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मोक्ष की आस, विसर्जन को तरसती राख
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submering the remains after a funeral
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झांसी। लॉकडाउन की वजह से यातायात पूरी तरह से थमा हुआ है। इसकी वजह से इस अवधि में मरने वाले लोगों की अस्थियों का उनके परिजन विसर्जन नहीं कर पा रहे हैं। इसके अलावा मृत्यु पूर्व होने वाले अन्य संस्कारों पर भी ग्रहण लगा हुआ है। हालांकि, इस त्रासदी से जूझ रहे लोगों का कहना है कि मृत होे चुके उनके परिजनों की आत्मा को भी असल शांति तब मिलेगी, जब देश से कोरोना का नाश हो जाएगा। लॉकडाउन खत्म होने के बाद ही वे अब अस्थियों का विसर्जन करेंगे।
लॉकडाउन शुरू होने के एक दिन पहले पंचकुइयां निवासी ओमप्रकाश तिवारी (76) वर्ष की आयु में निधन हो गया था। उसी दिन उनका दाह संस्कार कर दिया गया था। लेकिन, आवागमन ठप होने की वजह से उनकी अस्थियों का विसर्जन नहीं हो पाया है। दिवंगत आत्मा की अस्थियां बड़ागांव गेट बाहर मुक्तिधाम में रखी हुई हैं। इसके अलावा तेरहवीं जैसे अन्य संस्कार भी औपचारिक ही हो पाए। ये केवल किसी एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि तमाम लोगों को इसका सामना करना पड़ रहा है। दिवंगत आत्माओं की अस्थियों को विसर्जन का इंतजार है। मृत्यु उपरांत होने वाले अन्य क्रियाकर्म भी नहीं हो पा रहे हैं। अंदर सैंयर गेट निवासी राकेश निरंजन की मां श्रीमती ज्ञान देवी का 20 मार्च को निधन हुआ था। लॉकडाउन से पहले अस्थियों का विसर्जन तो गया था, परंतु ग्यारहवीं नहीं हो पाई। मृत्यु के बाद के इस जरूरी कर्म की औपचारिकता से ही उन्हें काम चलाना पड़ा।
ये केवल दो परिवारों की परेशानी नहीं है, बल्कि इस अवधि में मरने वाले लोगों के तमाम परिवारों को इस स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। शव यात्रा में भी बमुश्किल 10-15 की संख्या में ही लोग नजर आते हैं। इसके बाद के कर्म भी नहीं हो पा रहे हैं।
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शास्त्रानुसार अस्थियों को एक मटके में संग्रहित कर पीपल के पेड़ पर टांग सकते हैं। परिस्थितियां सामान्य होने पर उनका विसर्जन किया जाए। ग्यारहवीं, तेरहवीं जैसे संस्कार केवल एक ब्राह्मण को घर बुलाकर कर लें। बाकी ब्राह्मणों का भोजन उनके घर पहुंचा सकते हैं। इस संस्कार के बाद घर में पूजा-पाठ शुरू की जा सकती है।
- महंत विष्णु दत्त स्वामी, जिला धर्माचार्य
पिता की अस्थियों का अभी विसर्जन नहीं हो पाया है। अस्थियां बड़ागांव गेट बाहर मुक्तिधाम पर रखी हुईं हैं। तेरहवीं भी नहीं कर पाए हैं। केवल रस्म अदायगी भर हो पाई। हालांकि, पिता ओमप्रकाश तिवारी की आत्मा को भी तब ही शांति मिलेगी, जब देश से कोरोना का नाश हो जाएगा। आपदा का दौर खत्म होने के बाद पिता की स्मृति में सभी संस्कार किए जाएंगे।
- विजय तिवारी, पंचकुइयां
बीस मार्च को माताजी का देहांत हुआ था। लॉकडाउन लागू होने से पहले अस्थियों का विसर्जन तो कर दिया गया, परंतु ग्यारहवीं का विधान औपचारिक ही हो पाया है। नाते - रिश्तेदार भी इसमें शामिल नहीं हो सके। हालांकि, इसका मलाल नहीं है। क्योंकि, पहले देश से कोरोना वायरस जैसी आपदा का नाश होना जरूरी है। इसके बाद सभी कर्म कर लिए जाएंगे।
- राकेश निरंजन, अंदर सैंयर गेट
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लॉकडाउन शुरू होने के एक दिन पहले पंचकुइयां निवासी ओमप्रकाश तिवारी (76) वर्ष की आयु में निधन हो गया था। उसी दिन उनका दाह संस्कार कर दिया गया था। लेकिन, आवागमन ठप होने की वजह से उनकी अस्थियों का विसर्जन नहीं हो पाया है। दिवंगत आत्मा की अस्थियां बड़ागांव गेट बाहर मुक्तिधाम में रखी हुई हैं। इसके अलावा तेरहवीं जैसे अन्य संस्कार भी औपचारिक ही हो पाए। ये केवल किसी एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि तमाम लोगों को इसका सामना करना पड़ रहा है। दिवंगत आत्माओं की अस्थियों को विसर्जन का इंतजार है। मृत्यु उपरांत होने वाले अन्य क्रियाकर्म भी नहीं हो पा रहे हैं। अंदर सैंयर गेट निवासी राकेश निरंजन की मां श्रीमती ज्ञान देवी का 20 मार्च को निधन हुआ था। लॉकडाउन से पहले अस्थियों का विसर्जन तो गया था, परंतु ग्यारहवीं नहीं हो पाई। मृत्यु के बाद के इस जरूरी कर्म की औपचारिकता से ही उन्हें काम चलाना पड़ा।
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ये केवल दो परिवारों की परेशानी नहीं है, बल्कि इस अवधि में मरने वाले लोगों के तमाम परिवारों को इस स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। शव यात्रा में भी बमुश्किल 10-15 की संख्या में ही लोग नजर आते हैं। इसके बाद के कर्म भी नहीं हो पा रहे हैं।
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शास्त्रानुसार अस्थियों को एक मटके में संग्रहित कर पीपल के पेड़ पर टांग सकते हैं। परिस्थितियां सामान्य होने पर उनका विसर्जन किया जाए। ग्यारहवीं, तेरहवीं जैसे संस्कार केवल एक ब्राह्मण को घर बुलाकर कर लें। बाकी ब्राह्मणों का भोजन उनके घर पहुंचा सकते हैं। इस संस्कार के बाद घर में पूजा-पाठ शुरू की जा सकती है।
- महंत विष्णु दत्त स्वामी, जिला धर्माचार्य
पिता की अस्थियों का अभी विसर्जन नहीं हो पाया है। अस्थियां बड़ागांव गेट बाहर मुक्तिधाम पर रखी हुईं हैं। तेरहवीं भी नहीं कर पाए हैं। केवल रस्म अदायगी भर हो पाई। हालांकि, पिता ओमप्रकाश तिवारी की आत्मा को भी तब ही शांति मिलेगी, जब देश से कोरोना का नाश हो जाएगा। आपदा का दौर खत्म होने के बाद पिता की स्मृति में सभी संस्कार किए जाएंगे।
- विजय तिवारी, पंचकुइयां
बीस मार्च को माताजी का देहांत हुआ था। लॉकडाउन लागू होने से पहले अस्थियों का विसर्जन तो कर दिया गया, परंतु ग्यारहवीं का विधान औपचारिक ही हो पाया है। नाते - रिश्तेदार भी इसमें शामिल नहीं हो सके। हालांकि, इसका मलाल नहीं है। क्योंकि, पहले देश से कोरोना वायरस जैसी आपदा का नाश होना जरूरी है। इसके बाद सभी कर्म कर लिए जाएंगे।
- राकेश निरंजन, अंदर सैंयर गेट