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रेलवे ने बनाया ऐसा इंजन, जिसमें बिजली खर्च नहीं बल्कि बनेगी
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झांसी। झांसी के एसी लोको शेड के अफसरों व कर्मचारियों ने एक इंजन में री- जनरेटिंग ब्रेकिंग सिस्टम को तैयार किया है। इस पद्धति में ब्रेक दबाने पर दोबारा बिजली बनकर ग्रिड में चली जाती है। भारतीय रेलवे का यह पहला इंजन है, जिसमें इस सिस्टम को विकसित किया गया है। दूसरे इंजनों में इस पद्धति को लगाने के लिए रेलवे बोर्ड से अनुमति मांगी गई है।
भारतीय रेलवे का पहला इलेक्ट्रिक इंजन (लोको) का मरम्मत कारखाना 1987 में झांसी में स्थापित किया गया था। वर्तमान में शेड के पास 215 इंजन हैं, जिनकी मरम्मत का काम यहां पर एक निश्चित अवधि में हो रहा है। ये सभी इंजन डीसी करंट से चलते हैं। हाल में ही यहां के अधिकारी व सुपरवाइजरों की देखरेख में कर्मचारियों ने भेल के सहयोग से इंजन नंबर 24517 डब्लूएसी में नई तकनीक (री- जनरेटिंग ब्रेकिंग सिस्टम) विकसित की है। ये तकनीक ब्रेक लगाने में खर्च होने वाली ऊर्जा को बचाती है। साथ ही ब्रेक लगाते समय एक जनरेटर चलता है, जिसकी मदद से दोबारा बिजली बनकर ग्रिड में चली जाती है। इससे ब्रेक और पहिये कम घिसेंगे। ज्यादा मरम्मत नहीं करनी होगी। ब्रेक भी और अधिक प्रभावी ढंग से काम करेंगे। लुधियाना एसी लोको शेड में भी अब इस तकनीक का इस्तेमाल इंजनों में किया जा रहा है।
- रेलवे बोर्ड ने इस नई तकनीक पर खुशी जाहिर कर शेड को 25 हजार रुपये का ईनाम दिया है। बाकी इंजनों में भी इस सिस्टम को लगाया जाएगा, जिसके लिए रेलवे बोर्ड से ऑर्डर मांगा है।
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मयंक शांडिल्य, वरिष्ठ मंडल विद्युत अभियंता
शेड को दोबारा मिला आईएसओ प्रमाण पत्र
एसी लोको शेड का इलेक्ट्रिक इंजनों की मरम्मत में जलवा कायम है। शेड के पास 215 से अधिक इलेक्ट्रिक इंजनों की मरम्मत का जिम्मा है। यहां होने वाली मरम्मत के बेहतर परिणाम सामने आए हैं। यही कारण है कि झांसी लोको शेड को दोबारा आईएसओ प्रमाण दिया गया है।
शेड में काम करते हैं 550 कर्मचारी
एसी लोको शेड में 550 कर्मचारी हैं, जो अलग- अलग तीन पालियों में सातों दिन काम करते हैं। शेड के पास 215 इंजनों की मरम्मत का जिम्मा है। इनमें एक इंजन की माइनर शिड्यूल के तहत हर दो महीने और मेजर शिड्यूल में हर दो साल में मरम्मत होती है। मेजर शिड्यूल में इंजन को पूरी तरह खोलकर रिपेयरिंग की जाती है। एक इंजन की कीमत करीब दस करोड़ की होती है। इसकी उम्र लगभग 35 साल होती है। इसके बाद इंजन को कंडम घोषित कर दिया जाता है।
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भारतीय रेलवे का पहला इलेक्ट्रिक इंजन (लोको) का मरम्मत कारखाना 1987 में झांसी में स्थापित किया गया था। वर्तमान में शेड के पास 215 इंजन हैं, जिनकी मरम्मत का काम यहां पर एक निश्चित अवधि में हो रहा है। ये सभी इंजन डीसी करंट से चलते हैं। हाल में ही यहां के अधिकारी व सुपरवाइजरों की देखरेख में कर्मचारियों ने भेल के सहयोग से इंजन नंबर 24517 डब्लूएसी में नई तकनीक (री- जनरेटिंग ब्रेकिंग सिस्टम) विकसित की है। ये तकनीक ब्रेक लगाने में खर्च होने वाली ऊर्जा को बचाती है। साथ ही ब्रेक लगाते समय एक जनरेटर चलता है, जिसकी मदद से दोबारा बिजली बनकर ग्रिड में चली जाती है। इससे ब्रेक और पहिये कम घिसेंगे। ज्यादा मरम्मत नहीं करनी होगी। ब्रेक भी और अधिक प्रभावी ढंग से काम करेंगे। लुधियाना एसी लोको शेड में भी अब इस तकनीक का इस्तेमाल इंजनों में किया जा रहा है।
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- रेलवे बोर्ड ने इस नई तकनीक पर खुशी जाहिर कर शेड को 25 हजार रुपये का ईनाम दिया है। बाकी इंजनों में भी इस सिस्टम को लगाया जाएगा, जिसके लिए रेलवे बोर्ड से ऑर्डर मांगा है।
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मयंक शांडिल्य, वरिष्ठ मंडल विद्युत अभियंता
शेड को दोबारा मिला आईएसओ प्रमाण पत्र
एसी लोको शेड का इलेक्ट्रिक इंजनों की मरम्मत में जलवा कायम है। शेड के पास 215 से अधिक इलेक्ट्रिक इंजनों की मरम्मत का जिम्मा है। यहां होने वाली मरम्मत के बेहतर परिणाम सामने आए हैं। यही कारण है कि झांसी लोको शेड को दोबारा आईएसओ प्रमाण दिया गया है।
शेड में काम करते हैं 550 कर्मचारी
एसी लोको शेड में 550 कर्मचारी हैं, जो अलग- अलग तीन पालियों में सातों दिन काम करते हैं। शेड के पास 215 इंजनों की मरम्मत का जिम्मा है। इनमें एक इंजन की माइनर शिड्यूल के तहत हर दो महीने और मेजर शिड्यूल में हर दो साल में मरम्मत होती है। मेजर शिड्यूल में इंजन को पूरी तरह खोलकर रिपेयरिंग की जाती है। एक इंजन की कीमत करीब दस करोड़ की होती है। इसकी उम्र लगभग 35 साल होती है। इसके बाद इंजन को कंडम घोषित कर दिया जाता है।