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बुंदेलखंड में मधुकरशाह की कृष्ण भक्ति ने डाली जन्माष्टमी पर ब्रज यात्रा की नींव
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झांसी । श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर बुंदेलखंड के लोगों की ब्रज यात्रा करने की परंपरा करीब पांच सौ वर्ष पुरानी है। इसके पीछे एक धार्मिक कथा बताई जाती है। बुंदेलखंड की धार्मिक नगरी ओरछा पंद्रहवीं सदी के मध्य से सोलहवीं सदी के प्रारंभ तक कृष्ण भक्ति का बड़ा केंद्र रही है। यहां के वीरान हो चुके जुगल किशोर मंदिर की भव्यता इस बात की गवाह है कि पंद्रहवीं सदी में श्रीकृष्ण जी का यह मंदिर रामराजा मंदिर से किसी भी मायने में कम नहीं था, पर जब रामराजा सरकार ओरछा में विराजमान हो गए तो जुगल किशोर के विग्रहों की पन्ना रियासत में स्थापना कर दी गई थी। बुंदेलखंड में जन्माष्टमी पर की जाने वाली ब्रज की यात्रा के पीछे की कहानी बताई जाती है कि अष्टमी पर वृंदावन जाने को लेकर ओरछा के महाराजा मधुकरशाह और महारानी कुंअर गणेश के बीच तकरार हो गई थी। रानी अयोध्या जाना चाहती थीं और राजा वृंदावन तब मधुकरशाह ने रानी को चुनौती दी थी कि उनकी भक्तिको वे तभी सार्थक मानेंगे जब वह अयोध्या से अपने इष्ट श्रीराम को ओरछा लेकर आएं। महारानी श्रीराम को लेकर ओरछा आईं और राजा ने महारानी को जुगल किशोर मंदिर में अपने इष्ट भगवान कृष्ण के दर्शन करवाकर अपनी कृष्ण भक्ति का परिचय दिया था। इस तरह राम और कृष्ण दोनों को एक ही स्वरूप मानते हुए दोनों की भक्ति को स्वीकार किया था। बुंदेलखंड के लोगों का मानना है कि अगर वृंदावन की जन्माष्टमी यात्रा को लेकर यह तकरार न हुई होती तो शायद आज रामराजा सरकार बुंदेलखंड के ओरछा में विराजमान न होते हैं। इसी भक्ति भावना के चलते बुंदेलखंड के हजारों लोग हर साल जन्माष्टमी पर ब्रज जाते हैं।
श्रीराम और कृष्ण की भक्ति को लेकर हुई थी तकरार
ओरछा रामराजा मंदिर के प्रधान पुजारी रमाकांत शरण महाराज बताते हैं कि पंद्रहवीं सदी में ओरछा बुंदेलखंड में कृष्ण भक्ति का प्रमुख केंद्र था। ओरछा के जुगल किशोर एवं राधाबिहारी के विशाल मंदिर इसके साक्षी हैं। यहां के महाराजा मधुकरशाह कृष्ण उपासक थे, जबकि उनकी महारानी कुंअर गणेश रामभक्त थीं। दोनों की अपने इष्ट को लेकर अधिकांश तकरार हो जाती थी। भादों का महीना था, ओरछा नगर कृष्ण भक्ति में सराबोर था, मधुकरशाह जी जन्माष्टमी पर मथुरा वृंदावन जाने की तैयारी कर रहे थे, उन्होंने महारानी से झूला झांकी के दर्शन के लिए ब्रज चलने को कहा तो महारानी ने क हा कि वह पहले ही अयोध्या जाने की तैयारी कर चुकी हैं। इसके बाद दोनों में भक्ति और इष्ट को लेकर तकरार हो गई। महाराजा ने रानी को चुनौती देते हुए कहा कि अगर श्रीराम के प्रति तुम्हारी सच्ची भक्ति है तो उन्हें ओरछा लेकर आओ। महाराजा ब्रज यात्रा पर चले गए और महारानी अवध के लिए प्रस्थान कर गईं। घोर तपस्या करके वे रामजी को ओरछा लाईं और यहां राजा के रूप में विराजमान कर दिया। बुंदेलखंड के लोग मानते हैं कि अगर ब्रज यात्रा को लेकर राजा रानी की तकरार न हुई होती तो शायद रामराजा सरकार ओरछा में विराजमान न होते । रामजी के ओरछा आने के बाद यह रामभक्तों का बड़ा केंद्र बन गया पर जन्माष्टमी की ब्रज यात्रा महाराजा मधुकरशाह उसी उत्साह और भक्तिभाव से करते रहे, जो एक परंपरा बन गई तथा आज भी बुंदेलखंड में इसका निर्वाह किया जा रहा है।
ओड़छो वृंदावन सो गांव
पं. रामेश्वरदास शास्त्री बताते हैं कि पंद्रहवीं सदी में महाराजा मधुकरशाह ने ओरछा को कृष्ण भक्ति का केंद्र बना दिया था। एक कवि होने के नाते महाराजा ने लिखा था ओड़छो वृंदावन सो गांव। उस दौर में यह नगर पूरी तरह से कृष्ण भक्ति में सराबोर था। जुगल किशोर के भव्य मंदिर के पुजारी हरीराम व्यास हुआ करते थे, सखी संप्रदाय के संत चंद्रसखी भी यहां पर निवास करते थे। पर सोलहवी सदी के शुरूआत में ही जब महारानी कुंअर गणेश ने रामराजा सरकार को यहां विराजमान करवा दिया तो यहां के जुगल किशोर के विग्रह पन्ना चले गए तथा हरीराम व्यास और चंद्रसखी जैसे कृष्ण भक्त संत वृंदावन जाकर रहने लगे थे। भले ही ओरछा बुंदेलखंड की अयोध्या बन गया हो, पर महाराजा मधुकरशाह की ब्रज यात्रा की परंपरा सैकड़ों साल बाद भी यहां के लोगों में कायम है।
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श्रीराम और कृष्ण की भक्ति को लेकर हुई थी तकरार
ओरछा रामराजा मंदिर के प्रधान पुजारी रमाकांत शरण महाराज बताते हैं कि पंद्रहवीं सदी में ओरछा बुंदेलखंड में कृष्ण भक्ति का प्रमुख केंद्र था। ओरछा के जुगल किशोर एवं राधाबिहारी के विशाल मंदिर इसके साक्षी हैं। यहां के महाराजा मधुकरशाह कृष्ण उपासक थे, जबकि उनकी महारानी कुंअर गणेश रामभक्त थीं। दोनों की अपने इष्ट को लेकर अधिकांश तकरार हो जाती थी। भादों का महीना था, ओरछा नगर कृष्ण भक्ति में सराबोर था, मधुकरशाह जी जन्माष्टमी पर मथुरा वृंदावन जाने की तैयारी कर रहे थे, उन्होंने महारानी से झूला झांकी के दर्शन के लिए ब्रज चलने को कहा तो महारानी ने क हा कि वह पहले ही अयोध्या जाने की तैयारी कर चुकी हैं। इसके बाद दोनों में भक्ति और इष्ट को लेकर तकरार हो गई। महाराजा ने रानी को चुनौती देते हुए कहा कि अगर श्रीराम के प्रति तुम्हारी सच्ची भक्ति है तो उन्हें ओरछा लेकर आओ। महाराजा ब्रज यात्रा पर चले गए और महारानी अवध के लिए प्रस्थान कर गईं। घोर तपस्या करके वे रामजी को ओरछा लाईं और यहां राजा के रूप में विराजमान कर दिया। बुंदेलखंड के लोग मानते हैं कि अगर ब्रज यात्रा को लेकर राजा रानी की तकरार न हुई होती तो शायद रामराजा सरकार ओरछा में विराजमान न होते । रामजी के ओरछा आने के बाद यह रामभक्तों का बड़ा केंद्र बन गया पर जन्माष्टमी की ब्रज यात्रा महाराजा मधुकरशाह उसी उत्साह और भक्तिभाव से करते रहे, जो एक परंपरा बन गई तथा आज भी बुंदेलखंड में इसका निर्वाह किया जा रहा है।
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ओड़छो वृंदावन सो गांव
पं. रामेश्वरदास शास्त्री बताते हैं कि पंद्रहवीं सदी में महाराजा मधुकरशाह ने ओरछा को कृष्ण भक्ति का केंद्र बना दिया था। एक कवि होने के नाते महाराजा ने लिखा था ओड़छो वृंदावन सो गांव। उस दौर में यह नगर पूरी तरह से कृष्ण भक्ति में सराबोर था। जुगल किशोर के भव्य मंदिर के पुजारी हरीराम व्यास हुआ करते थे, सखी संप्रदाय के संत चंद्रसखी भी यहां पर निवास करते थे। पर सोलहवी सदी के शुरूआत में ही जब महारानी कुंअर गणेश ने रामराजा सरकार को यहां विराजमान करवा दिया तो यहां के जुगल किशोर के विग्रह पन्ना चले गए तथा हरीराम व्यास और चंद्रसखी जैसे कृष्ण भक्त संत वृंदावन जाकर रहने लगे थे। भले ही ओरछा बुंदेलखंड की अयोध्या बन गया हो, पर महाराजा मधुकरशाह की ब्रज यात्रा की परंपरा सैकड़ों साल बाद भी यहां के लोगों में कायम है।
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