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प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के पचास फीस कर्ज एनपीए
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झांसी। बैंकों का एनपीए (नान परफार्मिंग एसेट) प्रधानमंत्री मुद्रा योजना जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं के जरिए भी बढ़ रहा है। झांसी में मुद्रा योजना के तहत अब तक 1537 ऋण विभिन्न बैंकों के जरिए दिए गए लेकिन करीब पचास फीसदी रकम एनपीए हो चुकी। यही हाल दूसरी अन्य रोजगार योजनाओं का भी है। बैंकों ने इनको हाई रिस्क कैटगेरी में डालते हुए इनसे हाथ खींचना शुरू कर दिया है।
केंद्र सरकार ने 8 अप्रैल 2015 को प्रधानमंत्री मुद्रा योजना आरंभ की। इसके जरिए बिना किसी गांटरी के 10 लाख रुपये तक ऋण दिए गए। ऐसे ऋण धारकों से कोई प्रोसेसिंग चार्ज भी नहीं लिया जाता। अब चार साल बाद जब बैंकों ने इनकी पड़ताल शुरू की तब मालूम चला कर्ज धारकों में करीब पचास फीसदी ने रकम ही नहीं लौटाई। तकरीबन सभी बैंकों में ऐसे मामले सामने आए। सभी बैंकों की धनराशियां अलग-अलग हैं। बैंक अधिकारियों ने 10 करोड़ से अधिक धनराशि के बट्टेखाते में जाने का अनुमान किया है।
बिना गांरटी के इतनी मोटी धनराशि देने से अब बैंक भी हिचकने लगे हैं। बैंक अफसरों का कहना है सरकार ने कारपस फंड के जरिए इस पैसे की भरपाई की बात कही थी लेकिन अभी तक यह पैसा बैंकों को दिया ही नहीं गया। अधिकांश बैंकों ने केंद्र सरकार की इन योजनाओं से अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं। इस बारे में एलडीएम अरुण कुमार चुप्पी साध गए जबकि उद्योग उपायुक्त सुधीर श्रीवास्तव ने इससे इंकार किया है। उनका कहना है ऋण दिलाने से पहले पूरी तरह से जांच-पड़ताल होती है। जिनकी किस्तें नहीं आईं उनकी तलाश कराई जाएगी।
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छोटे कर्ज लेने वालों की बढ़ी परेशानी
ये के कर्ज भी नहीं दे रहा। आकड़ों के मुताबिक पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्वरोजगार योजना के जरिए ग्रामीण क्षेत्रों में 1190 लोगों को छोटे कारोबार के लिए कर्ज दिया जाना था लेकिन, महज 55 लोगों को ही ऋण दिए गए। शहरी इलाके में 210 लोगों को छोटे-मोटे काम के लिए कर्ज दिए जाने थे लेकिन बैंकों ने इनको भी देने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। प्रशासनिक दबाव के चलते महज 39 ऋण में कर्ज बांटकर अपना पल्ला झाड़ लिया।
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केंद्र सरकार ने 8 अप्रैल 2015 को प्रधानमंत्री मुद्रा योजना आरंभ की। इसके जरिए बिना किसी गांटरी के 10 लाख रुपये तक ऋण दिए गए। ऐसे ऋण धारकों से कोई प्रोसेसिंग चार्ज भी नहीं लिया जाता। अब चार साल बाद जब बैंकों ने इनकी पड़ताल शुरू की तब मालूम चला कर्ज धारकों में करीब पचास फीसदी ने रकम ही नहीं लौटाई। तकरीबन सभी बैंकों में ऐसे मामले सामने आए। सभी बैंकों की धनराशियां अलग-अलग हैं। बैंक अधिकारियों ने 10 करोड़ से अधिक धनराशि के बट्टेखाते में जाने का अनुमान किया है।
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बिना गांरटी के इतनी मोटी धनराशि देने से अब बैंक भी हिचकने लगे हैं। बैंक अफसरों का कहना है सरकार ने कारपस फंड के जरिए इस पैसे की भरपाई की बात कही थी लेकिन अभी तक यह पैसा बैंकों को दिया ही नहीं गया। अधिकांश बैंकों ने केंद्र सरकार की इन योजनाओं से अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं। इस बारे में एलडीएम अरुण कुमार चुप्पी साध गए जबकि उद्योग उपायुक्त सुधीर श्रीवास्तव ने इससे इंकार किया है। उनका कहना है ऋण दिलाने से पहले पूरी तरह से जांच-पड़ताल होती है। जिनकी किस्तें नहीं आईं उनकी तलाश कराई जाएगी।
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छोटे कर्ज लेने वालों की बढ़ी परेशानी
ये के कर्ज भी नहीं दे रहा। आकड़ों के मुताबिक पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्वरोजगार योजना के जरिए ग्रामीण क्षेत्रों में 1190 लोगों को छोटे कारोबार के लिए कर्ज दिया जाना था लेकिन, महज 55 लोगों को ही ऋण दिए गए। शहरी इलाके में 210 लोगों को छोटे-मोटे काम के लिए कर्ज दिए जाने थे लेकिन बैंकों ने इनको भी देने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। प्रशासनिक दबाव के चलते महज 39 ऋण में कर्ज बांटकर अपना पल्ला झाड़ लिया।