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पति की दीर्घायु को रानी की पूजा
ब्यूूराे/अमर उजाला, कन्नौज
Updated Sat, 14 Nov 2015 11:47 PM IST
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समय के साथ-साथ समाज में वर्षों पुरानी चली आ रहीं
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सदियों पुरानी परंपराएं दम तोड़ती नजर आ रही हैं। दीपावली के बाद कार्तिक
माह की तीज को कई समाज की महिलाएं अपने पति की दीर्घायु के लिए तालाब
किनारे मनचिंता रानी की पूजा करती हैं। तालाब गायब होने से अब यह परंपरा भी
दम तोड़ती नजर आ रही है।
हालांकि, कुछ लोगों ने इस प्रथा को निभाने को दूसरा रास्ता अपना लिया है। अब वह लोग बड़े बर्तन में पानी भर उसे तालाब का दर्जा देकर मंदिर में विधि-विधान से पूजा कर प्रथा को निभा रहे हैं। लोगों का मानना है कि यह पूजा पति की दीर्घायु के लिए की जाती है।
शनिवार को कई समाज के लोगों ने तालाब किनारे होने वाली मनचिंता रानी और शंकर-पार्वती की पूजा नगर से तालाब गायब हो जाने से मंदिरों में विधि-विधान से की। लोगों का मानना है कि यह पूजा पति की दीर्घायु की कामना को लेकर की जाती है। क्षेत्र से तालाबों के गायब होने से महिलाओं ने अब दूसरा रास्ता अपना लिया है।
अब वह तालाब न खोजकर पास के मंदिर में जाकर इस परंपरा को पूरे विधि-विधान से निभा रही हैं। अबकी सुबह से ही महिलाओं को पूजा मंदिरों में करनी पड़ गई। बुजुर्ग महिलाओं ने बताया कि इस पूजा को करने को सुहागिनें घरों से पिसे हुए चावल को गीला क र उससे मछली का आकार बनाकर, सुहाग की डिब्बी, भगवान-शंकर पार्वती के स्वरूप के प्रतीक बनाकर लाती हैं। उन स्वरूपों की पूजा की जाती है।
नगर में तालाब न होने से उन्हें दूर-दराज से तालाब की मिट्टी मंगवाकर उसे एक बर्तन में रख उसमें पानी भर उसे तालाब का स्वरूप मानकर पूजा करती हैं। सुहागिनें इस दिन तब तक निर्जला व्रत रखती हैं, जब तक वह पूजा नहीं कर लेती। इस दौरान मनचिंता रानी और शंकर-पार्वती की कथा पढ़ने की परंपरा है।
बुजुर्ग महिलाओं ने कथा के बारे में बताया कि भगवान शंकर-पार्वती की पूजा अर्चना करने के बाद उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान ने मनचिंता रानी को उनकी मन की बात पूरी होने का वरदान दिया था। एक दिन मनचिंता रानी के पति एक वृक्ष पर एक चिन्ह बनाकर यह कहकर गांव से दूर कमाई करने चले गए जब तक यह वृक्ष पर चिन्ह बना रहेगा, तब तक रानी तुम मुझे जीवित समझना।
कई वर्षों तक पति के न लौटने पर रानी को पति की चिंता हुई। इस पर उन्होंने भगवान शंकर-पार्वती की उसी वृक्ष के नीचे आराधना करनी शुरू कर दी। इस पर शंकर-पार्वती ने उन्हें एक ही बार मन की बात पूरी होने का वरदान दिया था। इस पर रानी ने पति के सकुशल लौटने को याद किया तो कुछ ही इंतजार के बाद उनका वरदान सफल हुआ और उनके पति वापस लौट आए।
उसी दिन से सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु के लिए दीपावली के बाद भैयादूज के दूसरे दिन तीज को मनचिंता रानी की व्रत और भगवान शंकर-पार्वती की पूजा-अर्चना करती हैं।
हालांकि, कुछ लोगों ने इस प्रथा को निभाने को दूसरा रास्ता अपना लिया है। अब वह लोग बड़े बर्तन में पानी भर उसे तालाब का दर्जा देकर मंदिर में विधि-विधान से पूजा कर प्रथा को निभा रहे हैं। लोगों का मानना है कि यह पूजा पति की दीर्घायु के लिए की जाती है।
शनिवार को कई समाज के लोगों ने तालाब किनारे होने वाली मनचिंता रानी और शंकर-पार्वती की पूजा नगर से तालाब गायब हो जाने से मंदिरों में विधि-विधान से की। लोगों का मानना है कि यह पूजा पति की दीर्घायु की कामना को लेकर की जाती है। क्षेत्र से तालाबों के गायब होने से महिलाओं ने अब दूसरा रास्ता अपना लिया है।
अब वह तालाब न खोजकर पास के मंदिर में जाकर इस परंपरा को पूरे विधि-विधान से निभा रही हैं। अबकी सुबह से ही महिलाओं को पूजा मंदिरों में करनी पड़ गई। बुजुर्ग महिलाओं ने बताया कि इस पूजा को करने को सुहागिनें घरों से पिसे हुए चावल को गीला क र उससे मछली का आकार बनाकर, सुहाग की डिब्बी, भगवान-शंकर पार्वती के स्वरूप के प्रतीक बनाकर लाती हैं। उन स्वरूपों की पूजा की जाती है।
नगर में तालाब न होने से उन्हें दूर-दराज से तालाब की मिट्टी मंगवाकर उसे एक बर्तन में रख उसमें पानी भर उसे तालाब का स्वरूप मानकर पूजा करती हैं। सुहागिनें इस दिन तब तक निर्जला व्रत रखती हैं, जब तक वह पूजा नहीं कर लेती। इस दौरान मनचिंता रानी और शंकर-पार्वती की कथा पढ़ने की परंपरा है।
बुजुर्ग महिलाओं ने कथा के बारे में बताया कि भगवान शंकर-पार्वती की पूजा अर्चना करने के बाद उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान ने मनचिंता रानी को उनकी मन की बात पूरी होने का वरदान दिया था। एक दिन मनचिंता रानी के पति एक वृक्ष पर एक चिन्ह बनाकर यह कहकर गांव से दूर कमाई करने चले गए जब तक यह वृक्ष पर चिन्ह बना रहेगा, तब तक रानी तुम मुझे जीवित समझना।
कई वर्षों तक पति के न लौटने पर रानी को पति की चिंता हुई। इस पर उन्होंने भगवान शंकर-पार्वती की उसी वृक्ष के नीचे आराधना करनी शुरू कर दी। इस पर शंकर-पार्वती ने उन्हें एक ही बार मन की बात पूरी होने का वरदान दिया था। इस पर रानी ने पति के सकुशल लौटने को याद किया तो कुछ ही इंतजार के बाद उनका वरदान सफल हुआ और उनके पति वापस लौट आए।
उसी दिन से सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु के लिए दीपावली के बाद भैयादूज के दूसरे दिन तीज को मनचिंता रानी की व्रत और भगवान शंकर-पार्वती की पूजा-अर्चना करती हैं।