों की जरूरत है। इसकी अपेक्षा महज 280 मानसिक रोग डाक्टर प्रदेश भर के सरकारी अस्पतालों में काम कर रहे हैं। प्रदेश भर में महज 17 मानसिक रोग अस्पताल हैं। प्रदेश के 70 फीसदी बड़े नगरों में मानसिक रोगों के अस्पताल नहीं हैं। 10 फीसदी मानसिक रोगियों का उपचार मानसिक अस्पतालों में और 30 फीसदी मानसिक रोगियों का उपचार मेडिकल कालेजों में चल रहा है। शेष प्राइवेट अस्पतालों की मदद ले रहे हैं।

हर साल रैबीज से मर रहे 20 हजार लोग
तिर्वा। कार्यशाला में पीजीआई सैफई के डा. पंकज जैन ने रैजीब के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि रैबीज से प्रभावित मरीजों का जीवन बचा पाना असंभव है। रैबीज एक जानवर से लार्वा के जरिए दूसरे जानवर में पहुंचता है। यह कुत्ता, बिल्ली, बकरी, लोमड़ी, हाथी, घोड़ा, सुअर, गदहा व बंदर जैसे जानवरों के काटने से इसका वायरस मनुष्य के शरीर में प्रवेश करता है। रैबीज के 96 फीसदी केस कुत्तों के काटने से होते हैं।

 शेष चार से पांच फीसदी बिल्ली, बंदर आदि के काटने से होते हैं। इसका वायरस सीधे ब्रेन में पहुंचता है और शारीरिक क्रियायें प्रभावति होती है। अंतत: पीड़ित की मौत हो जाती है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2014-15 के दौरान देश भर में 20 हजार लोगों की मौत रैबीज से हुई है। उन्होंने बताया कि यदि कोई मरीज डाक्टर के पास आए तो सबसे पहले काटे जाने वाले स्थान पर करीब 15 मिनट तक पानी डालकर डिटर्जेंट सोप से घाव को साफ करें। इसके बाद मरीज से पूछना चाहिए कि किस समय कैसे कुत्ते ने काटा है। यदि मरीज जानकारी दे कि उसे जीभ से लार बहाने वाले कुत्ते ने काटा है तो तत्काल एंटी रैबीज इंजेक्शन लगाएं।

दिल की बीमारियों की दी जानकारी
तिर्वा। एलटी थिएटर हाल में जीएसवीएम मेडिकल कालेज के डा. आनंद कुमार ने स्टूडेंट्स को हृदय संबंधी बीमारियों के बारे में जानकारियां दीं। उन्होंने रबर के पुतले के जरिए स्टूडेंट्स को समझाया कि किस तरह से हार्ट अटैक पड़ने पर मरीज के हार्ट को पंप किया जा सकता है। हृदय रोग के बचाव से संबंधित भी उन्होंने कई जानकारियां व सुझाव दिए। वर्कशाप के दौरान उन्होंने मेडिकल स्टूडेंट्स से सवाल पूछे।


 इसके बाद बेसिक हेल्थ पर बीएचयू मेडिकल कालेज वाराणसी के डा. हरीशंकर, डा. सीमा निगम के साथ जीएसवीएम मेडिकल कालेज कानपुर के डा. अंबरीश गुप्ता ने क्षय रोग से संबंधित बीमारियों के बारे में मेडिकल स्टूडेंट्स को विस्तार से जानकारियां दीं।
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