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कल्याण के आते ही गरमा जाती थी सियासत

Sun, 22 Aug 2021 01:56 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Sun, 22 Aug 2021 01:56 AM IST
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Kalyan Singh's status always remained in the politics of Bundelkhand
झांसी। बुंदेलखंड की सियासत में कल्याण सिंह का अपना रुतबा रहा है। खासकर झांसी और जालौन जिले में पिछड़ा तथा लोधी बहुल क्षेत्रों में ऐन वक्त पर चुनावी समीकरण प्रभावित करने में उन्हें महारत हासिल थी। उस दौर में पार्टी हाईकमान भी उन्हें पिछड़ा वर्ग वाले क्षेत्रों की जिम्मेदारी देता था, खासकर लोधी बहुल क्षेत्रों की। इतना ही नहीं जब उमा रूठकर पार्टी से बाहर चलीं गई तब बुंदेलखंड में पिछड़ों को साधने का जिम्मा भी पार्टी ने कल्याण को दिया था और वे इसमें सफल भी रहे थे।
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बुंदेलखंड में झांसी जिले के बबीना, गरौठा तथा महोबा के चरखारी, हमीरपुर के राठ विधानसभा क्षेत्रों में पिछड़े खासकर लोधी और यादव बहुसंख्यक हैं। इसी के मद्देनजर जब तक कल्याण सक्रिय राजनीति में रहे इन सीटों पर उनके चुनावी दौरे तय थे। झांसी जिले में ही उनके दस से अधिक दौरे हुए होंगे। बुंदेलखंड की चुनावी बयार में जब भी भाजपा को विपरीत हालात लगे तब कल्याण ही संकटमोचक के रूप में सामने आए। इतना ही नहीं झांसी के पूर्वमंत्री रवींद्र शुक्ल और कल्याण सिंह की जोड़ी खूब जमी, यहां तक कि सियासी पंडित दोनों के रिश्ते को गुरु शिष्य का नाम देते थे, पर एक वक्त वह भी आया जब कल्याण और रवींद्र आमने-सामने आ गए।
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वंदेमातरम को लेकर हुए थे मतभेद
कल्याण सिंह उन दिनों प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, उनके ही मंत्रिमंडल में रवींद्र शुक्ल बेसिक शिक्षा मंत्री थे। रवींद्र शुक्ल ने बिना मुख्यमंत्री से विचार विमर्श किए प्रदेश के स्कूलों में वंदेमातरम गीत अनिवार्य कर दिया। इस बात को लेकर सियासी पारा गरमा गया तथा देखते ही देखते कल्याण सिंह और झांसी में उनके सबसे खास सिपहसलार माने जाने वाले रवींद्र शुक्ल आमने- सामने आ गए। अंतत: रवींद्र शुक्ल को इसका खामियाजा अपना मंत्री पद खोकर चुकाना पड़ा।
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राम मंदिर आंदोलन के दौरान आते रहे झांसी
बुंदेलखंड में भारतीय जनता पार्टी की नींव मजबूत करने वाले नेताओं में पहला नाम कल्याण सिंह का आता है। राम मंदिर आंदोलन की शुरुआत से ही उनका झांसी आना शुरू हो गया था। इसके बाद मुख्यमंत्री रहते हुए और उसके बाद भी लगातार उनका झांसी आना बना रहा। अपने दौर में वे लोकसभा और विधानसभा के हर चुनाव में झांसी आते थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता प्रदीप सक्सेना ने बताया कि झांसी की चुनावी सियासत कल्याण सिंह के दौरे के बाद एकदम गरमा जाती थी। भरी सभा में वो कार्यकर्ताओं को नाम से पुकारते थे। इससे एकदम से कार्यकर्ताओं में जोश भर जाता था। सभा स्थल पर हर ओर से जय-जय श्रीराम के उद्घोष गुंजायमान हो उठते थे।
पान के लिए कर देते थे इशारा
झांसी। भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष डा. जगदीश सिंह चौहान ने बताया कि सन 1985 से 89 तक कुंवर मानवेंद्र सिंह के गरौठा से विधायक रहते हुए वे उनके साथ लखनऊ जाया करते थे। उस समय महज 17-18 वर्ष की उम्र थी। भाजपा के महज 17-18 विधायक थे। लगातार जाने-आने की वजह से कल्याण सिंह उन्हें अच्छे से पहचानने लगे थे। वे पान खाने के बहुत शौकीन थे। एक बार उन्होंने पान मंगाया था। इसके बाद से जगदीश सिंह पहले से ही पानी खरीदकर रख लिया करते थे। कल्याण सिंह ये बात जानते थे। बैठकों के दौरान वे अचानक हाथ से पान का इशारा कर देते थे और चौहान तुरंत उन्हें थमा देते थे।

आग्रह करते ही पहुंच गए थे घर
झांसी। भाजपा की सरकार गिरने के बाद कल्याण सिंह 1993 में झांसी आए थे। यहां उन्होंने बुंदेलखंड महाविद्यालय के छात्रसंघ समारोह का शुभारंभ किया था। संतोष सोनी ने बताया कि समारोह के दौरान उन्होंने बाबूजी को घर आने का आग्रह किया और वे तुरंत तैयार हो गए। जबकि, उनके कार्यक्रम में ये शामिल नहीं था। घर पहुंचकर उन्होंने परिवार के लोगों के अलावा शहर के अन्य लोगों से भी मुलाकात की थी। संतोष सोनी ने बताया कि इसके बाद 1996 में भी हुआ झांसी आना हुआ था। लक्ष्मी व्यायाम मंदिर में आयोजित स्वर्णकार समाज के सामूहिक विवाह समारोह में वे मुख्य अतिथि बनकर झांसी आए थे।
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