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Jhansi News: बुंदेलखंड में धूल के कणों से फेफड़ों में लोच हो रहा कम
Sun, 14 Jun 2026 02:08 AM IST
झांसी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, झांसी
संवाद न्यूज एजेंसी, झांसी
Updated Sun, 14 Jun 2026 02:08 AM IST
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झांसी।
बुंदेलखंड में खनन की धूल, कबूतरों की बीट, पक्षियों के पंख की धूल, रसायनों के कण, धूम्रपान आदि से आईएलडी (इंटरस्टिशियल लंग डिजीज) के रोगियों का बढ़ना चिंता का विषय है। मेडिकल कॉलेज में हर माह औसतन 10 नये मरीज मिल रहे हैं, इनमें से करीब तीन को तुरंत ऑक्सीजन की जरूरत पड़ रही है। चूंकि इस बीमारी का उपचार संभव नहीं है, इसलिए बीमारी से होने वाली दिक्कतों का उपचार किया जाता है। यह जानकारी चेस्ट ऐंड रेस्पिरेटरी विभागाध्यक्ष डॉ. मधुर्मय शास्त्री ने दी है।
डॉ. शास्त्री ने बताया आईएलडी में फेफड़ों के ऊतकों में सूजन आ जाती है। ऊतक क्षतिग्रस्त होने से फेफड़ों में घाव (फाइब्रोसिस) हो जाती है। इससे फेफड़े में कठोरता बढ़ जाती है और लोच में कमी आ आती है। इससे रोगी के शरीर में पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंची है और सांस सांस फूलती है। उन्होंने बताया कुछ आईएलडी में कारण पता नहीं चलता है मगर अधिकांश की वजह खनन व खेतों की धूल, कबूतरों की बीट, पंख की धूल, रसायनों के कण, रूमेटाइड आर्थराइटिस, धातु की धूल आदि मुख्य वजह होती है।
उन्होंने बताया कि आईएलडी से फेफड़ों की क्षति अक्सर सही नहीं होती है। इसलिए उपचार आम तौर पर लक्षणों से राहत, जीवन की गुणवत्ता में सुधार व रोग के बढ़ने की गति को धीमा करने पर केंद्रित होता है। इसमें फेफड़ों में सूजन को कम करने वाली दवा दी जाती है। जब फेफड़े मधुमक्खी के छत्ते (हनी कॉबिंग) की तहत हो जाते हैं तब कुछ दवा के साथ ऑक्सीजन देना ही आखिरी उपचार होता है। हां, सांस लेने के व्यायाम या शारीरिक उपचार फेफड़ों को मजबूत बना सकते हैं और सांस लेना आसान हो सकता है।
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0- ये होते हैं आईएलडी के लक्षण
लगातार सांस फूलना, सूखी खांसी, थकान, भूख कम लगना, शरीर का कमजोर होना, मांसपेशियों व जोड़ों में दर्द, नाखूनों में सूजन
0- इन जांचों से होती है पहचान
एक्सरे या सीटी स्कैन, पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट, विशेष रक्त जांच जैसे एएनए, ऑटोइम्यून डिसीज परीक्षण, ब्रोंकोस्कोपी, फेफड़ों की बायोप्सी
0- बचाव एवं रोकथाम के उपाय
मास्क लगाना ताकि धूल कण व हानिकारक पदार्थ सांस से फेफड़े तक नहीं पहुंचे। योग करने से ऑक्सीजन ज्यादा लेने से सक्रिय रह सकते हैं।
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बुंदेलखंड में खनन की धूल, कबूतरों की बीट, पक्षियों के पंख की धूल, रसायनों के कण, धूम्रपान आदि से आईएलडी (इंटरस्टिशियल लंग डिजीज) के रोगियों का बढ़ना चिंता का विषय है। मेडिकल कॉलेज में हर माह औसतन 10 नये मरीज मिल रहे हैं, इनमें से करीब तीन को तुरंत ऑक्सीजन की जरूरत पड़ रही है। चूंकि इस बीमारी का उपचार संभव नहीं है, इसलिए बीमारी से होने वाली दिक्कतों का उपचार किया जाता है। यह जानकारी चेस्ट ऐंड रेस्पिरेटरी विभागाध्यक्ष डॉ. मधुर्मय शास्त्री ने दी है।
डॉ. शास्त्री ने बताया आईएलडी में फेफड़ों के ऊतकों में सूजन आ जाती है। ऊतक क्षतिग्रस्त होने से फेफड़ों में घाव (फाइब्रोसिस) हो जाती है। इससे फेफड़े में कठोरता बढ़ जाती है और लोच में कमी आ आती है। इससे रोगी के शरीर में पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंची है और सांस सांस फूलती है। उन्होंने बताया कुछ आईएलडी में कारण पता नहीं चलता है मगर अधिकांश की वजह खनन व खेतों की धूल, कबूतरों की बीट, पंख की धूल, रसायनों के कण, रूमेटाइड आर्थराइटिस, धातु की धूल आदि मुख्य वजह होती है।
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उन्होंने बताया कि आईएलडी से फेफड़ों की क्षति अक्सर सही नहीं होती है। इसलिए उपचार आम तौर पर लक्षणों से राहत, जीवन की गुणवत्ता में सुधार व रोग के बढ़ने की गति को धीमा करने पर केंद्रित होता है। इसमें फेफड़ों में सूजन को कम करने वाली दवा दी जाती है। जब फेफड़े मधुमक्खी के छत्ते (हनी कॉबिंग) की तहत हो जाते हैं तब कुछ दवा के साथ ऑक्सीजन देना ही आखिरी उपचार होता है। हां, सांस लेने के व्यायाम या शारीरिक उपचार फेफड़ों को मजबूत बना सकते हैं और सांस लेना आसान हो सकता है।
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0- ये होते हैं आईएलडी के लक्षण
लगातार सांस फूलना, सूखी खांसी, थकान, भूख कम लगना, शरीर का कमजोर होना, मांसपेशियों व जोड़ों में दर्द, नाखूनों में सूजन
0- इन जांचों से होती है पहचान
एक्सरे या सीटी स्कैन, पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट, विशेष रक्त जांच जैसे एएनए, ऑटोइम्यून डिसीज परीक्षण, ब्रोंकोस्कोपी, फेफड़ों की बायोप्सी
0- बचाव एवं रोकथाम के उपाय
मास्क लगाना ताकि धूल कण व हानिकारक पदार्थ सांस से फेफड़े तक नहीं पहुंचे। योग करने से ऑक्सीजन ज्यादा लेने से सक्रिय रह सकते हैं।