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अब नहीं होता कानफोड़ू शोर, न गलियां रंगती प्रचार से
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Thu, 16 Feb 2017 01:15 AM IST
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अब नहीं होता कानफोड़ू शोर, न गलियां रंगती प्रचार से
- फोटो : demo
पहले के और आज के चुनाव में जमीन-आसमान का अंतर आ गया है। पहले प्रत्याशी नामांकन के पहले से ही घर-घर जनसंपर्क शुरू कर देते थे। दीवारें व गलियां प्रचार से रंग जाती थीं। चुनाव-चिह्न जगह- जगह दिखते थे। घरों पर झंडे, चुनाव चिह्न के कटआउट लग जाते थे। दिनभर लाउडस्पीकर से प्रचार होता था। मुहल्लों में खुले कार्यालयों में भी दिनभर कानफोड़ू प्रचार होता था। प्रत्याशियों का काफिला गाड़ियों से नहीं, बल्कि पैदल ही गलियों से गुजरता था। लेकिन, अब न लाउडस्पीकर पर प्रचार सुनाई देता है और न ही घरों पर झंडे लगते हैं। बुजुर्गों ने पहले और वर्तमान में हो रहे चुनाव प्रचार पर अपने अनुभव अमर उजाला से साझा किए।
चुनाव चिह्न टंगते थे बाजारों व गली मुहल्लों में
70 के दशक में चुनाव प्रचार अभियान के लिए बुजुर्गों को साथ लिया जाता था। बाजारों के अलावा गली - मुहल्लों में चुनाव चिह्न टांगे जाते थे। इससे पता चलता था कि किस प्रत्याशी का क्या चुनाव चिह्न है। प्रचार अभियान के दौरान ढोल की जगह सभी प्रत्याशी नगढ़ियों का इस्तेमाल करते थे। ेप्रचार के रंग ही अलग होते थे, जो अब नहीं दिखते।
बसंत चौबे, गोलाकुआं
संतरा- टाफी लेकर बच्चे करते थे प्रचार
पहले नुक्कड़ सभाओं में ज्यादा जोर दिया जाता था। सर्राफा बाजार, बड़ाबाजार, सदर बाजार, सीपरी बाजार और नगरा में नुक्कड़ सभाएं जरूर होती थीं। प्रत्येक गली में बच्चों की टोलियां बनती थीं, जो संतरा टाफी के एवज में संबंधित प्रत्याशी का बिल्ला व झंडा लेकर प्रचार करती थीं। साइकिल व तांगा पर लाउडस्पीकर से हो रहे प्रचार से पता चलता था कि चुनाव जोरों पर है। प्रचार अभियान के दौरान लगभग प्रत्येक घर में समर्थक अपनी-अपनी पार्टी का झंडा जरूर लगाते थे।
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सुरेश चंद्र तिवारी, दीक्षित बाग
पता ही नहीं चलता कौन - कौन हैं चुनाव मैदान में
पहले नारे लगते थे। गली- मुहल्लों में क्षेत्रीय नेता आकर बैठकें करते थे। जिस गली में जाओ दीवारें चुनाव प्रचार से रंगी रहती थीं, बैनर व झंडे लगे रहते थे। लेकिन अब चुनाव प्रचार की हलचल न के बराबर हो गई है। पहले प्रचार की दम पर निर्दलीय प्रत्याशी तक हावी रहते थे। अब पता ही नहीं चलता कि कौन प्रत्याशी चुनाव मैदान में ताल ठोंक रहा है और उसके क्या चुनावी वायदे हैं।
कुंवर बहादुर आदिम, तालपुरा
भाषण सुनने जाते थे लोग बच्चों के साथ
नगर में चुनाव प्रचार की हलचल का प्रमुख केंद्र बड़ा बाजार, कोतवाली के समीप रामलीला मैदान और मिनर्वा चौराहा वाला किला मैदान रहता था। छोटी - बड़ी जनसभाएं होती थीं। शहर के वाशिंदे खूब जुटते थे। कई परिवारों के मुखिया अपने घर के बच्चों लेकर अपने चहेते नेता का भाषण सुनने जाते थे। लगता था कि चुनाव है।
शांति कुशवाहा तहसील के समीप
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चुनाव चिह्न टंगते थे बाजारों व गली मुहल्लों में
70 के दशक में चुनाव प्रचार अभियान के लिए बुजुर्गों को साथ लिया जाता था। बाजारों के अलावा गली - मुहल्लों में चुनाव चिह्न टांगे जाते थे। इससे पता चलता था कि किस प्रत्याशी का क्या चुनाव चिह्न है। प्रचार अभियान के दौरान ढोल की जगह सभी प्रत्याशी नगढ़ियों का इस्तेमाल करते थे। ेप्रचार के रंग ही अलग होते थे, जो अब नहीं दिखते।
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बसंत चौबे, गोलाकुआं
संतरा- टाफी लेकर बच्चे करते थे प्रचार
पहले नुक्कड़ सभाओं में ज्यादा जोर दिया जाता था। सर्राफा बाजार, बड़ाबाजार, सदर बाजार, सीपरी बाजार और नगरा में नुक्कड़ सभाएं जरूर होती थीं। प्रत्येक गली में बच्चों की टोलियां बनती थीं, जो संतरा टाफी के एवज में संबंधित प्रत्याशी का बिल्ला व झंडा लेकर प्रचार करती थीं। साइकिल व तांगा पर लाउडस्पीकर से हो रहे प्रचार से पता चलता था कि चुनाव जोरों पर है। प्रचार अभियान के दौरान लगभग प्रत्येक घर में समर्थक अपनी-अपनी पार्टी का झंडा जरूर लगाते थे।
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सुरेश चंद्र तिवारी, दीक्षित बाग
पता ही नहीं चलता कौन - कौन हैं चुनाव मैदान में
पहले नारे लगते थे। गली- मुहल्लों में क्षेत्रीय नेता आकर बैठकें करते थे। जिस गली में जाओ दीवारें चुनाव प्रचार से रंगी रहती थीं, बैनर व झंडे लगे रहते थे। लेकिन अब चुनाव प्रचार की हलचल न के बराबर हो गई है। पहले प्रचार की दम पर निर्दलीय प्रत्याशी तक हावी रहते थे। अब पता ही नहीं चलता कि कौन प्रत्याशी चुनाव मैदान में ताल ठोंक रहा है और उसके क्या चुनावी वायदे हैं।
कुंवर बहादुर आदिम, तालपुरा
भाषण सुनने जाते थे लोग बच्चों के साथ
नगर में चुनाव प्रचार की हलचल का प्रमुख केंद्र बड़ा बाजार, कोतवाली के समीप रामलीला मैदान और मिनर्वा चौराहा वाला किला मैदान रहता था। छोटी - बड़ी जनसभाएं होती थीं। शहर के वाशिंदे खूब जुटते थे। कई परिवारों के मुखिया अपने घर के बच्चों लेकर अपने चहेते नेता का भाषण सुनने जाते थे। लगता था कि चुनाव है।
शांति कुशवाहा तहसील के समीप