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अमर उजाला अभियान शिक्षा : अब अच्छी नहीं लग रही पढ़ाई, मनोरंजन से पटरी पर ला रहे शिक्षा की गाड़ी

Thu, 24 Mar 2022 10:30 PM IST
झांसी ब्यूरो अमर उजाला नेटवर्क, झांसी
अमर उजाला नेटवर्क, झांसी Published by: झांसी ब्यूरो Updated Thu, 24 Mar 2022 10:30 PM IST
सार

अब हालात यह हैं कि बच्चों को ऑफलाइन पढ़ाई रास नहीं आ रही है। बच्चे स्कूल जाकर खुद भी अच्छा महसूस कर रहे हैं, लेकिन पहले जैसे बेझिझक वे कक्षाओं में अपने सवाल पूछ लिया करते थे। अब उनके मन में एक संकोच आ गया है।

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Now studies are not looking good, the car of education is bringing entertainment back on track
अमर उजाला अभियान शिक्षा - फोटो : amar ujala

विस्तार

दो साल से कोरोना के कारण घर तक रह गए बच्चों के मन में पढ़ाई को लेकर डर बैठ गया है। मनोवैज्ञानिकों की मानें तो पिछले कुछ माह में सैकड़ों विद्यार्थी तनाव से ग्रस्त हुए हैं। मोबाइल से पढ़ने और ऑनलाइन परीक्षा के कारण विद्यार्थियों के मन में ऑफलाइन परीक्षा को लेकर डर बैठ गया है।

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बच्चे तो दूर की बात जब बडे़ भी एक कमरे में बहुत वक्त तक सीमित हो जाएं तो उनकी भी मनोदशा बिगड़ने लगती है। रोजाना स्कूल जाना, दोस्तों से मिलना, कक्षा में पढ़ना, दोस्तों के साथ खेलना, स्कूल में प्रतियोगिताएं आदि सब कोरोना काल में एकदम बंद होकर मोबाइल तक ही सीमित हो जाने से बच्चों की मानसिक स्थिति पर बुरा प्रभाव पड़ा है। बच्चे मोबाइल से पढ़ाई करने के बाद भी मोबाइल में ही अपना पूरा दिन निकाल देते थे।
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अब हालात यह हैं कि बच्चों को ऑफलाइन पढ़ाई रास नहीं आ रही है। बच्चे स्कूल जाकर खुद भी अच्छा महसूस कर रहे हैं, लेकिन पहले जैसे बेझिझक वे कक्षाओं में अपने सवाल पूछ लिया करते थे। अब उनके मन में एक संकोच आ गया है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चों को खेलने, किताबें पढ़ने, संगीत या वाद्य यंत्र सीखने, चित्रकला सीखने, प्रोग्रामिंग सीखने आदि पर जोर दिया जाना चाहिए ताकि उनका सामाजिक और मानसिक विकास हो सके। दो सालों में बच्चों की मानसिक स्थिति के साथ-साथ शारीरिक स्थिति भी कमजोर हुई है।
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स्कूल करें यह काम
- बच्चों को खेल-खेल में पढ़ाने की कोशिश करें
- बच्चों के मन से पढ़ाई का खौफ खत्म करें
- बच्चों की मनोस्थिति समझें
- विद्यालय में बच्चों को सहज महसूस कराएं
- छोटी-छोटी प्रतियोगिताएं कराएं
- बच्चों को सवाल पूछने दें
- बच्चों के मन में जिज्ञासा पैदा करें

अभिभावक भी दें ध्यान
- बच्चों के सामने एक अच्छा उदाहरण पेश करें
- बच्चों के सामने कुछ भी गलत कहें या करें नहीं
- बच्चों को जमीनी हकीकत से भी रू-ब-रू कराएं
- मोबाइल और टीवी से ज्यादा उनको किताबें पढाएं
- उनको इनडोर और आउटडोर गेम्स खिलाएं
- बच्चे का जिस काम में मन लगे उसे वो करने के लिए प्रोत्साहित करें
- मोबाइल इस्तेमाल की समय सीमा सीमित कर दें, खुद भी
- बच्चे को हिंसा से दूर रखें
- जरूरत लगे तो बच्चे की काउंसलिंग अवश्य कराएं

कोविड के बाद लगभग 750 लोगाें गए मनोचिकित्सक के पास
कोविड के बाद लगभग 750 लोग मानसिक स्थिति गड़बड़ होने के कारण मनोचिकित्सक के पास पहुंचे। जिसमें से लगभग 40 प्रतिशत बच्चे, 30-35 प्रतिशत युवा, 10 प्रतिशत अभिभावक और 15-20 प्रतिशत वृद्ध शामिल हैं। बच्चों में खासतौर पर चिड़चिड़ापन आने लगा था। वहीं युवा बेरोजगारी के कारण परेशान है। अभिभावक बच्चों के कोरोना काल में शहर से बाहर होने के कारण तनाव में थे। वहीं वृद्ध इस महामारी के दौरान बच्चों के गुजर जाने के कारण परेशान थे।

अभिभावक बच्चों के लिए रोल मॉडल बनें
बच्चे कहने से नहीं देखकर सीखते हैं। इसलिए बच्चों के सामने बहुत सोच समझकर बोलें। कोरोना के समय बच्चों को अभिभावकों ने ही बहुत गलत संदेश दिया था, जैसे ऑनलाइन परीक्षा के दौरान नकल कराना ताकि उनके नंबर अच्छे आएं। अब इसके कारण बच्चों के मन में नकल करने की आदत आ गई है। कई विद्यालयों में बच्चे परीक्षा के दौरान बेहोश तक हो गए थे। पढ़ाई बदली नहीं है और न ही कठिन हुई है। अंक बढ़ाने से ज्यादा सीखने पर जोर दें। जैसे-जैसे बच्चे स्कूल जा रहे हैं उनके मन से डर निकलता जा रहा है, वे सामान्य हो रहे हैं।

-डॉ. मनीष मिश्रा, मनोवैज्ञानिक

बोले अभिभावक...
मेरी बेटी हाईस्कूल की बोर्ड परीक्षा है लेकिन वो परीक्षा देने से ही मना कर रही थी जैसे-तैसे उसको मनाया है।
- सीमा अग्रवाल, अभिभावक

बच्चे स्कूल जाने लगे हैं तो कुछ सामान्य होने लगे हैं, मोबाइल की आदत भी अब कम होने लगी है।
- अर्पणा चौबे, अभिभावक

हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती है बच्चों को एक बार फिर शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना। बच्चों को फिर से अनुशासित करना, उनके मन से पढ़ाई का डर निकालकर उनमें पढ़ाई की उमंग जगाना। बच्चों को शिक्षकों से जोड़ना, ताकि वे फिर से अपने मन के सवाल बेझिझक शिक्षकों से जोड़ें।
- अर्चना गौतम, पं. कृष्णचंद्र शर्मा बालिका इंटर कॉलेज

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