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शहीद सुल्तान की प्रतिमा पर श्रद्धा के दो फूल भी नहीं चढ़ा पा रहे भोजला वाले

Wed, 24 Feb 2021 02:05 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Wed, 24 Feb 2021 02:05 AM IST
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sahid sultan ki prtima pr shirdha ke do fhul bhe chada pa rhe bhojla bale
शहीद पुलिस कर्मी सुल्तान के गांव भोजला में अधूरा बना खड़ा बना स्मृति द्वार।
शहीद सुल्तान की प्रतिमा पर श्रद्धा के दो फूल भी नहीं चढ़ा पा रहे भोजला वाले
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अनीता वर्मा
झांसी। उस काली रात को आठ महीने बीत चुके हैं। जब 2 जुलाई 2020 को कानपुर के बिकरू गांव में अपराधी विकास दुबे और उसके साथियों ने मिलकर 8 पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी थी। मारे गए पुलिसकर्मियों में एक सुल्तान सिंह भी था। वहीं, सुल्तान सिंह जिसका गांव उसके शहीद होने के आठ महीने बाद भी उसकी प्रतिमा पर श्रद्धा के दो फूल भी नहीं चढ़ा पा रहा है। मूल रूप से झांसी के भोजला गांव निवासी शहीद सुल्तान सिंह पुत्र हरप्रसाद का परिवार और गांव वाले उसकी याद में आज भी गमगीन हैं। उनके परिवारवालों का कहना है कि गांव में सुल्तान की याद में स्मृति द्वार बनना था, इसके अलावा उसकी प्रतिमा लगवाने की बात शासन-प्रशासन ने कही थी लेकिन अभी तक न तो पूरा स्मृति द्वार ही बन सका है और न ही शहीद सुल्तान की प्रतिमा लगाने के लिए कोई जगह चिह्नित की गई है। वहीं, शहीद की पत्नी उर्मिला भी अपनी नौकरी की आस लगाए बैठी है। शासन-प्रशासन ने परिजनों को एक बड़ी धनराशि देकर इतिश्री कर ली है।
भोजला गांव में स्वर्गीय सुल्तान सिंह श्रीवास का परिवार रहता है। मां को गुजरे कई साल हो चुके हैं। बुजुर्ग पिता हरप्रसाद सिंह का ज्यादातर समय मंदिर और वहीं पास में बने एक कमरे में अकेले में बीतता है। पहले सबसे छोटे बेटे और उसके बाद मझले बेटे सुल्तान की मौत से वह गमगीन रहने लगे हैं। परिवार में छोटे बेटे के बच्चे और सबसे बड़ा बेटा ज्ञान सिंह उनकी पत्नी और बच्चे हैं। जो गांव में आटा चक्की लगाकर अपनी गृहस्थी चला रहे हैं। वहीं, शहीद सुल्तान की पत्नी उर्मिला अपनी बेटी के साथ फिलहाल कानपुर में रहकर पुलिस भर्ती के लिए दौड़ परीक्षा की तैयारी कर रही हैं।
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सुल्तान के चचेरे भाई संजू सिंह ने बताया कि भोजला गांव की मुख्य सड़क पर भइया सुल्तान की याद में स्मृति द्वार बनना है। पूर्व सांसद चंद्रपाल सिंह यादव ने जल्द इसे बनवाने का आश्वासन दिया था। पूर्व प्रधान हरगोविंद सिंह यादव की देखरेख में इसे तैयार होना है। पर अभी तक सिर्फ सीमेंट के पिलर की खड़े हैं उसमें कोई पत्थर नहीं बनाया गया। वहीं, गांव में जूनियर हाईस्कूल के पास तिराहे पर भइया सुल्तान की प्रतिमा लगाई जानी थी, लेकिन अभी जमीन तक चिह्नित नहीं की गई है। कई बार इसके बारे में पूछ चुके हैं पर कोई सटीक जवाब नहीं मिल रहा। पूर्व प्रधान ने बताया कि स्मृति द्वार बनवाने के लिए द्वार के पत्थर की माप दी गई है। ठेकेदार से बात करेंगे। तब जानकारी हो सकेगी।
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वर्जन
स्मृति द्वार के लिए पत्थर राजस्थान के कोटा से मंगाए गए हैं, गेट का स्ट्रक्चर बनकर तैयार है, आगे का काम जल्द कराया जाएगा। चंद्रपाल सिंह यादव, पूर्व सांसद
पापा के बिना मनाया बेटी का पहला बर्थडे, आंसू रोके नहीं रुके...
अपनी छह साल की बेटी अग्रिमा के साथ रह रहीं शहीद सुल्तान की पत्नी उर्मिला ने बताया कि दो दिन पहले (21 फरवरी) को बेटी का बर्थडे था। छह साल में पहली बार बच्ची का बर्थडे उसके पापा के बिना मनाया गया। पापा को याद करती बच्ची की गमगीन आंखें देख वह भी अपने आंसू रोक नहीं पा रही थीं। लेकिन बच्ची की खुशी के खातिर बर्थडे किया। उन्होंने अपने मोबाइल पर पति (सुल्तान) की पुलिस वाली टोपी लगाए बेटी की फोटो डीपी में लगाकर रखी है। अब पति की यादें और बेटी अग्रिमा ही उनकी जिंदगी का सहारा हैं।

शिक्षा विभाग में नहीं मिली नौकरी...
‘पुलिस की नौकरी मेरी इच्छा नहीं मजबूरी है...’ शहीद सुल्तान की पत्नी उर्मिला के ये शब्द अहसास कराते हैं कि पति की मौत के बाद कहीं न कहीं वह अपने और अपनी मासूम बेटी के लिए एक सशक्त नारी शक्ति के रूप में समाज के सामने खड़ा होना चाहती है। शिक्षिका बनकर बताना चाहती है कि समाज में अपराधी विकास दुबे की तरह नहीं, जांबाज सिपाही की तरह छवि बनाओ, लेकिन उनकी यह उम्मीद धूमिल हो गई है। उर्मिला ने ‘अमर उजाला’ से हुई बातचीत में बताया कि पति सुल्तान जब शहीद हुए थे, शासन-प्रशासन के बड़े-बड़े अधिकारी मिले थे। सभी ने नौकरी का आश्वासन दिया था। इस पर उन्होंने शिक्षा विभाग में नौकरी करने की इच्छा जताई थी। उर्मिला ने बताया कि वह शिक्षिका की योग्यता भी रखती हैं। लेकिन शासन-प्रशासन स्तर से उन्हें शिक्षा विभाग में नौकरी देने से मना कर दिया गया। मुख्यमंत्री कार्यालय से इसका एक पत्र भी मिला था। वह अपनी बात लेकर झांसी और कानपुर में डीएम व एसएसपी से भी मिलीं लेकिन कुछ नहीं हुआ। उर्मिला का कहना है कि अब पुलिस विभाग में ही नौकरी देने के आश्वासन पर उन्होंने एसआई के लिए तैयारी शुरू की है, अब यदि उन्हें दौड़ आदि की परीक्षा में कुछ छूट मिल जाए तो यह नौकरी उन्हें मिल सकती है। उर्मिला ने बताया कि पति के साथ वह हमेशा हाउस वाइफ की तरह रहीं, कभी पुलिस में नौकरी के बारे में सोचा तक नहीं। वह कहती हैं कि इस कठिन परीक्षा में पास हो पाना बहुत मुश्किल दिख रहा पता नहीं आगे क्या होगा?
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