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महानगर में है एक ऐसी बस्ती जहां पर दहेज मांगने वाले को नहीं देते हैं बेटी

Mon, 01 Mar 2021 02:10 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Mon, 01 Mar 2021 02:10 AM IST
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mahanagar me hai ek aisi basti jaha dahej mangne wale ko nahi dete hai beti
फोटो हैं
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छोटी बस्ती, बड़े नियम
दहेज मांगने वाले को नहीं देते बेटी, दूसरे शहर से ही बुलाते हैं बरात
आईटीआई के पास बसी झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले अलग-अलग जाति के डेरों के नियम कानून आज भी सख्त
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। मॉर्डन हो रही सोसाइटी में जहां सामाजिक रीति-रिवाजों और नियम कानून को अपने हिसाब से तोड़ा-मरोड़ा जा रहा, वहीं शहर में एक ऐसी भी जगह है जहां समाज के नियम तोड़ने वाले को सख्त सजा दी जाती है। उसे समाज से बाहर कर दिया जाता है। यहां दूसरे की बहन-बेटी पर निगाह रखने वाले बख्शे नहीं जाते। दूसरे समाज में शादी-निकाह जुर्म माना जाता है। बदल रहे समाज में आज आपने शायद ही ऐसे नियम-कानून के बारे में सुना हो लेकिन शहर में ही ऐसे कई समाज हैं जो बरसों से अपने पूर्वजों के नियम कानून को आज भी सिर माथे लगाते हैं। इनमें आदिवासी समाज में जहां दहेज मांगने वाले को बेटी नहीं देते वहीं, लोहार जाति में अपने शहर या गोत्र में विवाह संबंध वर्जित हैं।
हम बात कर रहे हैं शहर में 35-40 सालों से बसी झोपड़ पट्टी में बसने वाले उन हजारों लोगों की। जो तकरीबन 30 साल पहले आरा मशीन के पास गोविंद चौराहे के आसपास अपना डेरा जमाए थे। वक्त ने उनका डेरा उजाड़ दिया तो तकरीबन 10-12 साल पहले वह लोग आईटीआई के पास बस गए। यहां लगभग 1500 झुग्गी-झोपड़ियों में आठ से दस हजार की आबादी है। इन लोगों की मानें तो आला अधिकारियों ने इनके इलाके को ‘आनंद नगर’ नाम दिया है लेकिन यहां आनंद कोसों दूर है।
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बस्ती में लोहार, कबाड़ी, भिक्षा मांगने वाले, साफ-सफाई और बर्तन व खेल-खिलौने बेचने वाली अलग-अलग समाज व जातियों के सात-आठ हजार लोग रह रहे हैं। इन सभी के अपने सख्त सामाजिक नियम और कायदे हैं। इसे तोड़ने वालों को समाज से बाहर होना पड़ता है। इनके लड़ाई-झगड़े समाज में ही निपटाए जाते हैं। शायद ही किसी ने कानून का सहारा लिया हो। इनमें से कई भीख मांगकर गुजारा करते हैं लेकिन चोरी करने की सजा पिटाई है। ये छेड़छाड़ और महिलाओं पर बुरी नजर रखना पाप मानते हैं। इनके समाज में बेटी को बोझ नहीं मानते हैं और न ही उनकी शादी में दहेज दिया जाता है।
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बहन-बेटी पर निगाह रखने वालों को समाज देता है सजा
लोहार जाति के मुखिया मोहन ने बताया डेरे में उनके समाज के तकरीबन 40 झोपड़े हैं। उनके समाज में बच्चों की शादी दूसरे गोत्र में करना अनिवार्य नियम है। इसे सभी को मानना पड़ता है। पूर्वजों से नियम चला आ रहा है कि रिश्ता अपने गोत्र और अपने शहर में नहीं करेंगे। बरात भी दूसरे शहर से बुलाई जाती है। अपने गोत्र की बेटी को बहन-भांजी मानना हुकुम है। इसका उल्लंघन सामाजिक बहिष्कार जैसा है। महिला व पुरुष मुखिया की बात सबको माननी होती है। डेरे के बाहर भाग कर किसी ने शादी-ब्याह किया तो उसे कभी वापस नहीं बुलाते हैं। दूसरे की बहन-बेटी पर निगाह रखने वालों को समाज सजा देता है। समाज में बहू-बेटी का उत्पीड़न करना पाप मानते हैं। परिवार में कलह के सारे मामले समाज में ही निपटाते हैं। निर्णय सभी को मानना होता है।
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भागकर शादी करने वालों को समाज स्वीकार नहीं करता
भिक्षा मांगने वालों की जाति के मुखिया इरशाद बताते हैं कि बस्ती में उनके 49 डेरे हैं। वह लोग 32 साल से झांसी में बसे हैं। पूर्वज भिक्षा मांगकर जिंदगी व्यतीत करते थे लेकिन उनके समाज के भी अपने नियम हैं। कोई भी लड़की या लड़का समाज से बाहर निकाह नहीं कर सकता है। दूसरे डेरे या जाति में भागकर निकाह करने वाले को समाज स्वीकार नहीं करता। चोरी और समाज में वर्जित काम करने की सजा है। दूसरे डेरे में रोटी और बेटी का रिश्ता नहीं रखते हैं। अपने डेरे के अनाथ और असहाय बच्चों, महिलाओं को दूसरे डेरे में नहीं जाने देते, उसे परिवार का हिस्सा मानकर साथ रखते हैं। उनके खाने-पीने और शादी-ब्याह का इंतजाम भी किया जाता है। इरशाद ने बताया इस समय उनके डेरे में ऐसी सात लड़कियां और छह अनाथ या असहाय लड़के हैं, जिनकी देखभाल की जा रही है।

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बेटी को लक्ष्मी मानते हैं
बस्ती में गुजराती आदिवासी महिला व मुखिया 58 साल की अंजू बताती हैं कि उनके डेरे के लोग 35 साल पहले अहमदाबाद के पास उदना पाडोली में प्लेग फैलने से झांसी आकर बसे थे। उनके डेरे में बेटियों को हमेशा लक्ष्मी की तरह मानते हैं। बेटी की शादी में कभी कोई दहेज नहीं देता है। अगर कोई लड़के वाला दहेज मांगता तो उसके घर में बेटी नहीं देते। समाज उन्हें अच्छी नजर से नहीं देखता। बेटी होने पर ज्यादा खुशी मनाते हैं। समाज में बेटियों को बोझ नहीं मानते हैं। उनके समाज में कोई लड़की या लड़का भाग कर शादी कर लें तो उसे कभी समाज में स्वीकार नहीं करते। शादी घरवालों की रजामंदी से अपने समाज में ही करने का नियम है।
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