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संगीत साधना करते हुए 600 से अधिक अवार्ड पा चुके हैं अनुराग
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झांसी। सुगम और शास्त्रीय संगीत में अब तक 500 से भी अधिक मंचों पर अपनी गायकी का लोहा मनवा चुके शहर के अनुराग तिवारी कला के बड़े पारखियों में से एक हैं। संगीत विधा में विभिन्न मंचों पर 600 से अधिक अवार्ड प्राप्त कर चुके अनुराग भजन और गजल गायकी में बेहतरीन प्रदर्शन कर चुके हैं। इन्होंने अपनी धुनें बनाकर कई गीत और भजन भी कंपोज किए हैं।
महानगर में पुरानी नझाई इलाके में रहने वाले 42 वर्ष के अनुराग तिवारी शहर के सन इंटरनेशनल स्कूल में संगीत विभाग के अध्यक्ष हैं। अपनी संगीत साधना के साथ इन्होंने 15 सालों तक केंद्रीय विद्यालयों में भी शिक्षण कार्य किया। अनुराग बताते हैं कि उनके पिता स्वर्गीय जीपी तिवारी को तबला वादन का शौक था। उन्होंने भी कई मंचों पर प्रस्तुति दी। अपने पिता को देखकर उन्हें भी संगीत सीखने का शौक हुआ तो 12वीं कक्षा के दौरान इन्होंने संगीत सीखना शुरू किया। शास्त्रीय और सुगम संगीत के साथ-साथ उन्होंने हारमोनियम और अन्य वाद्ययंत्रों को बजाना भी सीखा। धीरे-धीरे वह अपनी कला में इतने पारंगत हो गए कि सुर मानो उनका जीवन गए। अपने गुरुजनों के आशीष से वह आगे बढ़ते ही चले गए।
इन्होंने अपनी संगीत साधना को आगे बढ़ाने के लिए राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला महाविद्यालय ग्वालियर से संगीत गायन में एमए की डिग्री भी प्राप्त की। इसके साथ ही संगीत वादन में प्रयाग संगीत समिति इलाहाबाद से प्रभाकर किया। बुंदेली लोकगीत, गजल, भजन और शास्त्रीय संगीत गायन में महारथ हासिल कर इन्होंने अब तक झांसी के साथ-साथ दूसरे शहरों में भी 500 से अधिक मंचों पर अपनी कला का प्रदर्शन किया है। इन दिनों बच्चों को संगीत की शिक्षा दे रहे हैं। अनुराग तिवारी बताते हैं कि संगीत व्यक्ति को सरल और सहज बना देता है, बच्चों और युवाओं को संगीत अवश्य सीखना चाहिए। उन्होंने बताया कि वह अपने सात वर्ष के बेटे अथर्व को भी संगीत की शिक्षा दे रहे हैं। उनका बेटा तबला वादन के साथ-साथ गायन भी सीख रहा है। अनुराग झांसी के युवाओं को संगीत के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए भी प्रेरित कर रहे हैं। वहीं, उन्हें संगीत के साथ अपनी धुनें बनाकर भजन और गीत-गजल कंपोज करने का शौक भी है।
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महानगर में पुरानी नझाई इलाके में रहने वाले 42 वर्ष के अनुराग तिवारी शहर के सन इंटरनेशनल स्कूल में संगीत विभाग के अध्यक्ष हैं। अपनी संगीत साधना के साथ इन्होंने 15 सालों तक केंद्रीय विद्यालयों में भी शिक्षण कार्य किया। अनुराग बताते हैं कि उनके पिता स्वर्गीय जीपी तिवारी को तबला वादन का शौक था। उन्होंने भी कई मंचों पर प्रस्तुति दी। अपने पिता को देखकर उन्हें भी संगीत सीखने का शौक हुआ तो 12वीं कक्षा के दौरान इन्होंने संगीत सीखना शुरू किया। शास्त्रीय और सुगम संगीत के साथ-साथ उन्होंने हारमोनियम और अन्य वाद्ययंत्रों को बजाना भी सीखा। धीरे-धीरे वह अपनी कला में इतने पारंगत हो गए कि सुर मानो उनका जीवन गए। अपने गुरुजनों के आशीष से वह आगे बढ़ते ही चले गए।
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इन्होंने अपनी संगीत साधना को आगे बढ़ाने के लिए राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला महाविद्यालय ग्वालियर से संगीत गायन में एमए की डिग्री भी प्राप्त की। इसके साथ ही संगीत वादन में प्रयाग संगीत समिति इलाहाबाद से प्रभाकर किया। बुंदेली लोकगीत, गजल, भजन और शास्त्रीय संगीत गायन में महारथ हासिल कर इन्होंने अब तक झांसी के साथ-साथ दूसरे शहरों में भी 500 से अधिक मंचों पर अपनी कला का प्रदर्शन किया है। इन दिनों बच्चों को संगीत की शिक्षा दे रहे हैं। अनुराग तिवारी बताते हैं कि संगीत व्यक्ति को सरल और सहज बना देता है, बच्चों और युवाओं को संगीत अवश्य सीखना चाहिए। उन्होंने बताया कि वह अपने सात वर्ष के बेटे अथर्व को भी संगीत की शिक्षा दे रहे हैं। उनका बेटा तबला वादन के साथ-साथ गायन भी सीख रहा है। अनुराग झांसी के युवाओं को संगीत के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए भी प्रेरित कर रहे हैं। वहीं, उन्हें संगीत के साथ अपनी धुनें बनाकर भजन और गीत-गजल कंपोज करने का शौक भी है।
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