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एग्रीकल्चर मार्केटिंग हब की दुकानों पर ग्रामीणों का कब्जा
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सौरिख (कन्नौज)। क्षेत्र के किसानों की कृषि उपज बेचने बनाया गया एग्रीकल्चर मार्केटिंग हब (मंडी) सात वर्ष से बंद पड़ा है। दुकानों पर ग्रामीणों ने कब्जा कर भूसा भर रखा है। परिसर में लगे शेड की टिन नशेड़ी बेच रहे हैं। किसानों को उपज बेचने के लिए दूसरी मंडियों में जाना पड़ रहा है।
मंडी परिषद ने सात वर्ष पहले 73.63 लाख से एग्रीकल्चर मार्केटिंग हब का निर्माण कराया था। वर्ष 2013 और 14 में किसानों की कृषि उपज की खरीद की गई। इसके बाद से खरीद बंद है। अब एग्रीकल्चर मार्केटिंग हब अराजकतत्वों और नशेड़ियों का अड्डा बन गया है। कुछ ग्रामीणों ने दुकानों में कब कर भूसा भरवा दिया है। नशेड़ी शेड की टिन खोलकर बेच रहे हैं। ग्रामीणों ने डीएम राकेश कुमार मिश्र से हब को चालू कराने की मांग की है।
रसूलपुर गांव के किसान दरबारीलाल ने कहा कि दो साल एग्रीकल्चर मार्केटिंग हब में फसल बेची तो लोडर वाहन का भाड़ा बच गया। अब उपज दूसरी मंडियों में ले जाने में काफी भाड़ा लग जाता है। हब चालू हो जाए तो किसानों को फायदा हो जाए
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12 गांवों को हो रहा था फायदा
एग्रीकल्चर मार्केटिंग हब बनने से ग्राम रसूलपुर सहित, सकरावा, दौलताबाद, वीरपुर, कुठिला, सरवाई, गुदानी, ईजलपुर, नगला सहोरा, परौर, जसमेडी, बंधा नगरिया, किर्राना, सलेमपुर, सुल्तानपुर, कांकरपुर आदि गांवों के किसानों फसल बेचने में सहूलियत थी।
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मंडी परिषद ने सात वर्ष पहले 73.63 लाख से एग्रीकल्चर मार्केटिंग हब का निर्माण कराया था। वर्ष 2013 और 14 में किसानों की कृषि उपज की खरीद की गई। इसके बाद से खरीद बंद है। अब एग्रीकल्चर मार्केटिंग हब अराजकतत्वों और नशेड़ियों का अड्डा बन गया है। कुछ ग्रामीणों ने दुकानों में कब कर भूसा भरवा दिया है। नशेड़ी शेड की टिन खोलकर बेच रहे हैं। ग्रामीणों ने डीएम राकेश कुमार मिश्र से हब को चालू कराने की मांग की है।
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रसूलपुर गांव के किसान दरबारीलाल ने कहा कि दो साल एग्रीकल्चर मार्केटिंग हब में फसल बेची तो लोडर वाहन का भाड़ा बच गया। अब उपज दूसरी मंडियों में ले जाने में काफी भाड़ा लग जाता है। हब चालू हो जाए तो किसानों को फायदा हो जाए
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12 गांवों को हो रहा था फायदा
एग्रीकल्चर मार्केटिंग हब बनने से ग्राम रसूलपुर सहित, सकरावा, दौलताबाद, वीरपुर, कुठिला, सरवाई, गुदानी, ईजलपुर, नगला सहोरा, परौर, जसमेडी, बंधा नगरिया, किर्राना, सलेमपुर, सुल्तानपुर, कांकरपुर आदि गांवों के किसानों फसल बेचने में सहूलियत थी।