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साल दर साल बढ़ रहे क्षय रोगी
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Thu, 24 Mar 2016 12:31 AM IST
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टीबी
- फोटो : demopic
झांसी। जनपद में तेजी से क्षय रोग बढ़ रहा है। मेडिकल कॉलेज में अत्याधुनिक तरीके से हो रही कल्चर (बलगम) जांच में एमडीआर रोगियों की संख्या साल दर साल बढ़ रही है। यहां उनका उपचार किया जा रहा है।
मेडिकल कॉलेज में वर्ष 2003 में टीबी एवं चेस्ट रोग विभाग की स्थापना की गई थी। शुरूआत में यहां बलगम की जांच की रिपोर्ट आने में तीन माह तक का समय लग जाता था। लेकिन, राष्ट्रीय क्षय रोग कार्यक्रम के तहत इस केंद्र में वर्ष 2012 में एमडीआर (मल्टी ड्रग रेजीडेंस) वार्ड की स्थापना की गई। कल्चर जांच की अत्याधुनिक मशीन भी आ गई। खास बात यह है कि इस मशीन से तीन घंटे में जांच रिपोर्ट आ जाती है कि मरीज को टीबी है या एमडीआर टीबी। परीक्षण के बाद आई रिपोर्ट के आधार पर उसका उपचार शुरू कर दिया जाता है। टीबी एवं चेस्ट रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. मधुर्मय शास्त्री बताते हैं कि वर्ष 2012 में उनके यहां 90, वर्ष 2013 में 100, वर्ष 2014 में 107 एवं वर्ष 2015 में लगभग 120 मरीज आए। जांच के बाद इन मरीजों में एमडीआर टीबी पाई गई।
उन्होंने बताया कि मेडिकल कॉलेज के टीबी एंड चेस्ट रोग विभाग में स्थापित डाट्स प्लस केंद्र में एमडीआर, टीबी के मरीजों को एक सप्ताह के लिए भर्ती किया जाता है। इस दौरान उनकी विभिन्न जांचें होती हैं और प्रारंभिक उपचार दिया जाता है। इसके बाद उनका कोर्स निर्धारित कर दिया जाता है, जोकि छह से आठ माह का होता है। यह पूर्णतय: नि:शुल्क होता है। उन्होंने बताया कि इस केंद्र पर प्रतिदिन तीन से पांच मरीज भर्ती होते हैं। यदि मरीज बाहरी जनपद का हो तो उसे पास के डॉट्स केंद्र से दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।
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टीबी के सबसे ज्यादा मरीज भारत में
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार विश्व के 22 देशों में सबसे ज्यादा टीबी के मरीज हैं। इसमें भारत में सबसे ज्यादा टीबी के मरीज पाए जाते हैं। केवल हमारे देश में ही प्रतिदिन 5000 नए मरीज टीबी से ग्रसित होते हैं और इनमें से 1000 मरीजों की टीबी की वजह से प्रतिदिन मौत होती है।
यह होती है एमडीआर टीबी
डॉ. मधुर्मय शास्त्री के अनुसार साधारण टीबी के मरीज जब अपना कोर्स लेने लगते हैं तो उनमें टीबी के सारे लक्षण एक माह बाद ऊपरी तौर पर शारीरिक रूप से समाप्त हो जाते हैं। स्वयं को स्वस्थ महसूस करने वाले ऐसे मरीज यह भूल जाते हैं कि शरीर के अंदर टीबी के वायरस अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं और वह दवाएं लेना बंद कर देते हैं। ऐसे में शरीर के अंदर मौजूद टीबी का वायरस और मजबूत हो जाता है। इससे उनका शरीर और दुर्बल हो जाता है एवं उसकी प्रतिरोधक क्षमता भी घट जाती है। इसके बाद जब मरीज की दोबारा जांच की जाती है तो उसे एमडीआर टीबी हो चुकी है। टीबी की पुष्टि होने के बाद मरीज को चाहिए कि वह पूरा उपचार लें। उपचार अधूरा छोड़ने से एमडीआर आगे चलकर भयंकर रूप ले लेता है और फिर इसका इलाज जटिल, खर्चीला एवं दुष्प्रभाव से भरा हो जाता है। कभी-कभी एमडीआर जानलेवा भी साबित होता है।
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मेडिकल कॉलेज में वर्ष 2003 में टीबी एवं चेस्ट रोग विभाग की स्थापना की गई थी। शुरूआत में यहां बलगम की जांच की रिपोर्ट आने में तीन माह तक का समय लग जाता था। लेकिन, राष्ट्रीय क्षय रोग कार्यक्रम के तहत इस केंद्र में वर्ष 2012 में एमडीआर (मल्टी ड्रग रेजीडेंस) वार्ड की स्थापना की गई। कल्चर जांच की अत्याधुनिक मशीन भी आ गई। खास बात यह है कि इस मशीन से तीन घंटे में जांच रिपोर्ट आ जाती है कि मरीज को टीबी है या एमडीआर टीबी। परीक्षण के बाद आई रिपोर्ट के आधार पर उसका उपचार शुरू कर दिया जाता है। टीबी एवं चेस्ट रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. मधुर्मय शास्त्री बताते हैं कि वर्ष 2012 में उनके यहां 90, वर्ष 2013 में 100, वर्ष 2014 में 107 एवं वर्ष 2015 में लगभग 120 मरीज आए। जांच के बाद इन मरीजों में एमडीआर टीबी पाई गई।
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उन्होंने बताया कि मेडिकल कॉलेज के टीबी एंड चेस्ट रोग विभाग में स्थापित डाट्स प्लस केंद्र में एमडीआर, टीबी के मरीजों को एक सप्ताह के लिए भर्ती किया जाता है। इस दौरान उनकी विभिन्न जांचें होती हैं और प्रारंभिक उपचार दिया जाता है। इसके बाद उनका कोर्स निर्धारित कर दिया जाता है, जोकि छह से आठ माह का होता है। यह पूर्णतय: नि:शुल्क होता है। उन्होंने बताया कि इस केंद्र पर प्रतिदिन तीन से पांच मरीज भर्ती होते हैं। यदि मरीज बाहरी जनपद का हो तो उसे पास के डॉट्स केंद्र से दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।
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टीबी के सबसे ज्यादा मरीज भारत में
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार विश्व के 22 देशों में सबसे ज्यादा टीबी के मरीज हैं। इसमें भारत में सबसे ज्यादा टीबी के मरीज पाए जाते हैं। केवल हमारे देश में ही प्रतिदिन 5000 नए मरीज टीबी से ग्रसित होते हैं और इनमें से 1000 मरीजों की टीबी की वजह से प्रतिदिन मौत होती है।
यह होती है एमडीआर टीबी
डॉ. मधुर्मय शास्त्री के अनुसार साधारण टीबी के मरीज जब अपना कोर्स लेने लगते हैं तो उनमें टीबी के सारे लक्षण एक माह बाद ऊपरी तौर पर शारीरिक रूप से समाप्त हो जाते हैं। स्वयं को स्वस्थ महसूस करने वाले ऐसे मरीज यह भूल जाते हैं कि शरीर के अंदर टीबी के वायरस अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं और वह दवाएं लेना बंद कर देते हैं। ऐसे में शरीर के अंदर मौजूद टीबी का वायरस और मजबूत हो जाता है। इससे उनका शरीर और दुर्बल हो जाता है एवं उसकी प्रतिरोधक क्षमता भी घट जाती है। इसके बाद जब मरीज की दोबारा जांच की जाती है तो उसे एमडीआर टीबी हो चुकी है। टीबी की पुष्टि होने के बाद मरीज को चाहिए कि वह पूरा उपचार लें। उपचार अधूरा छोड़ने से एमडीआर आगे चलकर भयंकर रूप ले लेता है और फिर इसका इलाज जटिल, खर्चीला एवं दुष्प्रभाव से भरा हो जाता है। कभी-कभी एमडीआर जानलेवा भी साबित होता है।