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बुंदेलखंड में लुप्त हो रही सुआटा की परंपरा
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सुआटा की खबर में ।------------------------- सुआटा का चित्र।
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झांसी। बुंदेलखंड में शारदीय नवरात्र पर सुआटा (नौरता) खेले जाने की विशेष परंपरा है। सूर्योदय के अवसर पर बालिकाएं बुंदेली गीत सूरज मल के घुल्ला छूटे.., चंद्रामल के घुल्ला छूटे.. को गाते हुए आकर्षक रंगोलियां बनाती है। दो दशक पहले तक सुआटा शहर के सभी गली - मोहल्लों में खूब खेला जाता था। लेकिन अब यह परंपरा धीरे - धीरे लुप्त होती जा रही है। सिर्फ ग्रामीण अंचलों में ही यह लोक परंपरा प्रचलित है।
सुआटा खेलने का उत्साह शहर के कई इलाकों में कभी शारदीय नवरात्र के एक दिन पहले से खूब दिखता था। महानगर के गोला कुआं, सीपरी, सदर, गुदरी, दतिया गेट, बड़ागांव गेट सहित कई क्षेत्रों में बालिकाएं रात में गोबर से चौक लीपती थी और दीवार पर सुआटा राक्षस का प्रतीक चित्र अथवा प्रतिमा बनाती थी। भोर होते ही बुंदेली गीतों को गाते हुए वह चौक पर आकर्षक चित्र बनाती थी। नवमी पर गौर की पूजा का विशेष आयोजन होता था। सुआटा के साथ ही झिंझिया, टेसू जैसे आयोजन भी होते थे। लेकिन अब यह परंपरा सिर्फ गांव देहात तक सीमित रह गई है। शहर की अधिकांश नई पीढ़ी बुंदेलखंड की इस शानदार परंपरा से अनजान है।
सुआटा बचपन में खूब खेला है। अब यह इसका आयोजन लगातार सीमित होता जा रहा है। हालांकि बच्चों को जरूर इसके बारे में बताती है। कविता साहू निवासी बड़ागांव गेट बाहर
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सुआटा दस वर्ष की उम्र से खेलना शुरू कर दिया था। यह सांस्कृतिक आयोजन हमें अपने बुंदेलखंड की कला संस्कृति से जोड़ता है। वंदना कुशवाहा निवासी आंतिया तालाब
महानगर के अधिकांश क्षेत्रों में सुआटा अब देखने को नहीं मिलता है। बचपन में सहेलियां रंगोलियां बनाती थी और गीत गाती थी, जो आज भी याद है। यास्मीन निवासी सीपरी
सुआटा नौ दिन खेला जाता है। बुंदेली गीतों को गाते हुए सूर्योदय के समय सभी बालिकाएं रंगोलियां बनाती है। इस परंपरा को बढ़ावा देना जरूरी है। संगीता सुमन निवासी शहर
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सुआटा खेलने का उत्साह शहर के कई इलाकों में कभी शारदीय नवरात्र के एक दिन पहले से खूब दिखता था। महानगर के गोला कुआं, सीपरी, सदर, गुदरी, दतिया गेट, बड़ागांव गेट सहित कई क्षेत्रों में बालिकाएं रात में गोबर से चौक लीपती थी और दीवार पर सुआटा राक्षस का प्रतीक चित्र अथवा प्रतिमा बनाती थी। भोर होते ही बुंदेली गीतों को गाते हुए वह चौक पर आकर्षक चित्र बनाती थी। नवमी पर गौर की पूजा का विशेष आयोजन होता था। सुआटा के साथ ही झिंझिया, टेसू जैसे आयोजन भी होते थे। लेकिन अब यह परंपरा सिर्फ गांव देहात तक सीमित रह गई है। शहर की अधिकांश नई पीढ़ी बुंदेलखंड की इस शानदार परंपरा से अनजान है।
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सुआटा बचपन में खूब खेला है। अब यह इसका आयोजन लगातार सीमित होता जा रहा है। हालांकि बच्चों को जरूर इसके बारे में बताती है। कविता साहू निवासी बड़ागांव गेट बाहर
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सुआटा दस वर्ष की उम्र से खेलना शुरू कर दिया था। यह सांस्कृतिक आयोजन हमें अपने बुंदेलखंड की कला संस्कृति से जोड़ता है। वंदना कुशवाहा निवासी आंतिया तालाब
महानगर के अधिकांश क्षेत्रों में सुआटा अब देखने को नहीं मिलता है। बचपन में सहेलियां रंगोलियां बनाती थी और गीत गाती थी, जो आज भी याद है। यास्मीन निवासी सीपरी
सुआटा नौ दिन खेला जाता है। बुंदेली गीतों को गाते हुए सूर्योदय के समय सभी बालिकाएं रंगोलियां बनाती है। इस परंपरा को बढ़ावा देना जरूरी है। संगीता सुमन निवासी शहर