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कृषि यंत्रों का कारोबार चौपट
अमर उजाला ब्यूराो/कन्नौज
Updated Sat, 26 Nov 2016 11:56 PM IST
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नोटबंदी
- फोटो : Demo Pic
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शहर में कृषि यंत्रों का बहुत बड़ा कारोबार है। यहां के बने कृषि यंत्र बिहार तक जाते हैं। साल में करोड़ों का टर्न ओवर है, लेकिन नोट बंदी के बाद से इस कारोबार को भी ग्रहण लग गया है। खरीदारों के न आने से यह कारोबार चौपट है। कारखानों के मालिक परेशान हैं। उनका कहना है कि कारीगरों को घर से पगार देनी पड़ रही है। सभी ने प्रधानमंत्री के नोट बंदी के इस फैसले को जल्दबाजी में बिना विचार किए लिया गया कदम बताया।
पूरे शहर में छोटे-बड़े करीब बीस कारखाने हैं। यहां पर सबसे ज्यादा ट्रैक्टर ट्राली और थ्रेशर बनते हैं। इसके अलावा आलू बोने और खोदने की मशीन, गेहूं बोने की मशीन, थ्रेशर, रीपर (गेहूं काटने की मशीन), कल्टीवेटर, लेवलर, हैरो और चारा मशीन के निर्माण का कारोबार होता है। प्रतिवर्ष लगभग दस करोड़ के आसपास का टर्नओवर है। यहां के बने कृषि यंत्र मैनपुरी, औरैया, इटावा, एटा, कासगंज, हरदोई, फर्रुखाबाद, शाहजहांपुर, बदायूं के अलावा बिहार प्रांत तक जाते हैं। आठ नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बड़े नोटों पर लगाई गई रोक के बाद कारोबार प्रभावित हुआ है।
घर से देनी पड़ रही पगार
एके कृषि यंत्र इंजीनियरिंग वर्क्स के स्वामी आदित्य गुप्ता का कहना है कि नोट बंदी के चलते कृषि यंत्रों की बिक्री ठप हो गई है। बैंकों में भीड़ के चलते आरटीजीएस नहीं हो पा रहा है। कारीगरों को पगार घर से देनी पड़ रही है। इस स्थिति को संभलने में कई महीने लग जाएंगे।
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सभी काम ठप हो गए
चतुर्वेदी ट्राली मैन्यूफैक्चर्स के मालिक राजेश कुमार चतुर्वेदी कहते हैं कि सभी काम ठप पड़े हैं। काम न होने की दशा में लेबर घर छोड़ कर चले गए। जो आर्डर लगे थे वह वापस हो गए। माल न मिल पाने से मशीनें अधूरी पड़ी हैं।
अब तक सिर्फ दो मशीनें बिकी
छिबरामऊ कृषि विकास केंद्र के प्रोप्राइटर गौरव शाक्य का कहना है कि पिछली सीजन में उन्होंने रोटावेटर की करीब 50 मशीनें बेची थी। इस बार नोटबंदी के चलते अभी तक सिर्फ दो मशीनों की बिक्री हुई है।
बंदी की कगार पर कारखाने
मां शक्ति ट्राली रिपेयर्स के मालिक रामरक्षपाल शर्मा ने कहा कि नोटबंदी ने सभी की कमर तोड़कर रख दी। पूरा कारोबार ठप पड़ा है। काम न होने से कारीगर घर बैठने को मजबूर हैं। कारखाने बंदी की कगार पर पहुंच गए हैं।
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पूरे शहर में छोटे-बड़े करीब बीस कारखाने हैं। यहां पर सबसे ज्यादा ट्रैक्टर ट्राली और थ्रेशर बनते हैं। इसके अलावा आलू बोने और खोदने की मशीन, गेहूं बोने की मशीन, थ्रेशर, रीपर (गेहूं काटने की मशीन), कल्टीवेटर, लेवलर, हैरो और चारा मशीन के निर्माण का कारोबार होता है। प्रतिवर्ष लगभग दस करोड़ के आसपास का टर्नओवर है। यहां के बने कृषि यंत्र मैनपुरी, औरैया, इटावा, एटा, कासगंज, हरदोई, फर्रुखाबाद, शाहजहांपुर, बदायूं के अलावा बिहार प्रांत तक जाते हैं। आठ नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बड़े नोटों पर लगाई गई रोक के बाद कारोबार प्रभावित हुआ है।
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घर से देनी पड़ रही पगार
एके कृषि यंत्र इंजीनियरिंग वर्क्स के स्वामी आदित्य गुप्ता का कहना है कि नोट बंदी के चलते कृषि यंत्रों की बिक्री ठप हो गई है। बैंकों में भीड़ के चलते आरटीजीएस नहीं हो पा रहा है। कारीगरों को पगार घर से देनी पड़ रही है। इस स्थिति को संभलने में कई महीने लग जाएंगे।
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सभी काम ठप हो गए
चतुर्वेदी ट्राली मैन्यूफैक्चर्स के मालिक राजेश कुमार चतुर्वेदी कहते हैं कि सभी काम ठप पड़े हैं। काम न होने की दशा में लेबर घर छोड़ कर चले गए। जो आर्डर लगे थे वह वापस हो गए। माल न मिल पाने से मशीनें अधूरी पड़ी हैं।
अब तक सिर्फ दो मशीनें बिकी
छिबरामऊ कृषि विकास केंद्र के प्रोप्राइटर गौरव शाक्य का कहना है कि पिछली सीजन में उन्होंने रोटावेटर की करीब 50 मशीनें बेची थी। इस बार नोटबंदी के चलते अभी तक सिर्फ दो मशीनों की बिक्री हुई है।
बंदी की कगार पर कारखाने
मां शक्ति ट्राली रिपेयर्स के मालिक रामरक्षपाल शर्मा ने कहा कि नोटबंदी ने सभी की कमर तोड़कर रख दी। पूरा कारोबार ठप पड़ा है। काम न होने से कारीगर घर बैठने को मजबूर हैं। कारखाने बंदी की कगार पर पहुंच गए हैं।