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‘रानी’ की यादों को तरसता ‘महल’
Tue, 16 Apr 2019 12:53 AM IST
देवेंद्र कुमार
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Published by: देवेंद्र कुमार
Updated Tue, 16 Apr 2019 12:53 AM IST
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rani mahal jhansi
- फोटो : amarujala
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शासन की उपेक्षा से वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई (मनु) का रानीमहल बदहाल होता जा रहा है। यहां रानी की एक भी निशानी नहीं है। कुछ वर्ष पूर्व रानी के शयनकक्ष में यादें थी भीं, लेकिन वह भी खत्म हो गईं। दरबार हॉल, रानी के कक्ष की भव्यता भी कम होती जा रही है। कहने को यह महल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित है, लेकिन बेहतर योजना के अभाव में यह ऐतिहासिक पुरातात्विक इमारत अपना रूप खोती जा रही है। रही सही कसर महल में भरी प्राचीन प्रतिमाएं पूरी कर रही हैं। ऐसे में सैलानियों को निराशा उठानी पड़ रही है।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में रानीमहल का अहम स्थान है। ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा जब झांसी दुर्ग का अधिग्रहण कर लिया गया तब रानी लक्ष्मीबाई ने इस महल को अपना आवास बनाया था। तीन मंजिला रहे, इस भवन के पहले तल के हॉल में चुंगी, लगान जमा होता था। लोग अपनी शिकायत लेकर रानी के पास आते थे। जबकि दूसरे मंजिल के हॉल में रानी पर्दे के पीछे रहकर अतिथियों से मुलाकात करती थीं। इसके बाद के कक्षों में वह रहती थीं। अंग्रेजों ने यह महल कोतवाली के रूप में संचालित किया।
सन 1970 में रानीमहल को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने अपने संरक्षण में ले लिया। यहां पर ललितपुर तथा बुंदेलखंड के आस पास के स्थानों पर पाई जाने वाली प्राचीन मूर्तियां रखी जाने लगीं। महल का अधिकाँश हिस्सा मूर्तियों से भर गया। इन मूर्तियों को भी यूं ही रखकर छोड़ दिया गया। इनके बारे में कोई जानकारी का भी वहां उल्लेख नहीं किया गया।
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यही नहीं, महल में रानी लक्ष्मीबाई से जुड़ा कोई स्मृति चिह्न भी नहीं है। 17 वीं सदी के भित्ति चित्र भी मिटते जा रहे हैं। रंग रोगन का भी दीवारों पर अभाव है। महल को देखने के लिए पहुंचे सैलानियों को यहां खासी निराशा झेलनी पड़ी। उन्होंने बताया कि रानीमहल के बारे में काफी कुछ पढ़ रखा था, लेकिन यहां आकर उन्हें वाकई निराशा हुई। पता ही नहीं चलता है कि महल में कहां वीरांगना रहती थीं और उद्यान का क्या महत्व है?
यहां आकर उन्हें निराशा हुई है। रानी लक्ष्मीबाई से जुड़ा महल में कुछ नहीं है। प्राचीन मूर्तियां रखी गई हैं तो इनके बारे में भी पता चलना चाहिए।
गणेश, निवासी महाराष्ट्र
रानीमहल में कुछ भी पता नहीं चल रहा है कि रानी का दरबार कहा लगता था। उनका कक्ष कौन सा है। उद्यान में क्या होता था। यहां आकर अजीब लग रहा है।
दिनेश सिंह, निवासी बांदा
रानी से जुड़ी जो सामग्री है, उसका पुनर्निर्माण कर महल में रखा जाए। कक्षों और हॉल में परदे व झूमर लगाने और रंग रोगन से महल की सुंदरता पुन: लौट आएगी। सूचना पट लगाने से सैलानियों को पता चल सकेगा कि किधर क्या था।
मुकुंद महरोत्रा अध्यक्ष पुलिंद कला दीर्घा
नहीं मिला कोई जवाब
रानीमहल की बदहाली के संबंध में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधिकारियों से किला स्थित कार्यालय में संपर्क किया गया, लेकिन वह नहीं मिले। इसके अलावा विभाग के लखनऊ स्थित कार्यालयों के फोन नंबर 05222256336 और 05222208230 पर भी संपर्क किया गया। लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।
यह है रानीमहल
किले के बाहर शहर दरवाजे से लगभग 300 मीटर की दूरी पर नेवालकर वंश के सूबेदार रघुनाथ राव द्वितीय ने 1769 से 1796 के बीच इस महल का निर्माण कराया था। दुर्ग पर अंग्रेजों के अधिग्रहण के बाद रानी लक्ष्मीबाई ने इस महल क ो आपात स्थिति में अपना आवास बनाया था। इस महल में छह बडे़ कक्ष हैं। एक फव्वारा है और उद्यान है। चूने के मसाले से बने विभिन्न पशु - पक्षियों क ी आकृतियां व मयूर, वृक्ष, लताएं, फूलों आदि के चित्र बने हुए हैं। हालांकि इनमें से अधिकांश चित्र मिट चुके हैं। खिड़कियां भी टूटने की कगार पर हैं।
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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में रानीमहल का अहम स्थान है। ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा जब झांसी दुर्ग का अधिग्रहण कर लिया गया तब रानी लक्ष्मीबाई ने इस महल को अपना आवास बनाया था। तीन मंजिला रहे, इस भवन के पहले तल के हॉल में चुंगी, लगान जमा होता था। लोग अपनी शिकायत लेकर रानी के पास आते थे। जबकि दूसरे मंजिल के हॉल में रानी पर्दे के पीछे रहकर अतिथियों से मुलाकात करती थीं। इसके बाद के कक्षों में वह रहती थीं। अंग्रेजों ने यह महल कोतवाली के रूप में संचालित किया।
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सन 1970 में रानीमहल को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने अपने संरक्षण में ले लिया। यहां पर ललितपुर तथा बुंदेलखंड के आस पास के स्थानों पर पाई जाने वाली प्राचीन मूर्तियां रखी जाने लगीं। महल का अधिकाँश हिस्सा मूर्तियों से भर गया। इन मूर्तियों को भी यूं ही रखकर छोड़ दिया गया। इनके बारे में कोई जानकारी का भी वहां उल्लेख नहीं किया गया।
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यही नहीं, महल में रानी लक्ष्मीबाई से जुड़ा कोई स्मृति चिह्न भी नहीं है। 17 वीं सदी के भित्ति चित्र भी मिटते जा रहे हैं। रंग रोगन का भी दीवारों पर अभाव है। महल को देखने के लिए पहुंचे सैलानियों को यहां खासी निराशा झेलनी पड़ी। उन्होंने बताया कि रानीमहल के बारे में काफी कुछ पढ़ रखा था, लेकिन यहां आकर उन्हें वाकई निराशा हुई। पता ही नहीं चलता है कि महल में कहां वीरांगना रहती थीं और उद्यान का क्या महत्व है?
यहां आकर उन्हें निराशा हुई है। रानी लक्ष्मीबाई से जुड़ा महल में कुछ नहीं है। प्राचीन मूर्तियां रखी गई हैं तो इनके बारे में भी पता चलना चाहिए।
गणेश, निवासी महाराष्ट्र
रानीमहल में कुछ भी पता नहीं चल रहा है कि रानी का दरबार कहा लगता था। उनका कक्ष कौन सा है। उद्यान में क्या होता था। यहां आकर अजीब लग रहा है।
दिनेश सिंह, निवासी बांदा
रानी से जुड़ी जो सामग्री है, उसका पुनर्निर्माण कर महल में रखा जाए। कक्षों और हॉल में परदे व झूमर लगाने और रंग रोगन से महल की सुंदरता पुन: लौट आएगी। सूचना पट लगाने से सैलानियों को पता चल सकेगा कि किधर क्या था।
मुकुंद महरोत्रा अध्यक्ष पुलिंद कला दीर्घा
नहीं मिला कोई जवाब
रानीमहल की बदहाली के संबंध में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधिकारियों से किला स्थित कार्यालय में संपर्क किया गया, लेकिन वह नहीं मिले। इसके अलावा विभाग के लखनऊ स्थित कार्यालयों के फोन नंबर 05222256336 और 05222208230 पर भी संपर्क किया गया। लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।
यह है रानीमहल
किले के बाहर शहर दरवाजे से लगभग 300 मीटर की दूरी पर नेवालकर वंश के सूबेदार रघुनाथ राव द्वितीय ने 1769 से 1796 के बीच इस महल का निर्माण कराया था। दुर्ग पर अंग्रेजों के अधिग्रहण के बाद रानी लक्ष्मीबाई ने इस महल क ो आपात स्थिति में अपना आवास बनाया था। इस महल में छह बडे़ कक्ष हैं। एक फव्वारा है और उद्यान है। चूने के मसाले से बने विभिन्न पशु - पक्षियों क ी आकृतियां व मयूर, वृक्ष, लताएं, फूलों आदि के चित्र बने हुए हैं। हालांकि इनमें से अधिकांश चित्र मिट चुके हैं। खिड़कियां भी टूटने की कगार पर हैं।