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लॉकडाउन का एक साल : सवालों के घेरे में झांसी की आरटीपीसीआर जांच की हकीकत

Fri, 26 Mar 2021 03:06 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, झांसी
अमर उजाला नेटवर्क, झांसी Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Fri, 26 Mar 2021 03:06 AM IST
सार

  • एक मशीन खराब, दो पर ही जांच का पूरा भार
  • पहले रिपोर्ट आने में लगते थे 24 से 48 घंटे, तीन मशीनों पर होता था काम
  • अब रोज धड़ाधड़ आ रहीं लगभग 1100 रिपोर्ट, क्या मानकों में हुई लापरवाही
  • मेडिकल कॉलेज सूत्रों के अनुसार सरकार को आंकड़े दिखाने की कवायद

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Reality of Jhansi RTPCR investigation under question
demo - फोटो : PTI

विस्तार

झंसी में भी कोरोना संक्रमण रफ्तार पकड़ रहा है। पिछले साल भी झांसी प्रदेश के संवेदनशील जिलों में शुमार था। यहां कोरोना से मृत्यु दर चिंता का विषय रही। संक्रमण की सही रफ्तार को जानने और इसकी रोकथाम के लिए प्रधानमंत्री अन्य जांच की अपेक्षा अधिक से अधिक आरटीपीसीआर जांच करने पर बल दे रहे हैं। इधर, मेडिकल कॉलेज में आरटीपीसीआर जांच की तीन में से एक मशीन खराब है। पूरा भार दो मशीनों पर है। इन पर ही रोज तकरीबन 1000-1100 सैंपल की आरटीपीसीआर जांच हो रही है। 

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कोरोना संक्रमण जब चरम पर था तब आरटीपीसीआर जांच रिपोर्ट आने में 24 से 48 घंटे लगते थे। अब एक ही दिन में रोज लगभग 1100 आरटीपीसीआर जांच की रिपोर्ट आ रही हैं। ऐसे में रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। मेडिकल कॉलेज सूत्रों के अनुसार संक्रमण पर शिकंजा कसने की अपेक्षा मेडिकल कॉलेज व प्रशासनिक अफसरों द्वारा सरकार को जांच की संख्या ज्यादा दिखाकर वाहवाही लूटने की कवायद अधिक है।
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सैंपल कलेक्शन के बाद जांच की पूरी प्रक्रिया में लगते आठ घंटे
आरटीपीसीआर जांच की प्रक्रिया काफी लंबी है। शहर में जगह-जगह सैंपल लिए जाने के बाद वे सीएमओ ऑफिस आते हैं। यहां से इन्हें मेडिकल कॉलेज भेजा जाता है। मेडिकल कॉलेज सूत्र के अनुसार मेडिकल कॉलेज में आने के बाद कनसाइनमेंट तैयार होता है। आरएनए अलग किया जाता है। यह एक वैज्ञानिक और लंबी प्रक्रिया है। इसके बाद सैंपलों को मशीन में कम से कम ढाई घंटे के लिए लगाया जाता है। एक बार में एक मशीन में 96 सैंपल लगाए जाते हैं। पांच सैंपलों का पूल बनाया जाता है। 
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किसी पूल में अगर संक्रमण की पुष्टि होती है तो उस पूल के सभी पांच सैंपलों को अलग-अलग दोबारा ढाई घंटे के लिए मशीन में लगाकर जांचा जाता है। फिर पुष्टि होती है कि पांच में से किस एक या अधिक में संक्रमण था। इसीलिए जांच रिपोर्ट आने में पहले 24 से 48 घंटे लगते थे। आखिर एक मशीन कम होने के बाद कैसे रोज के रोज हजार से अधिक रिपोर्ट आ रही हैं इसकी सटीक जानकारी कोई नहीं दे पा रहा है।


म्यूटेंट वायरस को कैसे पकड़ेंगे
देश के कई हिस्सों में दूसरे स्ट्रेन के वायरस या म्यूटेंट वायरस के मामले सामने आए हैं। झांसी मेडिकल कॉलेज में म्यूटेंट वायरस की परख करने वाली कोई मशीन या तकनीक नहीं है। दरअसल इस प्रक्रिया को सीक्वेंसिंग कहा जाता है। जानकारी के अनुसार कुल सैंपल के पांच प्रतिशत को सीक्वेंसिंग के लिए लखनऊ की किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) भेजा जाता है। पूरे प्रदेश से वहां सैंपल पहुंचते हैं। अभी तक वहां से कोई रिपोर्ट नहीं आई है।

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