झांसी। बुंदेलखंड में पानी की कमी को देखते हुए गेहूं की ऐसी किस्म विकसित करने की कोशिश हो रही, जिसमें पानी की कम जरूरत पड़ती हो। इसके लिए कृषि शोध संस्थान में गेहूं की आधा दर्जन विभिन्न प्रजातियों पर शोध किया जा रहा है। अभी तक के परीक्षण में इनके परिणाम सकारात्मक आए हैं। इनके सफल होने पर इसके बीज बुंदेलखंड में वितरित किए जाएंगे।
शोध संस्थान की ओर से मोंठ समेत अन्य सरकारी फर्म में गेहूं की कुछ किस्में उपजाई जा रहीं। बुंदेलखंड के भौगोलिक वातावरण के मुताबिक इनका परीक्षण कराया जा रहा। कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक सामान्यता गेहूं की फसल के लिए न्यूनतम पांच सिंचाई करनी पड़ती हैं। इससे फसल की लागत में काफी इजाफा हो जाता है। इसे देखते हुए ऐसी किस्म तैयार करने की कोशिश हो रही जिसमें पानी की जरूरत कम पड़े। इसके लिए एच डब्ल्यू-711, एचयूडब्ल्यू-706, एनडब्ल्यू6048, के-1415 जैसी नई किस्मों का परीक्षण चल रहा है। इनके लिए बारिश के पानी के अलावा सिर्फ एक-दो सिंचाई की ही जरूरत पड़ती है लेकिन, पैदावार सामान्य होती है। अभी खेतों में ज्यादातर केअस्सी-27, के तिरानबे-51, कल्याण सोना किस्म की बुवाई होती है। इनसे करीब 18-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर का उत्पादन होता है। विशेषज्ञों के मुताबिक पिछले दो साल की बोवाई में एच डब्ल्यू-711 से 18.11 क्विंटल, एचयूडब्ल्यू-706 से 18 क्विंटल, एनडब्ल्यू6048 से 17.34 क्विंटल, के-1415 से 21.78 क्विंटलका उत्पादन हुआ। डीडी रजित राम का कहना है यह इनके परीक्षण का आखिरी वर्ष है। इसके बाद इनकी संस्तुति की जाएगी।