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जन्म के तुरंत बाद होता स्वर्णिम काल, देखभाल न होना बनता ‘काल’
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फाइल फोटो
- फोटो : ???? ????
जन्म के तुरंत बाद होता स्वर्णिम काल, देखभाल न होना बनता ‘काल’
झांसी। पिछले नौ महीने में नवजातों की मौतों का आंकड़ा 260 पहुंचाने में निजी अस्पतालों, नर्सिंगहोमों की भूमिका भी कम नहीं है। डिलीवरी के नाम पर मरीजों से मोटी रकम वसूलते हैं, जबकि नवजात की सुविधाओं के नाम पर कुछ नहीं होता है। कई अस्पतालों में तो प्रसव के दौरान बाल रोग विशेषज्ञ तक नहीं रहता, जबकि नवजात के लिए पहले मिनट को स्वर्णिम काल कहा जाता है। नवजात की सेहत बिगड़ते ही नर्सिंगहोम, सीएचसी उसे मेडिकल कॉलेज रेफर कर देते हैं। कॉलेज आते-आते कई नवजातों की सांस थम जाती हैं।
डिलीवरी कराने वाले जिले के अधिकतर नर्सिंगहोमों में नवजातों के लिए सुविधा के नाम पर बहुत कुछ नहीं है। नियमानुसार प्रसव कराने वाले अस्पतालों में डिलिवरी के दौरान बाल रोग विशेषज्ञ तैनात होना चाहिए। जन्म के तुरंत बाद बच्चा रोता नहीं है तो बाल रोग विशेषज्ञ को इलाज शुरू करना होता है। यदि जन्म लेते हुए बच्चे को सांस लेने में तकलीफ होती है तो चंद सेकेंडों में बाल रोग विशेषज्ञ मुंह अथवा ट्यूब से सांस देना शुरू कर देते हैं। तब कहीं जाकर ब्रेन में ऑक्सीजन जाने से शरीर में रक्त संचार शुरू होता है और नवजात की जान बच पाती है।
इसके अलावा स्टाफ को भी नवजात पुनर्जीवन प्रक्रिया आनी चाहिए। सिर्फ नर्सिंगहोम ही नहीं, सरकारी चिकित्सा संस्थान भी बदहाली से अछूते नहीं हैं। स्वास्थ्य विभाग ने भले ही बबीना और मऊरानीपुर सीएचसी में सिजेरियन शुरू करा दिए हों लेकिन यहां भी नवजातों के इलाज के लिए कुछ नहीं है। यहां तक कि महिला अस्पताल के एसएनसीयू में भी वेंटिलेटर नहीं है। नवजातों की मौत का कारण ये भी है।
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ये हैं मौत के आंकड़े
अब तक मृत बच्चों में पहले दिन मरने वाले की संख्या 45 फीसदी है। जबकि, 260 में दो तिहाई रेफर होकर आए और एक तिहाई मेडिकल कॉलेज में भर्ती बच्चों ने दम तोड़ा है।
चार प्रमुख कारण
- समय से पहले जन्म (40 फीसदी)
- बर्थ एसफीक्सिया (20 फीसदी)
- सेप्सिस (20 फीसदी)
- रेस्पेरेट्री डिस्ट्रेस (15 फीसदी)
मेडिकल कॉलेज पर तीन गुना भार
मेडिकल कॉलेज का एसएनसीयू आधुनिक सुविधाएं से लैस है। यहां पर एक अत्याधुनिक वेंटिलेटर, छह वेंटिलेटर, बॉडी वार्मर, सेंट्रलाइज ऑक्सीजन, पावर बैकअप समेत तमाम आधुनिक मशीनें हैं मगर यहां 18 वार्मर बेड पर 54 बच्चे भर्ती रहते हैं।
एसएनसीयू में अधिकतर बच्चों की जान बचा ली जाती है। दूसरी जगह से रेफर होकर आने वाले अधिकतर बच्चे इलाज शुरू होते ही दम तोड़ देते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह बच्चे को जन्म के तुरंत बाद मौके पर ही इलाज नहीं मिल पाना होता है। मरीजों का भार बढ़ता देख एसएनसीयू में वार्मर बेड की संख्या दोगुनी करने का तेजी से प्रयास जारी है। - डॉ. ओमशंकर चौरसिया, बाल रोग विभागाध्यक्ष, मेडिकल कॉलेज।
डिलीवरी के दौरान अच्छे हॉस्पिटल बाल रोग विशेषज्ञ बुलाते हैं। कुछ नर्सिंगहोम में पति या पत्नी ही बाल रोग विशेषज्ञ होते हैं जो ऑपरेशन के दौरान खदु मौजूद रहते हैं। जो नहीं बुलाते वो गलत कर रहे हैं। सभी नर्सिंगहोम संचालकों को बाल रोग विशेषज्ञ बुलाने चाहिए।
निलय जैन, सचिव नर्सिंगहोम एसोसिएशन
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झांसी। पिछले नौ महीने में नवजातों की मौतों का आंकड़ा 260 पहुंचाने में निजी अस्पतालों, नर्सिंगहोमों की भूमिका भी कम नहीं है। डिलीवरी के नाम पर मरीजों से मोटी रकम वसूलते हैं, जबकि नवजात की सुविधाओं के नाम पर कुछ नहीं होता है। कई अस्पतालों में तो प्रसव के दौरान बाल रोग विशेषज्ञ तक नहीं रहता, जबकि नवजात के लिए पहले मिनट को स्वर्णिम काल कहा जाता है। नवजात की सेहत बिगड़ते ही नर्सिंगहोम, सीएचसी उसे मेडिकल कॉलेज रेफर कर देते हैं। कॉलेज आते-आते कई नवजातों की सांस थम जाती हैं।
डिलीवरी कराने वाले जिले के अधिकतर नर्सिंगहोमों में नवजातों के लिए सुविधा के नाम पर बहुत कुछ नहीं है। नियमानुसार प्रसव कराने वाले अस्पतालों में डिलिवरी के दौरान बाल रोग विशेषज्ञ तैनात होना चाहिए। जन्म के तुरंत बाद बच्चा रोता नहीं है तो बाल रोग विशेषज्ञ को इलाज शुरू करना होता है। यदि जन्म लेते हुए बच्चे को सांस लेने में तकलीफ होती है तो चंद सेकेंडों में बाल रोग विशेषज्ञ मुंह अथवा ट्यूब से सांस देना शुरू कर देते हैं। तब कहीं जाकर ब्रेन में ऑक्सीजन जाने से शरीर में रक्त संचार शुरू होता है और नवजात की जान बच पाती है।
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इसके अलावा स्टाफ को भी नवजात पुनर्जीवन प्रक्रिया आनी चाहिए। सिर्फ नर्सिंगहोम ही नहीं, सरकारी चिकित्सा संस्थान भी बदहाली से अछूते नहीं हैं। स्वास्थ्य विभाग ने भले ही बबीना और मऊरानीपुर सीएचसी में सिजेरियन शुरू करा दिए हों लेकिन यहां भी नवजातों के इलाज के लिए कुछ नहीं है। यहां तक कि महिला अस्पताल के एसएनसीयू में भी वेंटिलेटर नहीं है। नवजातों की मौत का कारण ये भी है।
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ये हैं मौत के आंकड़े
अब तक मृत बच्चों में पहले दिन मरने वाले की संख्या 45 फीसदी है। जबकि, 260 में दो तिहाई रेफर होकर आए और एक तिहाई मेडिकल कॉलेज में भर्ती बच्चों ने दम तोड़ा है।
चार प्रमुख कारण
- समय से पहले जन्म (40 फीसदी)
- बर्थ एसफीक्सिया (20 फीसदी)
- सेप्सिस (20 फीसदी)
- रेस्पेरेट्री डिस्ट्रेस (15 फीसदी)
मेडिकल कॉलेज पर तीन गुना भार
मेडिकल कॉलेज का एसएनसीयू आधुनिक सुविधाएं से लैस है। यहां पर एक अत्याधुनिक वेंटिलेटर, छह वेंटिलेटर, बॉडी वार्मर, सेंट्रलाइज ऑक्सीजन, पावर बैकअप समेत तमाम आधुनिक मशीनें हैं मगर यहां 18 वार्मर बेड पर 54 बच्चे भर्ती रहते हैं।
एसएनसीयू में अधिकतर बच्चों की जान बचा ली जाती है। दूसरी जगह से रेफर होकर आने वाले अधिकतर बच्चे इलाज शुरू होते ही दम तोड़ देते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह बच्चे को जन्म के तुरंत बाद मौके पर ही इलाज नहीं मिल पाना होता है। मरीजों का भार बढ़ता देख एसएनसीयू में वार्मर बेड की संख्या दोगुनी करने का तेजी से प्रयास जारी है। - डॉ. ओमशंकर चौरसिया, बाल रोग विभागाध्यक्ष, मेडिकल कॉलेज।
डिलीवरी के दौरान अच्छे हॉस्पिटल बाल रोग विशेषज्ञ बुलाते हैं। कुछ नर्सिंगहोम में पति या पत्नी ही बाल रोग विशेषज्ञ होते हैं जो ऑपरेशन के दौरान खदु मौजूद रहते हैं। जो नहीं बुलाते वो गलत कर रहे हैं। सभी नर्सिंगहोम संचालकों को बाल रोग विशेषज्ञ बुलाने चाहिए।
निलय जैन, सचिव नर्सिंगहोम एसोसिएशन