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भागवत कथा से मिलती मुक्ति
ब्यूूराे/अमर उजाला, कन्नौज
Updated Tue, 03 Nov 2015 12:14 AM IST
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नगर के मोहल्ला इंदिरानगर मंशा देवी मंदिर मार्ग पर
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चल रही श्रीमद्भागवत कथा का वर्णन करते हुए आचार्य पंडित रजनीश अग्निहोत्री
ने कहा कि कलियुग में भगवान का स्मरण करने और श्रीमद्भागवत कथा के श्रवण
मात्र से ही कल्याण हो जाता और व्यक्ति को मुक्ति मिल जाती है।
उन्होंने कहा कि भगवान का संकीर्तन समस्त पापों का नाश करता है। उन्होंने कहा कि आनंद तो तुम्हारा अपना स्वरूप है, तुम अपने मन को मथ कर उसे उसी तरह पा सकते हो, जैसे दूध को मथ कर मक्खन प्राप्त किया जाता है। उन्होंने कहा कि कृष्ण तो परिपूर्ण आनंद का स्वरूप हैं, जबकि ईश्वर अंश जीवात्मा आपूर्ण है।
कहा कि मनुष्य में ज्ञान आता है पर स्थायी नहीं होता, जिसका ज्ञान टिकता है उसे ही सच्चा आनंद मिलता है। जीव तब तक परिपूर्ण नहीं होता जब तक उसे शांति नहीं मिलती। कहा कि संसार का हर पदार्थ विनाशी होने के कारण परिपूर्ण नहीं है, इसलिए जो भगवान के सानिध्य में जाकर उन्हें पहचान लेता है, वह परिपूर्ण हो जाता है।
उन्होंने कहा कि जीवन की व्यथाओं से दुखी मनुष्य को भगवत शास्त्र में प्रेरणा मिलती है। उसे भगवत भजन के लिए जंगल में जाने की जरूरत नहीं है। वह नित्य कर्म करते हुए भी भगवान की पूजा अर्चना कर सकता है। भक्ति केवल मंदिर में ही नहीं, बल्कि जहां बैठो वहीं हो सकती है।
भगवान की शरण में जाने वाला जीव निर्भय होने के साथ सांसारिक दुखों से भी मुक्त हो जाता है। आचार्य ने भगवान कृष्ण के जन्म की लीला के प्रसंग का विस्तार से वर्णन किया। इस दौरान रमेशचंद्र चतुर्वेदी, शीतला चतुर्वेदी, जवाहरलाल, सुभाषचंद्र, दीक्षांत, हिमांक, दिव्यांशी, पलक, शुभम, राजकिशोर, नवीन चतुर्वेदी आदि मौजूद थे।
उन्होंने कहा कि भगवान का संकीर्तन समस्त पापों का नाश करता है। उन्होंने कहा कि आनंद तो तुम्हारा अपना स्वरूप है, तुम अपने मन को मथ कर उसे उसी तरह पा सकते हो, जैसे दूध को मथ कर मक्खन प्राप्त किया जाता है। उन्होंने कहा कि कृष्ण तो परिपूर्ण आनंद का स्वरूप हैं, जबकि ईश्वर अंश जीवात्मा आपूर्ण है।
कहा कि मनुष्य में ज्ञान आता है पर स्थायी नहीं होता, जिसका ज्ञान टिकता है उसे ही सच्चा आनंद मिलता है। जीव तब तक परिपूर्ण नहीं होता जब तक उसे शांति नहीं मिलती। कहा कि संसार का हर पदार्थ विनाशी होने के कारण परिपूर्ण नहीं है, इसलिए जो भगवान के सानिध्य में जाकर उन्हें पहचान लेता है, वह परिपूर्ण हो जाता है।
उन्होंने कहा कि जीवन की व्यथाओं से दुखी मनुष्य को भगवत शास्त्र में प्रेरणा मिलती है। उसे भगवत भजन के लिए जंगल में जाने की जरूरत नहीं है। वह नित्य कर्म करते हुए भी भगवान की पूजा अर्चना कर सकता है। भक्ति केवल मंदिर में ही नहीं, बल्कि जहां बैठो वहीं हो सकती है।
भगवान की शरण में जाने वाला जीव निर्भय होने के साथ सांसारिक दुखों से भी मुक्त हो जाता है। आचार्य ने भगवान कृष्ण के जन्म की लीला के प्रसंग का विस्तार से वर्णन किया। इस दौरान रमेशचंद्र चतुर्वेदी, शीतला चतुर्वेदी, जवाहरलाल, सुभाषचंद्र, दीक्षांत, हिमांक, दिव्यांशी, पलक, शुभम, राजकिशोर, नवीन चतुर्वेदी आदि मौजूद थे।