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घटेगा दवाओं का बोझ, होगी खोज
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 06 May 2016 12:32 AM IST
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- फोटो : demo
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झांसी। देश की पांचवीं आयुर्वेदिक फार्मेसी झांसी के क्षेत्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान में खुलने जा रही है। इसके बाद झांसी से ही आयुर्वेद दवाएं बनाकर केंद्रीय शोध संस्थानों और उनमें बने आयुर्वेद अस्पतालों में भेजी जाएंगी। इससे अस्पतालों में दवाओं की सप्लाई कराने वाले इंडियन मेडिसिन फार्मास्युटिकल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (आईएमपीसीएल) का बोझ कम हो जाएगा। वहीं, औषधियों से नई-नई दवाओं की खोज करने पर शोध भी होगा।
मौजूदा समय में देश में 30 केंद्रीय शोध संस्थान हैं। इनमें से लखनऊ, ईटानगर, गुवाहटी, भुवनेश्वर, कलकत्ता, मुंबई, नागपुर, विजयवाड़ा, जम्मू, पटियाला, दिल्ली, ग्वालियर समेत दो दर्जन संस्थानों के अस्पतालों में ओपीडी और आईपीडी चल रही है, जहां रोजाना दर्जनों मरीज सेवाएं लेने आते हैं। वहीं, ईटानगर, गुवाहटी, नागपुर, पोर्टब्लेयर में आदिवासी स्वास्थ्य सुरक्षा परियोजना संचालित होने से डॉक्टरों की टीम डोर-टू-डोर जाकर उन्हें दिनचार्य में सुधार लाने समेत रोगों को दूर करती है।
इन संस्थानों में उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में स्थापित इंडियन मेडिसिन फार्मास्युटिकल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (आईएमपीसीएल) फार्मेसी द्वारा दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। ऐसी एकमात्र फार्मेसी होने से आयुर्वेदिक चिकित्सालयों में दवाओं की आपूर्ति कम हो पा रही है। वहीं, कोलकाता, चेन्नई और पटियाला में बनी फार्मेसी सिर्फ अनुसंधान दवाएं ही बनते हैं। इसके मद्देनजर झांसी में बनने वाली फार्मेसी अब इन चिकित्सालयों में दवाओं की कमी पूरी करेगी।
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क्षेत्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान के संस्थान के प्रभारी वैज्ञानिक डॉ. रमाशंकर ने बताया कि झांसी की फार्मेसी से शोध संस्थानों और चिकित्सालयों में दवाओं की सप्लाई होगी। फार्मेसी में औषधियों के जरिए नई दवाओं की खोज भी की जाएगी। फार्मेसी के लिए केंद्र सरकार द्वारा करीब पंद्रह करोड़ रुपये का बजट तय कर दिया है।
जल, मृदा, पर्यावरण परीक्षण की रिपोर्ट ‘ओके’
जल, मृदा, पर्यावरण परीक्षण की ‘ओके’ रिपोर्ट मिलने के बाद ही फार्मेसी खोले जाने को हरी झंडी मिली है। पेड़, पौधों में जमीन, पानी, पर्यावरण के जरिए ही हैवी मैटल आ जाते हैं। पेड़, पौधों से औषधि तैयार करते समय ये हैवी मैटल समाहित हो जाते हैं, जो कि नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसके मद्देनजर झांसी में मर्करी, लेड, आर्सेनिक इन तीनों हैवी मैटल पर शोध किया गया। यहां यह तीनों धातु नहीं मिली।
कम पानी वाले पौधे लगाएंगे
औषधियां ईजाद करने के लिए वृहद पौधरोपण कार्यक्रम चलाया जाएगा। ग्वालियर रोड क्रासिंग के ठीक बगल में खाली पड़ी क्षेत्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान की जमीन पर 35 से 40 कम पानी सींचने वाले पौधे लगाए जाएंगे। वहीं, 200 से 500 तक अशोक के पेड़ लगाने की भी योजना है।
50 प्रकार की दवाएं बनेंगी
पहले चरण में फार्मेसी में पचास प्रकार की दवाएं बनाई जाएगी। यहां पर पाउडर, टैबलेट, कैप्सूल, क्वाथ सभी प्रकार की दवाएं बनेंगी। इसके बाद जैसे-जैसे केंद्र सरकार द्वारा दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे दवाओं के प्रकार में इजाफा किया जाएगा। डॉ. रमाशंकर के मुताबिक यहां जोड़ रोग, मांसपेशियों में असरदार अश्वगंधा चूर्ण, यौन रोगों के इलाज में इस्तेमाल आने वाला शतावरी चूर्ण, गैस, आंखों की रोशनी, बाल झड़ने से रोकने में फायदेमंद त्रिपला चूर्ण, खांसी, मौसमी बुखार व अस्थमा के लिए लाभदायक कंटकारी चूर्ण तैयार कराया जाएगा।
वहीं, नींद न आने में फायदेमंद सर्पगंधा, लीवर की बीमारी, त्वचा रोग के लिए कत्था चूर्ण, मधुमेह रोगियों के लिए गुड़मार, ह्रदय रोगियों के लिए अर्जुन चूर्ण, शरीर में चुस्ती-फूर्ती लाने को बाबूलासव, पलास छार व बीज, अमलवी चूर्ण, गोछुरु चूर्ण आदि बनाए जाएंगे।
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मौजूदा समय में देश में 30 केंद्रीय शोध संस्थान हैं। इनमें से लखनऊ, ईटानगर, गुवाहटी, भुवनेश्वर, कलकत्ता, मुंबई, नागपुर, विजयवाड़ा, जम्मू, पटियाला, दिल्ली, ग्वालियर समेत दो दर्जन संस्थानों के अस्पतालों में ओपीडी और आईपीडी चल रही है, जहां रोजाना दर्जनों मरीज सेवाएं लेने आते हैं। वहीं, ईटानगर, गुवाहटी, नागपुर, पोर्टब्लेयर में आदिवासी स्वास्थ्य सुरक्षा परियोजना संचालित होने से डॉक्टरों की टीम डोर-टू-डोर जाकर उन्हें दिनचार्य में सुधार लाने समेत रोगों को दूर करती है।
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इन संस्थानों में उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में स्थापित इंडियन मेडिसिन फार्मास्युटिकल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (आईएमपीसीएल) फार्मेसी द्वारा दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। ऐसी एकमात्र फार्मेसी होने से आयुर्वेदिक चिकित्सालयों में दवाओं की आपूर्ति कम हो पा रही है। वहीं, कोलकाता, चेन्नई और पटियाला में बनी फार्मेसी सिर्फ अनुसंधान दवाएं ही बनते हैं। इसके मद्देनजर झांसी में बनने वाली फार्मेसी अब इन चिकित्सालयों में दवाओं की कमी पूरी करेगी।
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क्षेत्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान के संस्थान के प्रभारी वैज्ञानिक डॉ. रमाशंकर ने बताया कि झांसी की फार्मेसी से शोध संस्थानों और चिकित्सालयों में दवाओं की सप्लाई होगी। फार्मेसी में औषधियों के जरिए नई दवाओं की खोज भी की जाएगी। फार्मेसी के लिए केंद्र सरकार द्वारा करीब पंद्रह करोड़ रुपये का बजट तय कर दिया है।
जल, मृदा, पर्यावरण परीक्षण की रिपोर्ट ‘ओके’
जल, मृदा, पर्यावरण परीक्षण की ‘ओके’ रिपोर्ट मिलने के बाद ही फार्मेसी खोले जाने को हरी झंडी मिली है। पेड़, पौधों में जमीन, पानी, पर्यावरण के जरिए ही हैवी मैटल आ जाते हैं। पेड़, पौधों से औषधि तैयार करते समय ये हैवी मैटल समाहित हो जाते हैं, जो कि नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसके मद्देनजर झांसी में मर्करी, लेड, आर्सेनिक इन तीनों हैवी मैटल पर शोध किया गया। यहां यह तीनों धातु नहीं मिली।
कम पानी वाले पौधे लगाएंगे
औषधियां ईजाद करने के लिए वृहद पौधरोपण कार्यक्रम चलाया जाएगा। ग्वालियर रोड क्रासिंग के ठीक बगल में खाली पड़ी क्षेत्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान की जमीन पर 35 से 40 कम पानी सींचने वाले पौधे लगाए जाएंगे। वहीं, 200 से 500 तक अशोक के पेड़ लगाने की भी योजना है।
50 प्रकार की दवाएं बनेंगी
पहले चरण में फार्मेसी में पचास प्रकार की दवाएं बनाई जाएगी। यहां पर पाउडर, टैबलेट, कैप्सूल, क्वाथ सभी प्रकार की दवाएं बनेंगी। इसके बाद जैसे-जैसे केंद्र सरकार द्वारा दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे दवाओं के प्रकार में इजाफा किया जाएगा। डॉ. रमाशंकर के मुताबिक यहां जोड़ रोग, मांसपेशियों में असरदार अश्वगंधा चूर्ण, यौन रोगों के इलाज में इस्तेमाल आने वाला शतावरी चूर्ण, गैस, आंखों की रोशनी, बाल झड़ने से रोकने में फायदेमंद त्रिपला चूर्ण, खांसी, मौसमी बुखार व अस्थमा के लिए लाभदायक कंटकारी चूर्ण तैयार कराया जाएगा।
वहीं, नींद न आने में फायदेमंद सर्पगंधा, लीवर की बीमारी, त्वचा रोग के लिए कत्था चूर्ण, मधुमेह रोगियों के लिए गुड़मार, ह्रदय रोगियों के लिए अर्जुन चूर्ण, शरीर में चुस्ती-फूर्ती लाने को बाबूलासव, पलास छार व बीज, अमलवी चूर्ण, गोछुरु चूर्ण आदि बनाए जाएंगे।