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कछू नहीं बचाो है साहब!

Sat, 18 Apr 2015 12:11 AM IST
अमर उजाला कन्नाैैज
अमर उजाला कन्नाैैज Updated Sat, 18 Apr 2015 12:11 AM IST
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kachu nahi bacho hai sahab !
कछू नहीं बचो है साहब! थोड़ी बहुत उम्मीद हती भी, बाऊ को बरसात ने धोय दओ है। अब का करिहैं कटवाई (मड़ाई) के। यह कहते-कहते कालिनपुर्वा के किसान की आंखे डबडबा आईं। शरीर स्याह होते भविष्य के डर से वह कांपने लगता है तो बैठ जाता है। थोड़ी देर बाद फिर वह गेहूं के गीले गठ्ठरों को सुखाने के लिए इधर से उधर करने लगते हैं।
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यह दर्द महज राम सिंह का नहीं है। यह जिले के ज्यादातर किसानों का है। पिछले दिनों हुई बारिश ने इनकी फसल से कुछ पाने की उम्मीद को भी खत्म कर दिया है। ताजा हालातों में बामुश्किल 20 से 35 फीसदी फसल शेष बची है। मड़ाई कराए आए थ्रेसर को दिहाड़ी के रुप में चार बीघा की कटाई के बदलैं एक कुंतल गेहूं दिए पड़इयै। गेहूं के दाने पतलै हुइवे के साथ कारे पर गए। गेहूं खान लायक निकर आए, जा बहुत बड़ी बात है। मुआवजे के तौर पर कुछ राहत जरूर सरकार से मिली है।
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कानपुर हाइवे से सटे जलालपुर सरवन के किसान राम बहादुर मकई के खेत को निरा-गुड़ा रहे थे। बोले गेहूं के खेत में गट्ठर तो बना लिए, लेकिन अबै तक मड़ाई नाहिं करै। खेत में जाए कि हिम्मत नाहिं पड़ रही है। खेत को देखन से लागत है कि एक से डेढ़ कुंतल से ऊपर गेहूं नाहिं निकरअई। वहीं बगल के खेत में बैठे मुलायम फसल को निहार रहे थे।
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फसल के बारे में पूछने पर फफक पड़े। कहा, अबकी बार भगवान न जाने किसानों के साथ का खेल खेलिन हैं।

बढ़िया फसल दिखाए के सारी चौपट करि दिए। खेत की मड़ाई खातिर हिम्मत ही नाहिं जुटाए पा रहे हैं। फसल खातिर 25 हजार रुपया उधार लिया रहै। अब कइस चुकाय पइहैं। यही सोचत पूरा दिन गुजर जात है। सरकार से भी मुआवाजा की कोई आस नाहिं दिखाइ देत है। पूरे साल कइस घर चलिहै। अब एक जुगाड़ दिखाए परि रहै कि कहूं जाइके मजूरी करिबै।
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