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अभी रोपें त्रिफला के पौधे, अच्छी कमाई का मौका
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झांसी। त्रिफला में उपयुक्त होने वाले पौधे बुंदेलखंड के वातावरण के लिए बहुत अनुकूल हैं। इसके किसान गांव की पंचायत भूमि, सामुदायिक भूमि और कृषि वानिकी द्वारा अपनी भूमि में लगाकर अच्छी कमाई कर सकते हैं। रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के कृषि विशेषज्ञों ने त्रिफला के पौधे लगाने के लिए मौजूदा समय को बिल्कुल मुफीद बताया है।
रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के कृषि विशेषज्ञ डॉ. राकेश कुमार और डॉ. मनमोहन डोबरियाल ने बताया कि हरीतकी/हरड, विभीतक/बहेड़ा, धात्री/आंवला नामक तीन फलों के मिश्रण से औषधीय द्रव्य को त्रिफला कहा जाता है। इसमें उपयुक्त होने वाले पौधे बुंदेलखंड के वातावरण के लिए बहुत अनुकूल हैं। इसे किसान गांव की पंचायत भूमि, सामुदायिक भूमि और कृषि वानिकी द्वारा अपनी भूमि में लगाकर अच्छी जीविका में वृद्धि कर सकते हैं। त्रिफला के पौधों को किसान अपनी भूमि में वर्षा ऋतु में रोप सकते हैं। यदि सिंचाई की अच्छी सुविधा उपलब्ध हो तो किसान इन पौधों को जनवरी-फरवरी में लगा सकते हैं। इन पौधों को किसान अपनी खेत में कृषि वानिकी द्वारा पांच गुणा छह मीटर की दूरी में लगा सकते हैं। इसके साथ ही कई अन्य फसलें उगाई जा सकती हैं। फसलों में खरीफ के मौसम में मूंगफली, सोयाबीन, अरहर, उड़द, लोबिआ आदि और रबी के सीजन में प्याज, सरसों, चना, मटर, राजमा, रोंगी, मैथी आदि को लगा सकते हैं। एक एकड़ में आंवला के 60, हरड के 30 और बहेड़ा के 30 पौधे हो सकते हैं।
ग्राफ्ट, कली से तैयार पौधों में जल्दी आते फल
त्रिफला के पौधों को बीज द्वारा ग्राफ्टिंग द्वारा व कली से प्रचारित किया जा सकता है। ग्राफ्ट और कली से तैयार किए गए पौधों में फल, बीज से बने पौधों की तुलना में जल्दी आते हैं। किसान ग्राफ्ट और कली से तैयार पौधों को निजी व सरकारी नर्सरी से प्राप्त कर सकते हैं। हरड़ और बहेड़ा की औसत उपज एक परिपक्व वृक्ष से 25-30 किलोग्राम तक होती है। जबकि, आंवला पौधों की उपज सौ किलोग्राम प्रति पौधा तक होती है। मौजूदा समय में बाजारों में 500 ग्राम त्रिफला चूर्ण की कीमत 100 से 150 रुपये तक है। इसलिए त्रिफला को उगाकर और प्रसंस्करण करके किसान अच्छा लाभ प्राप्त कर सकते हैं। आय में भी वृद्धि कर सकते हैं।
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रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के कृषि विशेषज्ञ डॉ. राकेश कुमार और डॉ. मनमोहन डोबरियाल ने बताया कि हरीतकी/हरड, विभीतक/बहेड़ा, धात्री/आंवला नामक तीन फलों के मिश्रण से औषधीय द्रव्य को त्रिफला कहा जाता है। इसमें उपयुक्त होने वाले पौधे बुंदेलखंड के वातावरण के लिए बहुत अनुकूल हैं। इसे किसान गांव की पंचायत भूमि, सामुदायिक भूमि और कृषि वानिकी द्वारा अपनी भूमि में लगाकर अच्छी जीविका में वृद्धि कर सकते हैं। त्रिफला के पौधों को किसान अपनी भूमि में वर्षा ऋतु में रोप सकते हैं। यदि सिंचाई की अच्छी सुविधा उपलब्ध हो तो किसान इन पौधों को जनवरी-फरवरी में लगा सकते हैं। इन पौधों को किसान अपनी खेत में कृषि वानिकी द्वारा पांच गुणा छह मीटर की दूरी में लगा सकते हैं। इसके साथ ही कई अन्य फसलें उगाई जा सकती हैं। फसलों में खरीफ के मौसम में मूंगफली, सोयाबीन, अरहर, उड़द, लोबिआ आदि और रबी के सीजन में प्याज, सरसों, चना, मटर, राजमा, रोंगी, मैथी आदि को लगा सकते हैं। एक एकड़ में आंवला के 60, हरड के 30 और बहेड़ा के 30 पौधे हो सकते हैं।
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ग्राफ्ट, कली से तैयार पौधों में जल्दी आते फल
त्रिफला के पौधों को बीज द्वारा ग्राफ्टिंग द्वारा व कली से प्रचारित किया जा सकता है। ग्राफ्ट और कली से तैयार किए गए पौधों में फल, बीज से बने पौधों की तुलना में जल्दी आते हैं। किसान ग्राफ्ट और कली से तैयार पौधों को निजी व सरकारी नर्सरी से प्राप्त कर सकते हैं। हरड़ और बहेड़ा की औसत उपज एक परिपक्व वृक्ष से 25-30 किलोग्राम तक होती है। जबकि, आंवला पौधों की उपज सौ किलोग्राम प्रति पौधा तक होती है। मौजूदा समय में बाजारों में 500 ग्राम त्रिफला चूर्ण की कीमत 100 से 150 रुपये तक है। इसलिए त्रिफला को उगाकर और प्रसंस्करण करके किसान अच्छा लाभ प्राप्त कर सकते हैं। आय में भी वृद्धि कर सकते हैं।
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