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बुंदेलखंड के वीर सपूतों ने तिरंगे के लिए कुर्बान कर दी थी जान
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झांसी। स्वतंत्र संग्राम के दौरान बुंदेलखंड की धरती पर फिरंगी सरकार और रियासतों के कर्ताधर्ताओं ने निहत्थे सत्याग्रहियों पर लाठियां और गोलियां बरसाने से परहेज नहीं किया पर, इस दमन के बीच भी आजादी के रणबांकुरे झंडा आंदोलन के दौरान तिरंगा फहराकर शहीद हो गए। पूरे देश में महात्मा गांधी के आह्वान पर झंडा आंदोलन चल रहा था। सत्याग्रही जगह-जगह जाकर सार्वजनिक स्थलों पर तिरंगा फहरा रहे थे और पुलिस इनको रोकने के लिए दमनचक्र चला रही थी। इसी दौरान बुंदेलखंड में थौना लुहारी और मऊरानीपुर तहसील कांड काफी चर्चित रहा। थौना लुहारी कांड में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी लालाराम वाजपेयी के नेतृत्व में थौना में अंग्रेज सरकार को चुनौती देकर तिरंगा फहराया गया. इससे नाराज अंग्रेज सरकार की फौज और ओरछा रियासत की पुलिस ने सभा करके घर लौट रहे निहत्थे सत्याग्रहियों पर पहले लाठीचार्ज किया और बाद में फायरिंग कर दी। इस कांड में दीवान सिंह लुहारी व जबार कोरी समेत 24 लोग घायल हुए थे। इसी तरह ग्राम सिमरधा के सत्याग्रहियों ने मऊरानीपुर तहसील कार्यालय की इमारत पर तिरंगा झंडा फहरा दिया था। इस कांड में पुलिस की फायरिंग में चंदू रंगरेज और रज्जू शहीद हो गए थे, जबकि ग्यारह लोग घायल हुए थे। यह ऐसे अनाम शहीद है जिनका आजाद भारत में न तो कोई स्मारक है और न ही लोग इन्हें याद करते हैं।
चंदू और रज्जू रंगरेज ने सीने पर गोली खाकर फहरा दिया था तिरंगा
इतिहासकार डा. ओमप्रकाश दीक्षित बताते हैं कि बात 1930 की है महात्मा गांधी के निर्देश पर पूरे देश में सत्याग्रही झंडा आंदोलन चला रहे थे। इसी दौरान बुंदेलखंड के सिमरधा गांव के कुछ उत्साही युवक बैजनाथ राजपूत. चंदू रंरेज, रज्जू रंगरेज ने मऊरानीपुर में अंग्रेजी हुकूमत की आंखों में धूल झोंककर तहसील कार्यालय की इमारत पर चढ़कर फिरंगियों और ओरछा रियासत का झंडा उतारकर तिरंगा झंडा फहरा दिया था। देखते ही देखते अंग्रेज सरकार के सिपाहियों ने इन पर फायरिंग कर दी। इसमें ग्यारह लोग घायल हुए थे, जिन्हें जेल भेज दिया गया था, जबकि चंदू रंगरेज और रज्जू रंगरेज मौके पर शहीद हो गए थे। इन दोनों शहीदों का कहीं भी स्मारक नहीं बनाया गया है।
लालाराम वाजपेयी ने किया था थौना लुहारी झंडा आंदोलन का नेतृत्व
अधिवक्ता व इतिहास के जानकार रविप्रकाश शर्मा बताते हैं कि 8 फरवरी 1939 को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी लालाराम वाजपेयी ने ब्रिटिश सरकार और ओरछा रियासत को चुनौती देकर कहा था कि वह थौना के बाजार में जाकर अपने सत्याग्रही साथियों के साथ तिरंगा फहराएंगे। इस चुनौती के बाद ब्रिटिश फौज और रियासत की पुलिस मौके पर पहुंच गई। पुलिस की तैनाती के बीच लालाराम वाजपेयी अपने सैकड़ों साथियों के साथ ओरछा राज्य और अंग्रेज सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए थौना के बाजार में पहुंचे तथा मुख्य चौराहे पर तिरंगा झंडा फहराया। स्थिति बिगड़ न जाए इससे डरकर मौके पर मौजूद अंग्रेजी फौज और पुलिस ने कुछ भी नहीं किया। यहां से आंदोलनकारी वापस सटे हुए गांव लुहारी में पहुंचे जहां पर उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सभा की। सभा करने के बाद जब सत्याग्रही अपने घर वापस जा रहे थे तो रियासत की पुलिस और अंग्रेजी फौज ने रास्ते में घेराबंदी करके उन पर फायरिंग कर दी। फायरिंग में दीवान सिंह लुहारी व जबार कोरी समेत 24 लोग घायल हुए थे। इन्हें मऊरानीपुर अस्पताल में भर्ती कराया गया था। मामला समाचारपत्रों में प्रकाशित होने पर इसकी जानकारी पं. जवाहर लाल नेहरू को हुई तो उन्होंने ओरछा रियासत के इस दमन के खिलाफ बयान जारी किया तो मामले की सीआईडी जांच कराई गई थी, पर जुल्म करने वालों का कुछ भी नहीं हुआ।
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चंदू और रज्जू रंगरेज ने सीने पर गोली खाकर फहरा दिया था तिरंगा
इतिहासकार डा. ओमप्रकाश दीक्षित बताते हैं कि बात 1930 की है महात्मा गांधी के निर्देश पर पूरे देश में सत्याग्रही झंडा आंदोलन चला रहे थे। इसी दौरान बुंदेलखंड के सिमरधा गांव के कुछ उत्साही युवक बैजनाथ राजपूत. चंदू रंरेज, रज्जू रंगरेज ने मऊरानीपुर में अंग्रेजी हुकूमत की आंखों में धूल झोंककर तहसील कार्यालय की इमारत पर चढ़कर फिरंगियों और ओरछा रियासत का झंडा उतारकर तिरंगा झंडा फहरा दिया था। देखते ही देखते अंग्रेज सरकार के सिपाहियों ने इन पर फायरिंग कर दी। इसमें ग्यारह लोग घायल हुए थे, जिन्हें जेल भेज दिया गया था, जबकि चंदू रंगरेज और रज्जू रंगरेज मौके पर शहीद हो गए थे। इन दोनों शहीदों का कहीं भी स्मारक नहीं बनाया गया है।
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लालाराम वाजपेयी ने किया था थौना लुहारी झंडा आंदोलन का नेतृत्व
अधिवक्ता व इतिहास के जानकार रविप्रकाश शर्मा बताते हैं कि 8 फरवरी 1939 को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी लालाराम वाजपेयी ने ब्रिटिश सरकार और ओरछा रियासत को चुनौती देकर कहा था कि वह थौना के बाजार में जाकर अपने सत्याग्रही साथियों के साथ तिरंगा फहराएंगे। इस चुनौती के बाद ब्रिटिश फौज और रियासत की पुलिस मौके पर पहुंच गई। पुलिस की तैनाती के बीच लालाराम वाजपेयी अपने सैकड़ों साथियों के साथ ओरछा राज्य और अंग्रेज सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए थौना के बाजार में पहुंचे तथा मुख्य चौराहे पर तिरंगा झंडा फहराया। स्थिति बिगड़ न जाए इससे डरकर मौके पर मौजूद अंग्रेजी फौज और पुलिस ने कुछ भी नहीं किया। यहां से आंदोलनकारी वापस सटे हुए गांव लुहारी में पहुंचे जहां पर उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सभा की। सभा करने के बाद जब सत्याग्रही अपने घर वापस जा रहे थे तो रियासत की पुलिस और अंग्रेजी फौज ने रास्ते में घेराबंदी करके उन पर फायरिंग कर दी। फायरिंग में दीवान सिंह लुहारी व जबार कोरी समेत 24 लोग घायल हुए थे। इन्हें मऊरानीपुर अस्पताल में भर्ती कराया गया था। मामला समाचारपत्रों में प्रकाशित होने पर इसकी जानकारी पं. जवाहर लाल नेहरू को हुई तो उन्होंने ओरछा रियासत के इस दमन के खिलाफ बयान जारी किया तो मामले की सीआईडी जांच कराई गई थी, पर जुल्म करने वालों का कुछ भी नहीं हुआ।
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