ग्वालियर: डेढ़ शताब्दी बाद झांसी की रानी के समक्ष नतमस्तक हुआ सिंधिया राजवंश, ज्योतिरादित्य ने समाधि पर पुष्प अर्पित कर किया नमन
शनिवार को केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया स्वर्ण रेखा नाले पर बनने वाले पुल व सड़क का निरीक्षण करने के लिए महारानी लक्ष्मीबाई के शहादत स्थल पर गए थे। उनके साथ मध्यप्रदेश के मंत्री प्रद्युम्न सिंह भी थे। इसी दौरान सिंधिया ने महारानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा के समक्ष पुष्प समर्पित कर उन्हें नमन किया।
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प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के डेढ़ शताब्दी से अधिक समय के बाद यह पहला मौका है जब ग्वालियर के सिंधिया राजवंश का कोई वारिस झांसी की रानी की प्रतिमा के समक्ष नतमस्तक हुआ है।
यूं तो मंत्री और नेताओं का क्रांतिवीरों की समाधियों पर जाकर पुष्प अर्पित कर उन्हें नमन करना एक सामान्य सी घटना है, पर सिंधिया राजवंश के वारिस और केंद्र सरकार के मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के शहादत स्थल पर जाकर उन्हें नमन करने को लक्ष्मीबाई की क्रांतिगाथा लिखने वाली कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की यह पंक्तियां, 'अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी', आम से खास बना देती हैं। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि सिंधिया का वीरांगना के प्रति श्रद्धाभाव नहीं था, पर इसे एक संयोग ही कहा जाएगा कि अब तक रानी की समाधि पर होने वाले कार्यक्रमों में सिंधिया परिवार की सार्वजनिक रूप से उपस्थिति नजर नहीं आई।
शनिवार को केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया स्वर्ण रेखा नाले पर बनने वाले पुल व सड़क का निरीक्षण करने के लिए महारानी लक्ष्मीबाई के शहादत स्थल पर गए थे। उनके साथ मध्यप्रदेश के मंत्री प्रद्युम्न सिंह भी थे। इसी दौरान सिंधिया ने महारानी लक्ष्मीबाई की समाधि के समक्ष पुष्प समर्पित कर उन्हें नमन किया।
इसके बाद से सियासी गलियारों से लेकर आम आदमी तक सिंधिया का यह कार्यक्रम चर्चाओं में है। लोगों का ऐसा कहना है कि यह पहला मौका है जब सिंधिया परिवार का कोई सदस्य झांसी की रानी को नमन करने पहुंचा है। हालांकि इस बात में कितनी सत्यता है, यह कह पाना मुश्किल है।