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कई दुर्लभ बीमारियों से जूझ रहे झांसी वाले, कुछ तो लाइलाज हैं
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झांसी। जिले में बच्चे से लेकर बड़े तक कई ऐसी दुर्लभ बीमारियों से जूझ रहे हैं, जिनके बारे में आपने शायद ही सुना होगा। अजीब नामों वाली ये बीमारियां जिस भी व्यक्ति को हो जाती हैं, मानो उसका जीवन तबाह कर देती हैं। लंबे इलाज में लाखों रुपये पानी की तरह बह जाते हैं और कइयों की जान भी नहीं बच पाती है। रेयर डिजीज डे पर हम आपको ऐसी ही कुछ बीमारियों के बारे में बता रहे हैं, जो झांसी के डॉक्टरों के सामने आई हैं।
ऑस्टियोजेनेसिस इम्परफेक्टा: एक लाख में एक बच्चे को होती है बीमारी, तीन-चार बच्चे मिल चुके
झांसी। इस बीमारी में नाजुक हड्डी होने की वजह से हल्का झटका लगने पर ही हड्डी टूट जाती है। इस बीमारी में बच्चे की आंखों का रंग नीला हो जाता है। श्रवण दोष होता है। गर्भावस्था के दौरान ही अल्ट्रासाउंड कराकर इस बीमारी का पता लगाया जा सकता है। इसकी समस्या ज्यादातर जेनेटिक होती है। यदि खानदान, परिजनों में किसी को ये बीमारी रही है तो बच्चे के इसकी चपेट में आने की आशंका काफी रहती है। ऐसे में परिजनों का अनुवांशिक मानचित्रण (जेनेटिकल मैपिंग) कराना भी जरूरी है। मेडिकल कॉलेज के हड्डी रोग विभाग के आचार्य डॉ. अमित सहगल ने बताया कि एक लाख में एक बच्चा इस बीमारी का शिकार होता है। पिछले 15 सालों में झांसी में उन्हें तीन-चार बच्चे ही इस बीमारी के मिले हैं।
मोटर न्यूरॉन : लाइलाज बीमारी है, हर साल तकरीबन 10 मरीज आते हैं
झांसी। ये एक प्रकार के नर्व सेल्स होते हैं, जो मांसपेशियों को चलाने का काम करते हैं। इस सेल्स के खराब होने पर रीढ़ और दिमाग की तंत्रिकाएं धीरे-धीरे काम करना बंद कर देती हैं। नर्वस सिस्टम बिगड़ता चला जाता है, जिसका कोई इलाज नहीं है। यह किसी भी उम्र में हो सकता है। मगर ज्यादातर मामले 40 साल से अधिक आयु के लोगों में देखे जाते हैं। मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के आचार्य डॉ. रामबाबू सिंह ने बताया कि थकान, मांसपेशियों में दर्द, हाथ-पैरों की मांसपेशियों का धीरे-धीरे पतला होना, एड़ी व टांगों में कमजोरी महसूस होना, हाथों से पकड़ कम होना, खाना निगलने में परेशानी, जबड़े में दर्द, बोलने और सांस लेने में दिक्कत आदि इसके लक्षण हैं। ये लाइलाज बीमारी है, फिर भी इसे नियंत्रित किया जा सकता है। मेडिकल कॉलेज में हर साल तकरीबन 10 लोग इस बीमारी का इलाज कराने आते हैं।
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ऑटिज्म : ग्रसित बच्चे न बात कह पाते और न समझ पाते हैं
झांसी। यह एक दिमागी बीमारी है। इसमें मरीज न तो अपनी बात ठीक से कह पाता है, न ही दूसरों की समझ पाता है। लोगों से संवाद स्थापित भी नहीं कर पाता। इसके लक्षण बचपन में ही नजर आ जाते हैं। यदि इन लक्षणों को समय रहते भांप लिया जाए, तो काबू पाया जा सकता है। मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. ओमशंकर चौरसिया ने बताया कि सामान्य इंसान में दिमाग के अलग-अलग हिस्से एक साथ काम करते हैं लेकिन ऑटिज्म में ऐसा नहीं होता। यही कारण है कि उनका बर्ताव असामान्य होता है। यदि ठीक से सहायता मिले तो मरीज की काफी मदद हो सकती है। 250 में एक केस इस बीमारी का मिलता है। इसके लक्षणों में बच्चों का बर्ताव अलग होना, निष्क्रिय रहना, साफ नहीं बोल पाना, दर्द महसूस न होना, प्रतिक्रिया न देना आदि शामिल है।
हीमोफीलिया : खून निकलने लगता तो बंद ही नहीं होता
झांसी। ये एक दुर्लभ अनुवांशिक रक्तस्राव विकार है, जिसमें रक्त का ठीक से थक्का नहीं बन पाता है। बीमारी से पीड़ित व्यक्ति के चोट लगने पर लंबे समय तक खून बहता रहता है। रक्तस्राव को रोकने के लिए जरूरी क्लॉटिंग फैक्टर्स नामक प्रोटीन की अनुपस्थिति के कारण ऐसा होता है। स्थिति की तीव्रता रक्त में मौजूद क्लॉटिंग फैक्टर्स की मात्रा पर निर्भर करती है। मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभागाध्यक्ष के अनुसार हर पांच से दस हजार में एक बच्चा इस बीमारी का शिकार झांसी में मिल जाता है। खून को रोकने के लिए इंजेक्शन देना पड़ता है। हालांकि, यह तब तक जीवन को खतरे में डालने वाला विकार नहीं माना जाता, जब तक किसी महत्वपूर्ण अंग में रक्तस्राव न हो जाए।
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ऑस्टियोजेनेसिस इम्परफेक्टा: एक लाख में एक बच्चे को होती है बीमारी, तीन-चार बच्चे मिल चुके
झांसी। इस बीमारी में नाजुक हड्डी होने की वजह से हल्का झटका लगने पर ही हड्डी टूट जाती है। इस बीमारी में बच्चे की आंखों का रंग नीला हो जाता है। श्रवण दोष होता है। गर्भावस्था के दौरान ही अल्ट्रासाउंड कराकर इस बीमारी का पता लगाया जा सकता है। इसकी समस्या ज्यादातर जेनेटिक होती है। यदि खानदान, परिजनों में किसी को ये बीमारी रही है तो बच्चे के इसकी चपेट में आने की आशंका काफी रहती है। ऐसे में परिजनों का अनुवांशिक मानचित्रण (जेनेटिकल मैपिंग) कराना भी जरूरी है। मेडिकल कॉलेज के हड्डी रोग विभाग के आचार्य डॉ. अमित सहगल ने बताया कि एक लाख में एक बच्चा इस बीमारी का शिकार होता है। पिछले 15 सालों में झांसी में उन्हें तीन-चार बच्चे ही इस बीमारी के मिले हैं।
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मोटर न्यूरॉन : लाइलाज बीमारी है, हर साल तकरीबन 10 मरीज आते हैं
झांसी। ये एक प्रकार के नर्व सेल्स होते हैं, जो मांसपेशियों को चलाने का काम करते हैं। इस सेल्स के खराब होने पर रीढ़ और दिमाग की तंत्रिकाएं धीरे-धीरे काम करना बंद कर देती हैं। नर्वस सिस्टम बिगड़ता चला जाता है, जिसका कोई इलाज नहीं है। यह किसी भी उम्र में हो सकता है। मगर ज्यादातर मामले 40 साल से अधिक आयु के लोगों में देखे जाते हैं। मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के आचार्य डॉ. रामबाबू सिंह ने बताया कि थकान, मांसपेशियों में दर्द, हाथ-पैरों की मांसपेशियों का धीरे-धीरे पतला होना, एड़ी व टांगों में कमजोरी महसूस होना, हाथों से पकड़ कम होना, खाना निगलने में परेशानी, जबड़े में दर्द, बोलने और सांस लेने में दिक्कत आदि इसके लक्षण हैं। ये लाइलाज बीमारी है, फिर भी इसे नियंत्रित किया जा सकता है। मेडिकल कॉलेज में हर साल तकरीबन 10 लोग इस बीमारी का इलाज कराने आते हैं।
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ऑटिज्म : ग्रसित बच्चे न बात कह पाते और न समझ पाते हैं
झांसी। यह एक दिमागी बीमारी है। इसमें मरीज न तो अपनी बात ठीक से कह पाता है, न ही दूसरों की समझ पाता है। लोगों से संवाद स्थापित भी नहीं कर पाता। इसके लक्षण बचपन में ही नजर आ जाते हैं। यदि इन लक्षणों को समय रहते भांप लिया जाए, तो काबू पाया जा सकता है। मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. ओमशंकर चौरसिया ने बताया कि सामान्य इंसान में दिमाग के अलग-अलग हिस्से एक साथ काम करते हैं लेकिन ऑटिज्म में ऐसा नहीं होता। यही कारण है कि उनका बर्ताव असामान्य होता है। यदि ठीक से सहायता मिले तो मरीज की काफी मदद हो सकती है। 250 में एक केस इस बीमारी का मिलता है। इसके लक्षणों में बच्चों का बर्ताव अलग होना, निष्क्रिय रहना, साफ नहीं बोल पाना, दर्द महसूस न होना, प्रतिक्रिया न देना आदि शामिल है।
हीमोफीलिया : खून निकलने लगता तो बंद ही नहीं होता
झांसी। ये एक दुर्लभ अनुवांशिक रक्तस्राव विकार है, जिसमें रक्त का ठीक से थक्का नहीं बन पाता है। बीमारी से पीड़ित व्यक्ति के चोट लगने पर लंबे समय तक खून बहता रहता है। रक्तस्राव को रोकने के लिए जरूरी क्लॉटिंग फैक्टर्स नामक प्रोटीन की अनुपस्थिति के कारण ऐसा होता है। स्थिति की तीव्रता रक्त में मौजूद क्लॉटिंग फैक्टर्स की मात्रा पर निर्भर करती है। मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभागाध्यक्ष के अनुसार हर पांच से दस हजार में एक बच्चा इस बीमारी का शिकार झांसी में मिल जाता है। खून को रोकने के लिए इंजेक्शन देना पड़ता है। हालांकि, यह तब तक जीवन को खतरे में डालने वाला विकार नहीं माना जाता, जब तक किसी महत्वपूर्ण अंग में रक्तस्राव न हो जाए।