{"_id":"72ccdf40f5bf5a767d0c11d428215444","slug":"model-schools-project-incomplete-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"मॉडल स्कूलों में शिक्षा का सपना अधूरा ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मॉडल स्कूलों में शिक्षा का सपना अधूरा
अमर उजाला कन्नाैैज
Updated Sun, 31 May 2015 11:51 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जिले में करीब आठ करोड़ की लागत से बने तीन माडल स्कूलों में इस साल भी शैक्षणिक सत्र शुरू नहीं हो सका है। ऐसे में अपने बच्चों को सीबीएसई बोर्ड की शिक्षा दिलाने की आस लगाए बैठे अभिभावकों के सपनों पर पानी फिर गया है। वहीं अफसरों का कहना है कि टीचिंग स्टाफ की नियुक्ति न हो पाने के कारण इस साल सत्र शुरू होने के आसार नहीं हैं।
राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के तहत वित्तीय वर्ष 2010-11 में जनपद के सदर विकास खंड क्षेत्र के गांव गंगधरापुर, जलालाबाद ब्लाक के गांव फतेहपुर जसोदा और तालग्राम ब्लाक में बिरौली ग्राम पंचायत में माडल स्कूल भवन निर्माण को मंजूरी मिली थी। करीब तीन करोड़ रुपये की लागत से एक माडल स्कूल तैयार हुआ।
उप्र प्रोजेक्ट कारपोरेशन लिमिटेड ने गंगधरापुर और फतेहपुर जसोदा के माडल स्कूल भवन की बिल्डिंग डीआईओएस कार्यालय के हैंडओवर कर दी। वहीं बिरौली का माडल स्कूल भी बनकर लगभग तैयार है। इसकी इमारत भी जून तक हैंडओवर हो जाएगी।
विज्ञापन
अप्रैल 2015 में शैक्षणिक सत्र शुरू करने का दावा करने वाली प्रदेश सरकार ने अभी तक इन मॉडल स्कूलों में प्रिसिंपल, टीचर व अन्य स्टाफ की तैनाती नहीं की है। छात्र-छात्राओं के बैठने के लिए और कार्यालय में कामकाज के लिए कुर्सी, मेज, अलमारी आदि फर्नीचर का भी इंतजाम नहीं हो सका है। इस कारण इन माडल स्कूलों में कक्षा 6 से 12 तक की शिक्षा सीबीएसई बोर्ड की तर्ज पर पाने का सपना संजोए बच्चों की उम्मीदों पर पानी फिर गया है।
कई अभिभावकों ने तो अपने बच्चों का दूसरे स्कूलों में दाखिला भी नहीं कराया। उन्हें भरोसा था कि अप्रैल अंत तक या मई में माडल स्कूल में पढ़ाई-लिखाई शुरू हो जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सभासद श्याम तिवारी कहते हैं कि माडल स्कूल लापरवाही की भेंट चढ़ गए हैं। आला अफसरों, सांसद और विधायकों को दखल देकर मॉडल स्कूल बनने का लाभ जनता तक पहुंचाने के लिए प्रयास करना चाहिए।
केंद्र सरकार ने माडल स्कूलों की योजना को अपनी प्राथमिकता से अलग कर दिया है। इस कारण टीचिंग स्टाफ की नियुक्ति नहीं हो सकी है। फिलहाल इस सत्र में माडल स्कूल संचालित होने के आसार नहीं हैं। अब इन माडल स्कूल भवनों का क्या होगा। इसका फैसला सरकार को लेना है। जिला प्रशासन के स्तर से इस संबंध में उचित लिखापढ़ी की जा चुकी है। माडल स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई चालू न हो पाने के लिए वे जिम्मेदार नहीं हैं।
-चंद्रजीत सिंह यादव, डीआईओएस, कन्नौज।
सरकार बदलते ही बदलीं प्राथमिकताएं
माडल स्कूल का संचालन शुरू न हो पाने का सबसे बड़ा कारण सत्ता परिवर्तन है। सरकार बदलने के साथ उसकी प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। डीआईओएस कार्यालय के मुताबिक यह योजना कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में शुरू हुई थी। अब बीजेपी सरकारी प्राथमिकताओं वाले बिंदुओं से इस योजना को हटा दिया गया है।
इस कारण राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के तहत प्रधानाचार्य व टीचर्स की भर्ती नहीं हो पा रही है। डीआईओएस कहते हैं कि सीबीएसई के मानकों के अनुरूप टीचर उपलब्ध ही नहीं हैं। केंद्र सरकार की और से स्टाफ चयन प्रक्रिया ही नहीं शुरू की जा रही है। जब तक स्टाफ नहीं होगा तब तक स्कूल संचालन शुरू नहीं हो सकेगा।
विज्ञापन
राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के तहत वित्तीय वर्ष 2010-11 में जनपद के सदर विकास खंड क्षेत्र के गांव गंगधरापुर, जलालाबाद ब्लाक के गांव फतेहपुर जसोदा और तालग्राम ब्लाक में बिरौली ग्राम पंचायत में माडल स्कूल भवन निर्माण को मंजूरी मिली थी। करीब तीन करोड़ रुपये की लागत से एक माडल स्कूल तैयार हुआ।
विज्ञापन
उप्र प्रोजेक्ट कारपोरेशन लिमिटेड ने गंगधरापुर और फतेहपुर जसोदा के माडल स्कूल भवन की बिल्डिंग डीआईओएस कार्यालय के हैंडओवर कर दी। वहीं बिरौली का माडल स्कूल भी बनकर लगभग तैयार है। इसकी इमारत भी जून तक हैंडओवर हो जाएगी।
विज्ञापन
अप्रैल 2015 में शैक्षणिक सत्र शुरू करने का दावा करने वाली प्रदेश सरकार ने अभी तक इन मॉडल स्कूलों में प्रिसिंपल, टीचर व अन्य स्टाफ की तैनाती नहीं की है। छात्र-छात्राओं के बैठने के लिए और कार्यालय में कामकाज के लिए कुर्सी, मेज, अलमारी आदि फर्नीचर का भी इंतजाम नहीं हो सका है। इस कारण इन माडल स्कूलों में कक्षा 6 से 12 तक की शिक्षा सीबीएसई बोर्ड की तर्ज पर पाने का सपना संजोए बच्चों की उम्मीदों पर पानी फिर गया है।
कई अभिभावकों ने तो अपने बच्चों का दूसरे स्कूलों में दाखिला भी नहीं कराया। उन्हें भरोसा था कि अप्रैल अंत तक या मई में माडल स्कूल में पढ़ाई-लिखाई शुरू हो जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सभासद श्याम तिवारी कहते हैं कि माडल स्कूल लापरवाही की भेंट चढ़ गए हैं। आला अफसरों, सांसद और विधायकों को दखल देकर मॉडल स्कूल बनने का लाभ जनता तक पहुंचाने के लिए प्रयास करना चाहिए।
केंद्र सरकार ने माडल स्कूलों की योजना को अपनी प्राथमिकता से अलग कर दिया है। इस कारण टीचिंग स्टाफ की नियुक्ति नहीं हो सकी है। फिलहाल इस सत्र में माडल स्कूल संचालित होने के आसार नहीं हैं। अब इन माडल स्कूल भवनों का क्या होगा। इसका फैसला सरकार को लेना है। जिला प्रशासन के स्तर से इस संबंध में उचित लिखापढ़ी की जा चुकी है। माडल स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई चालू न हो पाने के लिए वे जिम्मेदार नहीं हैं।
-चंद्रजीत सिंह यादव, डीआईओएस, कन्नौज।
सरकार बदलते ही बदलीं प्राथमिकताएं
माडल स्कूल का संचालन शुरू न हो पाने का सबसे बड़ा कारण सत्ता परिवर्तन है। सरकार बदलने के साथ उसकी प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। डीआईओएस कार्यालय के मुताबिक यह योजना कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में शुरू हुई थी। अब बीजेपी सरकारी प्राथमिकताओं वाले बिंदुओं से इस योजना को हटा दिया गया है।
इस कारण राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के तहत प्रधानाचार्य व टीचर्स की भर्ती नहीं हो पा रही है। डीआईओएस कहते हैं कि सीबीएसई के मानकों के अनुरूप टीचर उपलब्ध ही नहीं हैं। केंद्र सरकार की और से स्टाफ चयन प्रक्रिया ही नहीं शुरू की जा रही है। जब तक स्टाफ नहीं होगा तब तक स्कूल संचालन शुरू नहीं हो सकेगा।