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अब थैलेसीमिया के मरीजों को चढ़ाया जाएगा आदर्श रक्त
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झांसी। महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज में आने वाले थैलेसीमिया के मरीजों को अब ल्यूको फिल्टर ब्लड यानी आदर्श रक्त चढ़ाया जाएगा। इसके लिए मेडिकल कॉलेज ने बैग मंगवाए हैं, जो कि खून से व्हाइट ब्लड सेल (डब्ल्यूबीसी) को अलग कर देते हैं। वहीं, अतिरिक्त मात्रा में डब्ल्यूबीसी जाने से मरीज को कुछ दिक्कतें होने की आशंका रहती है।
थैलेसीमिया बच्चों को उनके माता-पिता से मिलने वाला आनुवांशिक रक्त रोग है। इस रोग की पहचान बच्चे में तीन महीने बाद हो पाती है। आमतौर पर हर सामान्य व्यक्ति के शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र करीब 120 दिनों की होती है। लेकिन थैलेसीमिया से पीड़ित रोगी के शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र घटकर सिर्फ 20 दिन ही रह जाती है। इसका सीधा असर व्यक्ति के हीमोग्लोबिन पर पड़ता है, जिसके कम होने पर व्यक्ति एनीमिया का शिकार हो जाता है और हर समय किसी न किसी बीमारी से ग्रसित रहने लगता है। सही इलाज न मिलने पर बच्चे की मृत्यु तक हो सकती है। मेडिकल कॉलेज में बच्चे और बड़ों को मिलाकर थैलेसीमिया के लगभग 200 मरीज पंजीकृत हैं। इन्हें समय-समय पर ब्लड की जरूरत पड़ती रहती है। अब तक मेडिकल कॉलेज में इन्हें पूरा रक्त (होल ब्लड) ही चढ़ाया जाता था। इसमें डब्ल्यूबीसी भी होती है। ऐसे में मरीज को कुछ दिक्कतें हो सकती हैं। अब मेडिकल कॉलेज ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत बैग मंगवा लिए हैं।
बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. ओमशंकर चौरसिया ने बताया कि इन बैगों की खासियत होती है कि ये रक्त से डब्ल्यूबीसी अलग कर देते हैं। थैलेसीमिया मरीजों को बिना डब्ल्यूबीसी वाला रक्त चढ़ाना ही आदर्श माना जाता है।
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दो तरह का होता थैलेसीमिया
थैलेसीमिया दो तरह का होता है, माइनर और मेजर। किसी महिला या फिर पुरुष के शरीर में मौजूद क्रोमोजोम खराब होने पर बच्चा माइनर थैलेसीमिया का शिकार बनता है, लेकिन अगर महिला और पुरुष दोनों के क्रोमोजोम खराब हो जाते हैं तो ये मेजर थैलेसीमिया की स्थिति बनता है। इसकी वजह से बच्चे के जन्म लेने के छह महीने बाद उसके शरीर में खून बनना बंद हो जाता है। उसे बार-बार खून चढ़वाने की जरूरत पड़ने लगती है।
थैलेसीमिया मरीजों को ल्यूको फिल्टर ब्लड चढ़ाने के लिए बैगों की खरीद की जा रही है। जल्द ही अस्पताल आने वाले रोगियों को बिना डब्ल्यूबीसी वाला रक्त चढ़ाया जाने लगेगा। - डॉ. एनएस सेंगर, प्राचार्य, मेडिकल कॉलेज।
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थैलेसीमिया बच्चों को उनके माता-पिता से मिलने वाला आनुवांशिक रक्त रोग है। इस रोग की पहचान बच्चे में तीन महीने बाद हो पाती है। आमतौर पर हर सामान्य व्यक्ति के शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र करीब 120 दिनों की होती है। लेकिन थैलेसीमिया से पीड़ित रोगी के शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र घटकर सिर्फ 20 दिन ही रह जाती है। इसका सीधा असर व्यक्ति के हीमोग्लोबिन पर पड़ता है, जिसके कम होने पर व्यक्ति एनीमिया का शिकार हो जाता है और हर समय किसी न किसी बीमारी से ग्रसित रहने लगता है। सही इलाज न मिलने पर बच्चे की मृत्यु तक हो सकती है। मेडिकल कॉलेज में बच्चे और बड़ों को मिलाकर थैलेसीमिया के लगभग 200 मरीज पंजीकृत हैं। इन्हें समय-समय पर ब्लड की जरूरत पड़ती रहती है। अब तक मेडिकल कॉलेज में इन्हें पूरा रक्त (होल ब्लड) ही चढ़ाया जाता था। इसमें डब्ल्यूबीसी भी होती है। ऐसे में मरीज को कुछ दिक्कतें हो सकती हैं। अब मेडिकल कॉलेज ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत बैग मंगवा लिए हैं।
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बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. ओमशंकर चौरसिया ने बताया कि इन बैगों की खासियत होती है कि ये रक्त से डब्ल्यूबीसी अलग कर देते हैं। थैलेसीमिया मरीजों को बिना डब्ल्यूबीसी वाला रक्त चढ़ाना ही आदर्श माना जाता है।
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दो तरह का होता थैलेसीमिया
थैलेसीमिया दो तरह का होता है, माइनर और मेजर। किसी महिला या फिर पुरुष के शरीर में मौजूद क्रोमोजोम खराब होने पर बच्चा माइनर थैलेसीमिया का शिकार बनता है, लेकिन अगर महिला और पुरुष दोनों के क्रोमोजोम खराब हो जाते हैं तो ये मेजर थैलेसीमिया की स्थिति बनता है। इसकी वजह से बच्चे के जन्म लेने के छह महीने बाद उसके शरीर में खून बनना बंद हो जाता है। उसे बार-बार खून चढ़वाने की जरूरत पड़ने लगती है।
थैलेसीमिया मरीजों को ल्यूको फिल्टर ब्लड चढ़ाने के लिए बैगों की खरीद की जा रही है। जल्द ही अस्पताल आने वाले रोगियों को बिना डब्ल्यूबीसी वाला रक्त चढ़ाया जाने लगेगा। - डॉ. एनएस सेंगर, प्राचार्य, मेडिकल कॉलेज।