{"_id":"642f2259d0a35a9b2201f4ad","slug":"vultures-started-increasing-in-bundelkhand-241-flying-in-lalitpur-jhansi-news-c-11-1-jhs1023-69955-2023-04-07","type":"story","status":"publish","title_hn":"Jhansi News: बुंदेलखंड में बढ़ने लगे गिद्ध, ललितपुर में 241 भर रहे उड़ान","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Jhansi News: बुंदेलखंड में बढ़ने लगे गिद्ध, ललितपुर में 241 भर रहे उड़ान
विज्ञापन
झांसी। बुंदेलखंड में गिद्धों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। वन विभाग ने झांसी और ललितपुर 281 गिद्धों की गणना की है। जबकि साल 2018 में हुई गणना में यहां सिर्फ 56 गिद्ध पाए गए थे। वहीं झांसी-ललितपुर के अलावा बुंदेलखंड के किसी भी शहर में गिद्ध नहीं पाए गए हैं।
गिद्ध को प्रकृति का सफाई कर्मचारी कहा जाता है। आसमान में ऊंची उड़ान भरने वाले इस पक्षी की नजर हमेशा जमीन पर रहती है। जहां भी मृत देह नजर आती है, वहां गिद्धों का झुंड पहुंचकर जानवर को खा लेते हैं। बुंदेलखंड में पिछले कई सालों से गिद्धों की संख्या लगातार कम होती जा रही थी। जिसकी मुख्य वजह पशुओं को खिलाने वाली दर्द निवारक दवा डिफ्लोफेनिक को माना जा रहा था। इस दवा का सेवन कर चुके मृत पशुओं का मांस खाने से गिद्ध का हृदय और किडनी काम करना बंद कर देते हैं। जिससे उसकी मौत हो जाती है। हालांकि सालों पहले से इस दवा पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसके बाद वन विभाग की गणना के मुताबिक वर्ष 2018 में ललितपुर में 41, झांसी में 15 गिद्ध पाए गए थे। जबकि जालौन, बांदा, महोबा और हमीरपुर में संख्या शून्य थी। वहीं वर्ष 2022 की गणना के मुताबिक ललितपुर में 241, झांसी में 40 गिद्ध पाए गए हैं। लेकिन जालौन, महोबा, बांदा और हमीरपुर में एक भी गिद्ध नहीं मिला। प्रभागीय वन अधिकारी एमपी गौतम ने बताया कि पिछले कई सालों से गिद्धों की संख्या कम हो रही थी। वर्ष 2022 में गिद्धाें की संख्या में इजाफा हुआ है।
बुंदेलखंड में गिद्धों की सात प्रजातियां पाई जाती हैं
विश्व में गिद्धों की 22 प्रजातियां पाई जाती हैं। जिनमें से नौ प्रजातियां भारत में ही पाई जाती हैं। इसमें गिद्धों की सात प्रजातियां सिर्फ बुंदेलखंड में ही पाई जाती है। जिसमें लॉग गिल्ड गिद्ध, व्हाइट गिद्ध, रेड हेडिड गिद्ध, इज्पशिन गिद्ध पाए जाते हैं। जबकि सर्दी के मौसम में हिमालयन रेफोर गिद्ध, युरेसियन गिद्ध और सिनेरियस गिद्ध भी देखने को मिलते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
गिद्ध को प्रकृति का सफाई कर्मचारी कहा जाता है। आसमान में ऊंची उड़ान भरने वाले इस पक्षी की नजर हमेशा जमीन पर रहती है। जहां भी मृत देह नजर आती है, वहां गिद्धों का झुंड पहुंचकर जानवर को खा लेते हैं। बुंदेलखंड में पिछले कई सालों से गिद्धों की संख्या लगातार कम होती जा रही थी। जिसकी मुख्य वजह पशुओं को खिलाने वाली दर्द निवारक दवा डिफ्लोफेनिक को माना जा रहा था। इस दवा का सेवन कर चुके मृत पशुओं का मांस खाने से गिद्ध का हृदय और किडनी काम करना बंद कर देते हैं। जिससे उसकी मौत हो जाती है। हालांकि सालों पहले से इस दवा पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसके बाद वन विभाग की गणना के मुताबिक वर्ष 2018 में ललितपुर में 41, झांसी में 15 गिद्ध पाए गए थे। जबकि जालौन, बांदा, महोबा और हमीरपुर में संख्या शून्य थी। वहीं वर्ष 2022 की गणना के मुताबिक ललितपुर में 241, झांसी में 40 गिद्ध पाए गए हैं। लेकिन जालौन, महोबा, बांदा और हमीरपुर में एक भी गिद्ध नहीं मिला। प्रभागीय वन अधिकारी एमपी गौतम ने बताया कि पिछले कई सालों से गिद्धों की संख्या कम हो रही थी। वर्ष 2022 में गिद्धाें की संख्या में इजाफा हुआ है।
विज्ञापन
बुंदेलखंड में गिद्धों की सात प्रजातियां पाई जाती हैं
विश्व में गिद्धों की 22 प्रजातियां पाई जाती हैं। जिनमें से नौ प्रजातियां भारत में ही पाई जाती हैं। इसमें गिद्धों की सात प्रजातियां सिर्फ बुंदेलखंड में ही पाई जाती है। जिसमें लॉग गिल्ड गिद्ध, व्हाइट गिद्ध, रेड हेडिड गिद्ध, इज्पशिन गिद्ध पाए जाते हैं। जबकि सर्दी के मौसम में हिमालयन रेफोर गिद्ध, युरेसियन गिद्ध और सिनेरियस गिद्ध भी देखने को मिलते हैं।
विज्ञापन