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Jhansi News: सावन दूल्हा, भादो बराती, बिजुरी सी दुल्हन लाए, उतई से बादर आए...
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संवाद न्यूज एजेंसी
कोछाभांवर। आषाढ़ माह में वर्षा ऋतु का शुभारंभ हो गया है। मंदिरों और गांवों की चौपालों में वर्षा ऋतु से संबंधित मधुर भजन और लोकगीत गाए जा रहे हैं। प्रकृति की सुंदरता का मोहक वर्णन किया जा रहा है।
बुंदेलखंड में वर्षा ऋतु को एक उत्सव की तरह माना जाता है। प्रत्येक ऋतु की तरह वर्षा ऋतु से जुडे़ भजन और लोकगीत खूब लोकप्रिय हैं। इनमें राग मेघ मल्हार का समावेश रहता है। वरिष्ठ संगीतज्ञ हरिराम वर्मा के अनुसार, ओरछा के संत कवि हरिराम व्यास एवं चंद्रसखी के भक्ति गीत आज भी बुंदेलखंड, ब्रज एवं अवध के मंदिरों में गुंजायमान है। श्रीकृष्ण द्वारका में छाए, उतई से बादर आए, सावन दूल्हा, भादो बराती, बिजुरी सी दुल्हन लाये, उतई से बादर आये..., सखी री सावन की ऋतु आई, चल री सखी कुंजन में चलिये, झूलत कृष्ण कन्हाई... गाये जाते हैं।
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वरिष्ठ साहित्यकार पन्नालाल असर के अनुसार बुंदेलखंड में वर्षा ऋतु में आल्हा गाया जाता है। सावन में कजरी, दादरा, राछरा का गायन होता है। उमड़ - घुमड घिर आये कारे बदरा, रिमझिम परत फुहार हो, खेतन में लौटी हरियाली, डूबन लगे कछार हो.., गरजत बदरा, चमकत बिजुरी... आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षा ऋतु के प्रचलित गीत है। कवि जगनिक, ईसुरी, पदमाकर की रचनाएं खूब गाई जाती है। इधर किसान अनिल कुमार के अनुसार बरसात के मौसम में पारंपरिक बुंदेली लोकगीत गाये जाते है।
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यक्ष का संदेश लेकर गए थे आषाढ़ के बादल
संस्कृत साहित्य में वर्षा ऋतु का सुंदर चित्रण है। महाकवि कालिदास के मेघदूतम में यक्ष ने आषाढ के मेघ को अपना दूत बनाते हुए अपनी प्रेयसी को प्रेम का संदेश भेजा था। डा. बीबी त्रिपाठी के अनुसार मेघदूतम में मेघों के स्वरूप का भी सुंदर वर्णन किया गया है।
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उत्तम वर्षा के लिए महादेव से की प्रार्थना
महाराष्ट्र रूद्रपाठ मंडल के तत्वावधान में पानी वाली धर्मशाला स्थित प्राचीन हरिहरेश्वर (हजारिया) महादेव मंदिर में प्रात: रुद्राभिषेक के साथ 108 बिल्वपत्रों के साथ पूजन किया गया और उत्तम वर्षा की कामना की गई। मुख्य पुरोहित गजानन खानवलकर, उज्जवल देवधर, वसंत राव मोघे, मिलिंद देसाई, किशोर पोल, राहुल खांडेकर, लोक रंजन गोस्वामी, अरूण हलवे आदि मौजूद रहे।