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राजकुमारी गौरा की आत्मबलिदान गाथा सुन नम हो जाती हैं क्षत्राणियों की आंखें
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Princess Gaura story hear Chatradi eyes come tier
- फोटो : DEHAT
झांसी। दतिया के सूर्य महल में लाल रंग के दो हाथों के चिह्न आज भी अपने सीने में एक ऐसी कहानी समेटे हुए हैं, जिसे सुनकर बुंदेलखंड के लोगों और खासकर क्षत्राणियों की आंखों में आंसू आ जाते हैं। सत्ता के समीकरणों में उलझी इस प्रेम कहानी में राजकुमारी अपने प्यार को नहीं पा सकी तो उसने इस दुनिया को ही अलविदा कह दिया। इस बार भी इस आत्मबलिदान के पीछे मुगल ही थे। जहांगीर ओरछा की सत्ता के बदले वीर सिंह से राजकुमारी का हाथ चाहता था जो न तो बुंदेला राजवंश को मंजूर था और न गौरा को।
दतिया के पांच सौ वर्ष पुराने सूर्य महल के अंदर आज भी लाल रंग के दो हाथों के निशान दिखाई देते हैं, एक लोक कथा के अनुसार कहां जाता है राजकुमारी गौरा ने इसी जगह आत्मबलिदान किया था। इन निशानों को बाद में स्मृति के रूप में रखने के लिए राजवंश ने पक्के लाल रंग से उकेर दिए थे। इनका रंग अब फीका पड़ चुका है। इस संबंध में रेलवे के सेवानिवृत्त अधिकारी रामनिवास शर्मा ने एक किताब भी लिखी है, जिसमें इस बलिदान गाथा का सिलसिलेवार वर्णन है। इस संबंध में झांसी के इतिहासकार हरगोविंद कुशवाहा बताते हैं कि रामनिवास शर्मा की पुस्तक और वह यमुना में समा गई में इस कहानी का उल्लेख है। उन्होंने बताया कि बुंदेला राजा वीरसिंह जू देव ने अकबर के विश्वस्त सेनापति अबुल फजल को दक्षिण विजय से लौटते समय मारकर जहांगीर का आगरा की गद्दी पर बैठने का रास्ता साफ कर दिया था। पहले जहांगीर आगरा की गद्दी पर बैठे तथा बाद में रामशाह को हटाकर अपने मित्र वीर सिंह को ओरछा की गद्दी पर बैठा दिया। राज्याभिषेक के मौके पर जहांगीर स्वयं भी ओरछा आए तथा जिस महल में रुके थे वह जहांगीर महल के नाम से जाना जाता है। कुशवाहा के अनुसार जहांगीर महल के पास राजा महल में समारोह आयोजित किया गया। जहांगीर उसमें शामिल हुआ उसी दौरान उसकी नजर पड़ी राजकुमारी गौरा पर और उन्होंने बुंदेला राजाओं के सामने गौरा को अपनी बेगम बनाने का प्रस्ताव रख दिया। उधर, गौरा करैरा के परमार राजकुमार से अपनी शादी के सपने देख रही थी। जहांगीर के प्रस्ताव से कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया। वीर सिंह बुंदेला ने कहा जहांपनाह हम बिना गौरा की मर्जी के कोई भी निर्णय नहीं ले सकते हैं, हम उसकी राय जानेंगे, तभी फैसला लेंगे। जहांगीर ने उदाहरण पेश किया, आमेर के राजपूत राजवंश से ही उनकी मां जोधाबाई भी हैं, वीरसिंह की त्यौरी चढ़ गई, उन्होंने कहा महाराज यह बुंदेला राजवंश है। गौरा अपने कक्ष में अपनी दासी कमला नाइन के साथ बैठी हुई थी, दोनों के बीच यह अजब संयोग ही था कि वे दोनों इतनी हमशक्ल थी कि अगर गौरा के विशिष्ट वस्त्र उतार दिए जाएं तो यह पहचान पाना मुश्किल होता था कि कौन गौरा है और कौन कमला। दोनों ठिठौली कर रहीं थी, राजकुमारी आपको तो करैरा का राजकुमार ले जाएगा, गौरा ने कहा तू चंद्रपुरा के मणिराम की दुल्हन बनेगी। अचानक वीर सिंह ने कक्ष में प्रवेश किया और उन दोनों ने खड़ी होकर कहा कक्का जू प्रणाम, वीरसिंह ने उदासी भरे स्वर में कहा बेटा गौरा हम धर्म संकट में हैं, अब आप ही इसका निदान बताओ। गौरा ने कहा कक्का जू हम क्षत्राणी हैं, हम अपने प्राण देकर भी आप पर संकट नहीं आने देंगे। वीर सिंह ने जहांगीर का प्रस्ताव गौरा को बताया, राजकुमारी की आंखें रक्तिम हो गईं, उसने आक्रोश को दबाते हुए कहा कक्का जू मेरा बचपन दतिया में बीता है, इसलिए शादी से पहले मुझे एक बार दतिया के महल ले जाए जाए। वीरसिंह राजकुमारी को लेकर दतिया के सूर्यमहल में पहुंचे । वीर सिंह कुछ समझ पाते इसके पहले ही राजकुमारी ने उनके बगल में लगी हुई तलवार को म्यान से निकाला और दोनों हाथों को खून से लहूलुहान कर लिया तथा दोनों हस्त चिह्न दीवार पर लगाकर कहा कक्का जू यह इस वंश की बेटियों के लिए इस बात की निशानी है कि या तो वे अपने सपनों के राजकुमार के साथ जाएगी या फिर आत्मोत्सर्ग करेंगी, गौरा ने तलवार से अपना सिर धड़ से अलग कर लिया। उधर, ओरछा में जहांगीर महल में काजी कासिम अली निकाह की तैयारी कर चुके थे, काफी मंत्रणा के बाद तात्कालिक संकट टालने के लिए गौरा की हमशक्ल कमला नाइन को नकली गौरा बनाकर जहांगीर से निकाह करवा दिया गया और उसका नाम हो गया बेगम शबनम। नकली गौरा की डोली आगर किले भेज दी गई, पर कमला अपने मणिराम को नहीं भूल सकी और उसने आगरा किले के पिछले दरवाजे से जाकर यमुना में छलांग लगाकर आत्म बलिदान कर दिया। इस संबंध में गाइड इंदर सिंह बुंदेला बताते हैं कि बहुत पहले रामनिवास शर्मा की यह पुस्तक रेलवे लाइब्रेरी में भी मौजूद थी।
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दतिया के पांच सौ वर्ष पुराने सूर्य महल के अंदर आज भी लाल रंग के दो हाथों के निशान दिखाई देते हैं, एक लोक कथा के अनुसार कहां जाता है राजकुमारी गौरा ने इसी जगह आत्मबलिदान किया था। इन निशानों को बाद में स्मृति के रूप में रखने के लिए राजवंश ने पक्के लाल रंग से उकेर दिए थे। इनका रंग अब फीका पड़ चुका है। इस संबंध में रेलवे के सेवानिवृत्त अधिकारी रामनिवास शर्मा ने एक किताब भी लिखी है, जिसमें इस बलिदान गाथा का सिलसिलेवार वर्णन है। इस संबंध में झांसी के इतिहासकार हरगोविंद कुशवाहा बताते हैं कि रामनिवास शर्मा की पुस्तक और वह यमुना में समा गई में इस कहानी का उल्लेख है। उन्होंने बताया कि बुंदेला राजा वीरसिंह जू देव ने अकबर के विश्वस्त सेनापति अबुल फजल को दक्षिण विजय से लौटते समय मारकर जहांगीर का आगरा की गद्दी पर बैठने का रास्ता साफ कर दिया था। पहले जहांगीर आगरा की गद्दी पर बैठे तथा बाद में रामशाह को हटाकर अपने मित्र वीर सिंह को ओरछा की गद्दी पर बैठा दिया। राज्याभिषेक के मौके पर जहांगीर स्वयं भी ओरछा आए तथा जिस महल में रुके थे वह जहांगीर महल के नाम से जाना जाता है। कुशवाहा के अनुसार जहांगीर महल के पास राजा महल में समारोह आयोजित किया गया। जहांगीर उसमें शामिल हुआ उसी दौरान उसकी नजर पड़ी राजकुमारी गौरा पर और उन्होंने बुंदेला राजाओं के सामने गौरा को अपनी बेगम बनाने का प्रस्ताव रख दिया। उधर, गौरा करैरा के परमार राजकुमार से अपनी शादी के सपने देख रही थी। जहांगीर के प्रस्ताव से कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया। वीर सिंह बुंदेला ने कहा जहांपनाह हम बिना गौरा की मर्जी के कोई भी निर्णय नहीं ले सकते हैं, हम उसकी राय जानेंगे, तभी फैसला लेंगे। जहांगीर ने उदाहरण पेश किया, आमेर के राजपूत राजवंश से ही उनकी मां जोधाबाई भी हैं, वीरसिंह की त्यौरी चढ़ गई, उन्होंने कहा महाराज यह बुंदेला राजवंश है। गौरा अपने कक्ष में अपनी दासी कमला नाइन के साथ बैठी हुई थी, दोनों के बीच यह अजब संयोग ही था कि वे दोनों इतनी हमशक्ल थी कि अगर गौरा के विशिष्ट वस्त्र उतार दिए जाएं तो यह पहचान पाना मुश्किल होता था कि कौन गौरा है और कौन कमला। दोनों ठिठौली कर रहीं थी, राजकुमारी आपको तो करैरा का राजकुमार ले जाएगा, गौरा ने कहा तू चंद्रपुरा के मणिराम की दुल्हन बनेगी। अचानक वीर सिंह ने कक्ष में प्रवेश किया और उन दोनों ने खड़ी होकर कहा कक्का जू प्रणाम, वीरसिंह ने उदासी भरे स्वर में कहा बेटा गौरा हम धर्म संकट में हैं, अब आप ही इसका निदान बताओ। गौरा ने कहा कक्का जू हम क्षत्राणी हैं, हम अपने प्राण देकर भी आप पर संकट नहीं आने देंगे। वीर सिंह ने जहांगीर का प्रस्ताव गौरा को बताया, राजकुमारी की आंखें रक्तिम हो गईं, उसने आक्रोश को दबाते हुए कहा कक्का जू मेरा बचपन दतिया में बीता है, इसलिए शादी से पहले मुझे एक बार दतिया के महल ले जाए जाए। वीरसिंह राजकुमारी को लेकर दतिया के सूर्यमहल में पहुंचे । वीर सिंह कुछ समझ पाते इसके पहले ही राजकुमारी ने उनके बगल में लगी हुई तलवार को म्यान से निकाला और दोनों हाथों को खून से लहूलुहान कर लिया तथा दोनों हस्त चिह्न दीवार पर लगाकर कहा कक्का जू यह इस वंश की बेटियों के लिए इस बात की निशानी है कि या तो वे अपने सपनों के राजकुमार के साथ जाएगी या फिर आत्मोत्सर्ग करेंगी, गौरा ने तलवार से अपना सिर धड़ से अलग कर लिया। उधर, ओरछा में जहांगीर महल में काजी कासिम अली निकाह की तैयारी कर चुके थे, काफी मंत्रणा के बाद तात्कालिक संकट टालने के लिए गौरा की हमशक्ल कमला नाइन को नकली गौरा बनाकर जहांगीर से निकाह करवा दिया गया और उसका नाम हो गया बेगम शबनम। नकली गौरा की डोली आगर किले भेज दी गई, पर कमला अपने मणिराम को नहीं भूल सकी और उसने आगरा किले के पिछले दरवाजे से जाकर यमुना में छलांग लगाकर आत्म बलिदान कर दिया। इस संबंध में गाइड इंदर सिंह बुंदेला बताते हैं कि बहुत पहले रामनिवास शर्मा की यह पुस्तक रेलवे लाइब्रेरी में भी मौजूद थी।
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