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कन्नौज में बिछी थी शतरंज की पहली बिसात

Thu, 10 Oct 2019 12:51 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Thu, 10 Oct 2019 12:51 AM IST
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kannauj mein bichhee thee shataranj kee pahalee bisaat
पक्की मिट्टी के बने गजारोही, अश्वरोही और पैदल योद्धा। - फोटो : KANNAUJ
कन्नौज। इत्र की नगरी का इतिहास जानने के लिए 50 देशों के प्रतिनिधियों का दल आएगा। दो दिवसीय सेमिनार का आयोजन कर कन्नौज के इतिहास की जानकारी दी जाएगी। बताया जाएगा कि विश्वस्तरीय खेल शतरंज की पहली बिसात कन्नौज में बिछी थी। कन्नौज के गौरव के साथ शतरंज की खोज का एक और अध्याय जुड़ने की इस ऐतिहासिक जानकारी को दुनिया के सामने रखने के लिए 27 और 28 फरवरी 2020 को दो दिवसीय सेमिनार का आयोजन होने जा रहा है। यह आयोजन जर्मनी की संस्था चैरिटी ट्रस्ट चेस हिस्ट्रोरिकल रिसर्च की ओर से किया जाएगा। कार्यक्रम की रूपरेखा इस संस्था के चेयरमैन एजे इडर ने खुद तैयार की है। कार्यक्रम को आयोजित करने के लिए भारत सरकार से स्वीकृति मांगी है। स्वीकृति मिल गई है। प्रदेश सरकार के संस्कृति निदेशालय से कार्यक्रम की तैयारियों के लिए कन्नौज के पुरातत्व संग्रहालय के अध्यक्ष को पत्र भेजा गया है।
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दुनिया में शतरंज खेल का जनक कौन है, इस रोचक तथ्य को जानने के लिए करीब 20 साल पहले 1999 में जर्मनी के एजे इडर ने चैरिटी ट्रस्ट चेस हिस्ट्रोरिकल रिसर्च की स्थापना की थी। दुनिया के कई देशों में प्रतिनिधि बनाकर एजे इडर ने शोध किया। इसमें सामने आया कि सातवीं शताब्दी में कन्नौज के राजा हर्षवर्धन ने चतुरंगा खेल की शुरुआत की। इसे बाद में शतरंज कहा जाने लगा। पहले यह खेल 24 खाने में खेला जाता था। बाद में यह 64 खाने में तब्दील हो गया। संस्था को इस तथ्य जानकारी तब हुई जब संस्था के प्रतिनिधि के तौर पर डेनमार्क के डॉ. जैकब ने पिछले साल के अंत में बिहार और फिर कन्नौज की यात्रा की। यहां आने के बाद उन्हें बाणभट्ट की पुस्तक हर्ष चरितम की जानकारी हुई। इसमें हर्षवर्धन के चतुरंगा खेल की शुरुआत करने के बारे में पता चला। बाणभट्ट हर्षवर्धन के शासनकाल में दरबारी कवि थे।
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विश्व विख्यात शतरंज के खेल की शुरुआत यहां होने की जानकारी होने के बाद संस्था ने अब इससे दुनिया को परिचित कराने के लिए कन्नौज में अंतरराष्ट्रीय स्तर का सेमिनार आयोजित करने का फैसला लिया है। इसमें जर्मनी के साथ ही अमेरिका, कनाडा, स्वीडन, ब्राजील, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जकार्ता, रूस, मलेशिया, सिंगापुर, जापान जैसे 50 देशों के प्रतिनिधि शिरकत करेंगे।
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संस्था के चेयरमैन एजे इडर ने कार्यक्रम के आयोजन के लिए भारत सरकार से स्वीकृति मांगी थी। यह मिल गई है। इस आशय की जानकारी पुरातत्व संग्रहालय निदेशालय लखनऊ के निदेशक डॉ. आनंद कुमार को केंद्रीय मंत्रालय की ओर से दी गई है। एजे इडर की ओर से बताया गया है कि 26 फरवरी 2019 को वह 50 देशों के प्रतिनिधियों के साथ कन्नौज पहुंचेंगे। यहां 27 और 28 फरवरी को दो दिवसीय सेमिनार आयोजित कर शतरंज खेल की जानकारी दुनिया के सामने रखेंगे। इसमें बताया जाएगा कि कन्नौज के राजा हर्षवर्धन ने सबसे पहले शतरंज खेल की रचना की थी।
पुरातत्व संग्रहालय के अध्यक्ष और प्राचीन इतिहास के जानकार दीपक कुमार ने बताया कि जर्मनी के एजे इडर ने अपने प्रतिनिधि डेनमार्क के डॉ. जैकब को भारत भेजा था। तब उन्हें चतुरंगा खेल सातवीं शताब्दी में हर्षवर्धन के खेले जाने की जानकारी हुई। इससे जुड़े प्रमाण कन्नौज के पुरातत्व संग्रहालय में आज भी मौजूद हैं। इन्हें देखने और अध्ययन करने के लिए डॉ. जैकब यहां भी आए थे। वह तस्वीरों के साथ ही इससे जुड़ा साहित्य अपने साथ ले गए थे। कन्नौज के संग्र्रहालय में पक्की मिट्टी के बने गजारोही, अश्वरोही, पैदल योद्धा देखकर शतरंज के प्यादे होने की बात डॉ. जैकब ने कही थी। इससे साबित हुआ कि हर्षवर्धन ने शतरंज की शुरुआत की थी। संस्कृति निदेशालय की ओर से 27-28 फरवरी को होने वाले कार्यक्रम के बारे में जानकारी दी गई है। करीब 50 देशों के प्रतिनिधि इस कार्यक्रम में शिरकत करेंगे। इस बड़े आयोजन की तैयारियों के लिए जल्द रूपरेखा तैयार की जाएगी।

रणभूमि में चतुरंगा खेल के दांवपेच आजमाते थे हर्षवर्धन
राजा हर्षवर्धन ने सातवीं शताब्दी में बड़ी बहन राजश्री की शादी मौखरी वंश के कन्नौज राजा गृह वर्मन से की थी। बंगाल के शासक देव गुप्त ने कन्नौज पर हमला कर उनकी हत्या कर दी थी। इसके बाद हर्षवर्धन ने थानेश्वर (हरियाणा प्रांत) से सेना लाकर देव गुप्त को पराजित किया। बहन के संतान न होने के कारण हर्षवर्धन कन्नौज के शासक बन गए। उनके दरबारी बाणभट्ट की पुस्तक हर्ष चरितम में लिखा है कि हर्षवर्धन ने 24 भागों में सेना को बांटकर कई युद्ध जीते थे। इसे कपड़े पर 24 खाने बनाकर युद्ध मैदान में हाथी सवार योद्धा, घोड़ा सवार योद्धा और पैदल योेद्धाओं को दर्शा कर चतुरंगा खेल का आविष्कार किया था। पुरातत्व संग्रहालय के अध्यक्ष दीपक कुमार ने बताया कि शतरंज के खेल को लेकर इतिहास में कई और तथ्य भी हैं। जर्मनी के एजे इडर की संस्था के शोध में जो प्रमाण सामने आए हैं, उनके आधार पर संस्था का मानना है कि शतरंज का खेल हर्षवर्धन के शासनकाल में सातवीं सदी में शुरू हुआ था।
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