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पुराने जैमर नहीं रोक पाते व्हाटसएप कॉल, नए जैमर की खातिर पैसा नहीं
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झांसी। जेल के अंदर मोबाइल नेटवर्क खत्म करने के लिए जैमर लगवाए गए लेकिन, अब नई-नई तकनीक के आ जाने से यह काम के नहीं रह गए। इनकी मदद से सिर्फ थ्री जी आधारित नेटवर्क ही रोका जा सकता है जबकि अब अधिकांश मोबाइल कंपनियां फोर जी तकनीक सेवा का इस्तेमाल कर रही हैं। जेल प्रशासन के पास अपने जैमर अपडेट करने का बजट ही नहीं है। इसे देखते हुए वह मोबाइल कंपनियों की मदद से इसका तोड़ निकालने की कोशिश में है।
जेलों में कैदियों के मोबाइल फोन इस्तेमाल करने की घटनाओं के प्रकाश में आने पर हाईकोर्ट ने नाराजगी जताते हुए रोक लगाने की बात कही थी। इसके बाद जैमर अपडेट करने की कवायद शुरू हुई। प्रत्येक जेल में जैमर अपडेट करने में तीन से पांच करोड़ का खर्च था। इतनी बड़ी रकम खर्च करने से जेल प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए। जेल अधिकारियों का कहना है कि जिला कारागार केसाथ सेंट्रल जेल में भी थ्री-जी मोबाइल नेटवर्क रोकने के ही जैमर काम कर रहे हैं। यह जैमर भले थ्री-जी आधारित कहलाते हों लेकिन, इनसें टू-जी मोबाइल नेटवर्क ही रुक पाती है। ऐसे में फोर-जी आधारित मोबाइल नेटवर्क रोक पाना इन जैमर के बूते की बात नहीं रहती। कई जगहों पर कैदियों की पहुंच में स्मार्ट फोन वाले मोबाइल फोन हैं। सेटिंग-गेटिंग के जरिए आराम से व्हाट्सएप कॉल होती है।
अब जेल प्रशासन मोबाइल कंपनियों के सहारे जेल तक मोबाइल नेटवर्क को आने से रोकना चाहता है। डीजी जेल आनंद कुमार का कहना है कि जैमर लगाना जेल प्रशासन के लिए खासा खर्चीला है। तकनीक बदलने के साथ ही हमेशा जैमर अपडेट करने होंगे। इसको देखते हुए मोबाइल कंपनियों से इसका रास्ता निकालने की रणनीति बनाई जा रही है। इस संबंध में एक मामला कोर्ट में विचाराधीन है। उसका फैसला आने के बाद मोबाइल कंपनियों के लिए नियम बनाए जा सकते हैं।
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जेलों में कैदियों के मोबाइल फोन इस्तेमाल करने की घटनाओं के प्रकाश में आने पर हाईकोर्ट ने नाराजगी जताते हुए रोक लगाने की बात कही थी। इसके बाद जैमर अपडेट करने की कवायद शुरू हुई। प्रत्येक जेल में जैमर अपडेट करने में तीन से पांच करोड़ का खर्च था। इतनी बड़ी रकम खर्च करने से जेल प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए। जेल अधिकारियों का कहना है कि जिला कारागार केसाथ सेंट्रल जेल में भी थ्री-जी मोबाइल नेटवर्क रोकने के ही जैमर काम कर रहे हैं। यह जैमर भले थ्री-जी आधारित कहलाते हों लेकिन, इनसें टू-जी मोबाइल नेटवर्क ही रुक पाती है। ऐसे में फोर-जी आधारित मोबाइल नेटवर्क रोक पाना इन जैमर के बूते की बात नहीं रहती। कई जगहों पर कैदियों की पहुंच में स्मार्ट फोन वाले मोबाइल फोन हैं। सेटिंग-गेटिंग के जरिए आराम से व्हाट्सएप कॉल होती है।
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अब जेल प्रशासन मोबाइल कंपनियों के सहारे जेल तक मोबाइल नेटवर्क को आने से रोकना चाहता है। डीजी जेल आनंद कुमार का कहना है कि जैमर लगाना जेल प्रशासन के लिए खासा खर्चीला है। तकनीक बदलने के साथ ही हमेशा जैमर अपडेट करने होंगे। इसको देखते हुए मोबाइल कंपनियों से इसका रास्ता निकालने की रणनीति बनाई जा रही है। इस संबंध में एक मामला कोर्ट में विचाराधीन है। उसका फैसला आने के बाद मोबाइल कंपनियों के लिए नियम बनाए जा सकते हैं।
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