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भगवानदास माहौर के नाम से है बड़ौनी का बड़प्पन

Thu, 21 Oct 2021 02:24 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Thu, 21 Oct 2021 02:24 AM IST
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Mahour badoni bhagwandas mahour
झांसी। दतिया जिला मुख्यालय से करीब बीस किलोमीटर दूर ग्वालियर हाईवे से बायीं ओर एक छोड़ी सी सड़क जाती है जो बड़ौनी गांव को जोड़ती है। चारों ओर से सुरम्य पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा यह छोटा सा गांव बड़ौनी, देश की आजादी में अपना सर्वस्य होम देने वाले स्वतंत्रता संग्राम भगवानदास माहौर की बचपन की यादों की खुशबू देता है। गांव के अंदर घुसते ही मुख्य चौराहे पर लगी है भुसावल बम कांड के नायक और सांडर्स हत्याकांड के सहयोगी चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह के विश्वस्त साथी डा. भगवानदास माहौर की मूर्ति। स्मारक के आसपास एक छोटा सा बाजार है। हम जैसे ही मूर्ति को प्रणाम करके स्मारक के अंदर घुसे तो ठीक बगल में अपनी दुकान पर बैठे अतर सिंह कुशवाह भी हमारे पास आ गए। बातों का सिलसिला आगे बढ़ा, उन्होंने बड़े ही गर्व के साथ कहा यह हमारे गांव में जन्मे क्रांतिकारी भगवानदास माहौर की प्रतिमा है। पर, इसके आगे के इतिहास के नाम पर उनके पास सिर्फ एक ही लाइन थी कि माहौर जी आजादी के लिए अंग्रेजों से लड़ाई लड़े थे, बस। पर, अपने गांव के इस लाड़ले सपूत पर उन्हें इतना गर्व है कि वे कहते हैं कि भगवानदास माहौर से ही हमारी बड़ौनी का बड़प्पन है।
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अब भी सुरक्षित है वह घर जहां कभी आजादी के रणबांकुरे की किलकारियां गूंजीं थीं
इस गांव के छोटे से बाजार के बीच है अर्चना सोनी और रागिनी सोनी की सौंदर्य प्रसाधन की दुकान, इसी घर में 27 फरवरी 1909 को रामचरन माहौर के घर बेटे का जन्म हुआ था, तब किसी तो पता नहीं था कि यही बेटा देश के लिए अपना सब कुछ लुटा देगा। बाद में माहौर जी के पूर्वज इस मकान को सोनी परिवार को बेचकर बाहर चले गए थे। हम बाहर से ही लौटने लगे तो अर्चना सोनी ने कहा भाईसाहब स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की असली जन्म भूमि के दर्शन अभी बाकी हैं। उन्होंने बताया कि दुकान के अंदर से आंगन के लिए दरवाजा है, यहां पर माहौर जी का घर अब भी जस का तस है। हमने उनके जन्म वाले कमरे से लेकर शयन कक्ष और साधना कक्ष तक को सहेज कर रखा है, इसमें कोई नव निर्माण नहीं किया। अंदर जाकर देखा तो वही पुरानी बुंदेली नक्काशी की दालानें (बरामदे), पूजा का कमरा, शयन कक्ष यथावत थे। यहां पहुंचने वाला हर आदमी माहौर जी के बचपन यादों में सराबोर हो जाता है।
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उच्च शिक्षा के लिए भेजा था झांसी, यहां आ गए थे क्रांतिकारियों के संपर्क में
डा. भगवान दास माहौर के पड़ोसी रहे सीताराम गुप्ता बताते हैं कि उनके दादा जी बताते थे कि भगवान दास माहौर के पिता रामचरन मिठाई की दुकान किया करते थे। भगवानदास को पांचवीं तक की पढ़ाई के बाद उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने अपने बहनोई नाथूराम माहौर के पास झांसी भेज दिया था। यहां, पर हाईस्कूल, इंटर की कक्षाओं तक पहुंचते- पहुंचते भगवान दास माहौर मास्टर, रुद्र नारायण, चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह के विश्वस्त साथी बन गए। बड़ौनी के स्कूल में उनकी प्राथमिक शिक्षा तक पढ़ाई हुई थी।
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आखिरी बार 1972 में आए थे अपने गांव
सीताराम गुप्ता एडवोकेट बताते हैं कि 1972 में उनके स्कूल में दीपदान नाटक का मंचन हुआ था, उस दौरान इस कार्यक्रम में मुख्यअतिथि के रूप में डा. भगवान दास माहौर बड़ौनी आए थे। इसके बाद फिर वह कभी नहीं आए। 1978 में लखनऊ में जब उनका निधन हो गया तब उनका अस्थि कलश गांव में लाया गया था तथा जिस स्थान पर अब प्रतिमा लगी है तथा स्मारक बना है, उसी स्थान पर दर्शनों के लिए रखा गया था।
अगर भगत सिंह की गोली चूक जाती तो माहौर की गोली से होतौ संडार्स कौ वध
माहौर जी के पड़ोसी 95 वर्षीय हरीराम नीखरा से जब हमने बात की तो वे जोश से लबरेज हो गए, उन्होंने बड़े ही गर्व से बुंदेली बोली में कहा भगवानदास हमए बड़ौनी की शान हते, लाला लाजपतराय की हत्या करवे वारे अंग्रेज अफसर सांडर्स खौं मारवे में अगर भगत सिंह की गोली चूक जाती तो तीसरी कतार में ठाड़े भगवानदास माहौर की गोली से होतौ संडार्स को वध। उन्होंने बताया कि भुसावल बमकांड के दौरान अगर अंग्रेज अफसर बीच में न आउतो तो देश के संगे गद्दारी करवे वारे दोई गद्दार घायल नहीं होते मर जाते।

मालूम हो कि 1929 में असेंबली बम कांड में राजगुरु को शामिल न करने से वे नाराज हो गए थे। उन्होंने भुसावल में अलग संगठन बना लिया था, पर भगत सिंह उन्हें बहुत चाहते थे, इसलिए अकेला नहीं छोड़ना चाहते थे। ओरछा के सातार तट से चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह के आदेश पर भगवानदास माहौर और सदाशिवराव मलकापुरकर को बमों से भरी पेटी लेकर राजगुरु को देने के लिए भुसावल भेजा गया था। इसी दौरान इनके विश्वस्त साथी जयगोपल और फणींद्र घोष ने मुखबिरी कर दी और दोनों क्रांतिकारी भुसावल स्टेशन पर बम की पेटी समेत गिरफ्तार कर लिए गए। पेशी के बाद जब दोनों गवाह कुछ दूरी पर बैठे थे तो भगवानदास माहौर ने उन पर फायर कर दिया पर यह दुर्भाग्य रहा कि एक अंग्रेज पुलिस अफसर बीच में आ गया तथा गंभीर घायल अवस्था में उसने दोनों गवाहों को बचा लिया। भगवान दास माहौर को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।
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