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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Jhansi News ›   Shyam Lal of Baruasagar became an inspiration in the film world of india as Indeevar 

अपनी धरती-अपने लाल : बरुआसागर के श्याम लाल, माया नगरी के फिल्मी आकाश पर इंदीवर बनकर छा गए

Sun, 27 Jun 2021 04:40 AM IST
दुष्यंत शर्मा ओमप्रकाश दुबे, झांसी
ओमप्रकाश दुबे, झांसी Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sun, 27 Jun 2021 04:40 AM IST
सार

फिल्म गीतकार इंदीवर किसी परिचय के मोहजात नहीं हैं। 300 फिल्मों के लिए डेढ़ हजार से अधिक गीत लिखने वाले इंदीवर के गाने लोग आज भी गुनगुनाते हैं। चंदन सा बदन, चंचल चितवन धीरे से तेरा ये मुस्काना, मुझे दोष न देना जग वालों हो जाऊं अगर में दीवाना और फूल तुम्हें भेजा है खत में फूल नहीं मेरा दिल है, जैसे गीतों ने उन्हें नई पहचान दी। उनके व्यक्तिव और कृतित्व से भी लोग भली-भांति वाकिफ हैं, पर उनकी निजी जिंदगी के ऐसे कई अनछुए पहलू हैं जिन्हें बहुत कम लोग जानते हैं। अमर उजाला बुंदेलखंड की धरती पर जन्मे इस लाल के जीवन से जुड़े इन्हीं अनछुए पहलुओं को आप तक पहुंचाने का प्रयास अपनी नई सीरीज 'अपनी धरती अपने लाल' के माध्यम से कर रहा है...

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Shyam Lal of Baruasagar became an inspiration in the film world of india as Indeevar 
बाएं से... गीतकार इंदीवर, उनकी पत्नी पार्वती, इंदीवर के भतीजे अजित राय और राधारमन तिवारी। और नीचे गीतकार इंदीवर का बरुआसागर स्थित पैतृक मकान जिसे वे मुफलिसी के दिनों में बेचकर चले ग ए थे। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

झांसी जिले में खजुराहो राष्ट्रीय राजमार्ग पर एक छोटा सा कसबा है बरुआसागर। इसी कसबे में 1924 में हरलाल राय के घर बेटी के बाद बेटे का जन्म हुआ। खुशियों से घर भर गया, नाम रखा गया श्याम लाल। पर, यह खुशियां ज्यादा दिन तक नहीं टिक सकीं, पांच वर्ष की उम्र में ही श्यामलाल के सिर से मां और पिता दोनों का साया उठ गया। पांच वर्ष से शुरू हुई संघर्ष की कहानी ने श्यामलाल राय के साथ पहले आजाद जोड़ दिया और 25 वर्ष की उम्र आते आते श्याम लाल से इंदीवर बनाकर फिल्मी आकाश पर चमकते हुए सितारे के रूप में स्थापित कर दिया।

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झांसी में रहने वाले इंदीवर के भतीजे अजित राय बताते हैं कि मां बाप का साया उठने के बाद इंदीवर को उनकी बड़ी बहन राजाबेटी अपनी ससुराल पास के ही गांव गुवावली ले गईं थीं, जहां पर वह सोलह वर्ष की उम्र तक रहे। बाद में वह फिर बरुआसागर वापस आ गए। वह अपनी पढ़ाई जारी रखने के साथ किसी तरह अपनी जिंदगी बसर करते थे। मुफलिसी के दिनों में ही कुछ ऐसा हुआ कि श्यामलाल का रुझान गीत और कविताओं की ओर हो गया।
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फक्कड़ बाबा से मिली गीत और कविताओं की पहली तालीम
सेवा निवृत्त प्रधानाध्यापक बुजुर्ग राधारमन तिवारी बताते हैं कि चालीस के दशक में बरुआसागर में एक फक्कड़ बाबा पेड़ के नीचे बैठकर गाने गाकर भिक्षा मांगा करते थे। वह न केवल गाते थे बल्कि गीत भी स्वयं ही लिखते थे। मुफलिसी के दौर में श्याम लाल आजाद अक्सर खाली वक्त में इन्हीं बाबा के पास आकर बैठ जाया करते थे तथा गीत और कविता की पहली तालीम उन्हें यहीं से मिली। श्याम लाल राय (इंदीवर) की प्रतिभा को पहचानकर बाबा ने उन्हें कविताएं लिखने को प्रेरित किया।
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वक्त गुजरते देर न लगी और श्यामलाल आजाद छोटे कवि सम्मेलनों में शामिल होने लगे, प्रसिद्धि बढ़ी और इसी से जीवन यापन होने लगा। दीदी और जीजाजी ने मौके को ताड़ा उन्हें लगा श्याम की शादी क रने का यही सबसे सही मौका है, और उन्होंने झांसी के हजरयाने मोहल्ला निवासी पार्वती से श्याम की शादी कर दी, पार्वती को सभी प्यार से पारो कहते थे। हालांकि, श्यामलाल इस शादी के लिए कतई तैयार नहीं थे, क्योंकि उनकी आंखों में तो फिल्मी गीतकार बनने का सपना तैर रहा था। 

नाराज होकर श्याम लाल महज बीस वर्ष की उम्र में पार्वती को छोड़कर मुंबई चले गए। काफी संघर्ष के बाद 1946 में डबल फेस नाम की फिल्म में इन्हें गीत लिखने का मौका मिला पर यह फिल्म बाक्स ऑफिस पर फ्लॉप साबित हुई। अब तक श्यामलाल इंदीवर नहीं बने थे, टूटे हुए सपनों के साथ वे वापस बरुआसागर आ गए। पार्वती के साथ दांपत्य जीवन भी पटरी पर आ गया पर उनकी पारो चाहती थी कि जिस सपनों को श्याम ने देखा है वह पूरा हो। 

उनकी प्रेरणा से इंदीवर ने एक बार फिर मुंबई का रुख किया। यहां उनके मित्रों ने सलाह दी कि वे श्याम लाल राय आजाद के नाम से नहीं किसी दूसरे नाम से गीत लिखे और पैदा हो गया एक नया गीतकार इंदीवर। 1951 में उन्हें मल्हार फिल्म के गीत लिखने का मौका मिला और उनका गीत, बड़े अरमान से रख्खा है बलम तेरी कसम, प्यार की दुनिया में यह पहला कदम। , उनका यह पहला कदम ऐसा रहा कि इंदीवर ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।
 

इंदीवर के गीतों में छलकता रहा पारो की जुदाई का दर्द


मल्हार और पारसमणि फिल्मों के हिट गीतों ने इंदीवर के पास संगीत निर्देशक व निर्माताओं की लाइन लगा दी। इंदीवर अपने घर बरुआसागर वापस आए और अपनी पत्नी पार्वती (पारो) से कहा कि अब वह उनके साथ चलकर मुंबई में ही रहें। पर, कहानी में एक बार फिर मोड़ आया, पारो ने बुंदेलखंड की सरजमीं छोड़कर मुंबई जाने से साफ इंकार कर दिया। लाख कोशिशों के बाद भी इंदीवर को अकेले ही मुंबई वापस जाना पड़ा। 

इसके बाद उन्होंने जो गीत लिखे उसमें निर्माता या श्रोता भले ही उनके निजी जिंदगी के दर्द को न समझ सके हो पर बुंदेलखंड की धरती के लोग भली भांति जानते थे कि इंदीवर के इन गीतों में पार्वती की जुदाई की कसक है। उस दौर के गीतों में फिल्म हिमालय की गोद का गीत , एक तू न मिला सारी दुनिया मिली भी तो क्या है, मेरा दिल न खिला सारी बगिया खिली भी तो क्या है, फिल्म सफर का गीत, हम थे जिनके सहारे वो हुए न हमारे, डूबी जब दिल की नैया सामने थे किनारे जैसे दर्द भरे गीत इंदीवर की कलम से लिखे जाते रहे। 

फिल्मी आकाश पर इंदीवर ने धूम मचा दी। एक बार फिर वे अपनी पार्वती को मनाने बरुआसागर आए और उन्होंने पारों को साथ ले जाने की कोशिश की पर वे नाकाम रहे। इसके बाद फिल्म सरस्वती चंद का वह गीत, छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए ये मुनासिब नहीं आदमी के लिए, प्यार से भी जरूरी कई काम हैं, प्यार सब कुछ नहीं जिंदगी के लिए। शायद इंदीवर ने यह गीत अपने टूटे हुए दिल को दिलासा देने के लिए ही लिखा था। इसके बाद, जीवन से भरीं तेरी आंखें मजबूर करें जीने के लिए तथा पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले झूठा ही सही, कसमें वादे प्यार वफा बातें हैं बातों का क्या जैसे गीत भी सामने आए।

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