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5जी के जमाने में मांओं ने बदली पर्सनालिटी, मम्मी से बनीं सुपर मॉम

Sun, 08 May 2022 12:09 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Sun, 08 May 2022 12:09 AM IST
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In the age of 5G, mothers changed their personalities, mom became super mom
झांसी। अम्मा, मां, मम्मी, मॉम और मम्मा से अब सुपर मॉम बन चुकी मम्मियां समय के साथ रफ्तार से दौड़ रही हैं। उनकी उम्र क्या है, ये बात बदलाव के लिए मायने नहीं रखती। उनका कहना है कि उम्र जो भी हो, 5जी के जमाने में बदल रहे बच्चों के साथ बदलना बहुत जरूरी है। क्योंकि टीवी, मोबाइल और बाहरी दुनिया की चकाचौंध में छोटे-छोटे बच्चे भी अब अपनी मां में सुपर मॉम को ढूंढ रहे हैं। उन्हें ऐसी मां चाहिए जो उनके साथ सेल्फी लेकर सोशल मीडिया पर अपलोड करें। घर-बाहर उनके बेस्ट फ्रेंड की तरह रहे।
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मनोवैज्ञानिक डॉ. मनीष बताते हैं कि आजकल के बच्चे बहुत एक्टिव हो रहे हैं, उन्हें बार-बार कोई सीख, डांट फटकार या बंदिश पसंद नहीं आती। ऑनलाइन सोशल लाइफ उन्हें रियल लाइफ से ज्यादा पसंद आ रही है, ऐसे में मांओं का फ्रेंडली व्यवहार उन्हें बहुत भाता है। उम्र कोई भी हो जब एक मां अपने बच्चे की लाइफ में फ्रेंडली होती है तो बच्चे भी अपनी बातें आसानी से शेयर करते हैं और मांओं को भी वक्त के साथ खुद को बदलने का मौका मिलता है। ये बदलाव ही समय की डिमांड है।
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बच्चों क ी जनरेशन के साथ चलना आज बहुत जरूरी है : मनीषा
झांसी। मनु विहार में रहने वाली मनीषा खुल्लर समाज और बच्चों के लिए खुद को बदलने वाली सशक्त मां हैं। मनीषा की उम्र तकरीबन 60 वर्ष है। मनीषा बताती हैं कि जिस उम्र में महिलाएं थक कर खुद को बुजुर्ग मान लेती हैं उस उम्र में वह बेटे-बेटियों की जनरेशन के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। दिल्ली से ब्याह कर झांसी जैसे छोटे शहर में आईं मनीषा बताती हैं कि वक्त के साथ जब बेटियां सलोनी और राघवी व बेटा सुजय बड़े हुए तो उन्होंने भी खुद को पूरी तरह से बदल डाला। घर से ही फैशन डिजाइनिंग की राह पकड़ी। बेटी सलोनी दिल्ली में फैशन डिजाइनर और राघवी न्यूयार्क में है। बेटा अपने पिता के साथ बिजनेस में हाथ बंटाता है। मनीषा का कहना है कि बच्चों की जनरेशन के साथ चलना आज जरूरी है।
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घर और किचन तक सीमित रहने का जमाना नहीं रहा...बच्चों को सुपर मॉम चाहिए : दीक्षा
झांसी। सिद्धेश्वर नगर की दीक्षा द्विवेदी एक साढ़े तीन साल की बच्ची गौरी की मां हैं। अपने पति के बिजनेस में हाथ बंटाने वाली दीक्षा बताती हैं कि 10-15 साल पहले मां सिर्फ किचन और घर तक सीमित थीं। जबकि बच्चे मां से ज्यादा फ्रेंड सर्किल में बिजी होने लगे। वक्त और बढ़ा तो अक्सर कई बच्चे अपनी मां से ये तक कहने लगे कि... मां फ्रेंड, मोबाइल और सोशल मीडिया तुम्हारे जमाने के नहीं हैं, तुम नहीं समझोगी, जमाना बदल गया है। ऐसे में जब डेढ़-दो साल के बच्चे फटाफट मोबाइल चला रहे हो...तो खुद को भी बदल जाना चाहिए। 5जी के युग में बच्चों को हर समय डांट-फटकार कर या खुद को घर और किचन तक सीमित रखने की बजाय सुपर मॉम बनना जरूरी है।
बच्चे मोबाइल युग में जी रहे तो मम्मियों को भी हर पल एक्टिव रहना चाहिए : अमृता
झांसी। झारखड़िया इलाके की अमृता गुप्ता अपनी बेटी ईशा में अपनी छवि देखती हैं। संगीत क्षेत्र से जुड़ी अमृता का कहना है कि पुराने खयालात आज मां-बाप को दुख के सिवा कुछ नहीं देते, इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि बच्चे पुराने रीति-रिवाजों से दूर मोबाइल युग में जी रहे हैं। ऐसे में बेहद जरूरी है कि बड़े भी खुद को बदलें। इसमें सबसे बड़ी भूमिका मां की है...। इससे भी ज्यादा जरूरी है बेटे-बेटी में फर्क करना। आज मैं मेरी बेटी की सबसे अच्छी फ्रेंड हूं। अमृता का कहना है कि बच्चे आज अम्मा शब्द में सुपर मॉम को देखना चाहते हैं। आज बच्चों की पेरेन्ट्स मीटिंग, स्कूल एक्टिविटी, आउटिंग, फ्रेंड सर्किल, खान-पान व्हाट्सएप ग्रुप, सोशल मीडिया और उनके साथ हर पल एक्टिव रहना समय की मांग है।

सेल्फी के जमाने में मांओं की पर्सनालिटी भी निखरना जरूरी : ज्योति
झांसी। मिशन कंपाउंड की ज्योति गुप्ता अपनी बेटी अनन्या और अनविता की सबसे अच्छी दोस्त हैं। ज्योति बताती हैं कि आजकल बेटा हो या बेटी, सभी घर से बाहर पढ़ने जाते हैं, उनकी एक अलग लाइफ होती है। ऐसे में पुराने ढर्रे को लेकर चलने से बच्चों और मां के बीच एक जनरेशन गैप बढ़ जाता है। इस गैप को खत्म करना आज की डिमांड है। आज बच्चे अपनी मां में सिर्फ उसे जन्म देने वाली मां को ही नहीं बल्कि उस पर्सनालिटी को देखना चाहते हैं कि जहां वे अपने दोस्तों के सामने शान से कह सकें ...ये मेरी सुपर मॉम है। ज्योति बताती हैं कि सेल्फी के जमाने में बच्चों का ध्यान रखने के साथ मांओं को अपनी पर्सनालिटी बनाना भी जरूरी है।
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