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झांसी-ललितपुर में तीन साल के भीतर दोगुना हुई गिद्दों की संख्या

Thu, 30 Jun 2022 01:36 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Thu, 30 Jun 2022 01:36 AM IST
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Number of vultures doubled in Jhansi-Lalitpur within three years
झांसी। बुंदेलखंड में विलुप्त हो रहे गिद्घों ने जीवन की जंग जीत ली है। डिक्लोफेनिक जैसी दवाओं की मारक क्षमता को मात देकर गिद्घ अब फिर से इस आबोहवा में लौटने लगे हैं। मामला यह है कि झांसी और ललितपुर में गिद्घों की संख्या तीन साल में दोगुनी हो गई है। ऐसे में झांसी, ललितपुर में 117 गिद्घों को देखा गया है।
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झांसी-ललितपुर में लगातर गिद्दों की संख्या बढ़ने से अब वन विभाग ने इनके संरक्षण के तैयारी कर ली है। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार मानसून अच्छा होने की वजह से गिद्द यहां प्रवास कर रहे हैं। मोंठ और मऊरानीपुर के आसपास जंगलों में गिद्घों की संख्या काफी बढ़ी है। वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यह पर्यावरण के लिए अच्छा माना जा रहा है।
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2018 की गणना 2021 की गणना
झांसी - 15 झांसी- 67
ललितपुर- 41 ललितपुर- 50
प्रकृति के सफाई कर्मी हैं गिद्ध
पर्यावरणीय संतुलन में गिद्धों की महत्वपूर्ण भूमिका है। गिद्ध मृत जानवरों को खाता है, जिसके चलते इसे प्रकृति का सफाई कर्मचारी भी कहा जाता है। गिद्धों की कमी के कारण मृत जानवर आवारा कुत्तों का भोजन बन रहे हैं। इससे उनकी मांस खाने की प्रवृत्ति बढ़ गई है। मांस नहीं मिलता है तो वह मनुष्य को काटते हैं। यही कारण है कि रैबीज की बीमारी के मामले बढ़ते जा रहे हैं। इतना ही नहीं, जानवरों की लाश के सड़ने से बीमारियों का भी खतरा बना रहता है।
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गिद्घों के लिए लगाए जा रहे पौधे
गिद्धों की लगातार घटती संख्या के चलते वन विभाग सतर्क हो गया है। जिन पेड़ों पर गिद्धों के घौंसले बने हुए हैं, उन्हें संरक्षित किया जा रहा है। इसके अलावा गिद्ध सेमल के पेड़ पर घौसला बनाना पसंद करते हैं। वृक्षारोपण में यह पेड़ बहुतायत में लगाए जा रहे हैं।

गिद्घों को बचाने के लिए वन विभाग लगातार अभियान चला रहा है। पहले डिक्लोफेनिक जैसी दवाओं से इनको नुकसान होता था, अब इस पर प्रतिबंध के बाद संख्या लगातार बढ़ रही है। - बीके मिश्रा, जिला वन अधिकारी
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