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Jhansi: यशोदा ने कन्हैया के मुख में देखा पूरा ब्रह्मांड, भागवत कथा में हुआ कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन

Sun, 26 Jul 2026 08:23 PM IST
दीपक महाजन अमर उजाला नेटवर्क, झांसी
अमर उजाला नेटवर्क, झांसी Published by: दीपक महाजन Updated Sun, 26 Jul 2026 08:23 PM IST
सार

मेहंदी बाग के राम जानकी मंदिर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं और गोवर्धन पूजा का भावपूर्ण वर्णन किया गया। जिसे सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।
 

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Jhansi: Krishna's childhood pastimes recounted during the Bhagwat Katha.
कथा सुनाते धर्मदास जी महाराज। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर मेहंदी बाग स्थित राम जानकी मंदिर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन रविवार को कथा व्यास अयोध्या धाम से पधारे धर्मदास जी महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं और गोवर्धन पूजा का भावपूर्ण वर्णन किया। कथा सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे और मंदिर परिसर भगवान श्रीकृष्ण के जयकारों से गूंज उठा।
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कथा व्यास ने बताया कि एक दिन गोपियों ने मैया यशोदा से शिकायत की कि कन्हैया मिट्टी खा रहे हैं। यह सुनकर यशोदा ने बालकृष्ण से मुख खोलने को कहा। जैसे ही भगवान श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोला, मैया ने उसमें संपूर्ण ब्रह्मांड, चौदह भुवन, देव-दानव, ऋषि-मुनि, गौ-गोप और स्वयं का स्वरूप देखा। इस अद्भुत दृश्य से वह विस्मित और भयभीत हो गईं। इसके बाद धर्मदास जी महाराज ने गोवर्धन पूजा की कथा सुनाते हुए कहा कि जब ब्रजवासियों ने इंद्र की पूजा छोड़कर गोवर्धन पर्वत की पूजा की तो क्रोधित इंद्र ने मूसलाधार वर्षा कर दी। तब सात वर्षीय भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठा अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर सात दिनों तक समस्त ब्रजवासियों और गौवंश की रक्षा की। उन्होंने कहा कि यह लीला प्रकृति, गौ संरक्षण और पर्यावरण के सम्मान का संदेश देती है।
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कथा व्यास ने कहा कि भगवान की लीलाएं भक्तों को भक्ति, वात्सल्य और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं। जिस प्रभु में पूरा संसार समाया है, वही भक्तों के प्रेमवश बाल स्वरूप में मां की गोद में खेलते हैं और संकट के समय उनकी रक्षा भी करते हैं। कथा के दौरान देव, पूजा, आरती, शालू, मिस्का, गोविंदा, चतुर सिंह सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। आयोजन मंदिर के महंत श्री राम प्रिय दास जी एवं भावी महंत प्रेम नारायण दास जी के सान्निध्य में हो रहा है। कथा के अंत में विजय वल्लभ महाराज ने आरती कराई।
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