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गूगल बाबा को जानते हैं...दादा-परदादा की पीढ़ियां पता नहीं
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झांसी। पितृ पक्ष शुरू हो चुके हैं, घरों में दादा-परदादा और पीढ़ियों को यादकर उनका श्राद्ध कर्म किया जा रहा है। लेकिन जिस तरह वृद्ध आश्रमों में बुजुर्गों की गिनती लगातार बढ़ रही है। उसी तरह दादा-परदादा की पीढ़ियों को याद रखने वालों की संख्या घटती जा रही है। आज घाटों पर अपने पितरों का तर्पण करने वाले भी कम ही दिखते हैं। बात युवाओं की करें तो उन्हें अपनी पीढ़ियों से ज्यादा जानकारी गूगल बाबा की है। उनका कहना है कि उनके घरों में माता-पिता भी इस पर चर्चा नहीं करते। पितृ पक्ष में पंडित को खाना-खिलाकर दक्षिणा दी जाती है, इससे ज्यादा उन्हें पता ही नहीं। युवाओं का कहना है कि इसमें गलती उनकी नहीं है, उन्हें दादा-दादी की कहानियां सुनने को नहीं मिली। उनके हाथ में गूगल बाबा थमाया गया है। पितृ पक्ष में इस मुद्दे को लेकर हमने युवाओं से बात की तो वे खुलकर बोले कि उन्हें पूर्वजों के बारे बताया नहीं जाता, तो भला उन्हें मालूम कैसे होगा...?
अपने बाबा का नाम तो हमें पता है, लेकिन उसके पीछे की पीढ़ी के बारे में ज्यादा नहीं मालूम। इसके बारे में कोई खास चर्चा नहीं होती। हमारे बड़े हमें बताएं तो हमें भी इसकी जानकारी होगी। आजकल की पीढ़ी तो गूगल बाबा को ज्यादा जानती है।
-मोहित विश्वकर्मा, शिवाजी नगर
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मुझे दो पीढ़ियों के बारे में तो पता है। बड़े पापा कई बार पूर्वजों के बारे में बताते हैं, लेकिन इसके अलावा ज्यादा जानकारी नहीं हो पाती है। पितृ पक्ष में ही पता चलता है कि पूर्वजों के लिए पूजा है। लेकिन रीति-रिवाज युवाओं को पता नहीं हो पाते।
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-आस्था, वीरांगना नगर
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बाबा-दादी और नाना-नानी के नाम पता हैं। नानी और दादी पीढ़ियों के बारे में बताती थीं। बाकी आजकल पूर्वजों के बारे में घर के लोग भी बच्चों को नहीं बताते, इससे युवाओं को भी भला जानकारी कहां से होगी। इसमें बच्चों की क्या गलती है।
अवि अग्रवाल, मानिक चौक
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हमारी दादी हमारे दादा-परदादा और उनके पिताजी के बारे में बताती थीं, वही कुछ याद है। इसके अलावा जानकारी नहीं है। लेकिन ये बात सही है कि हम युवाओं को अपनी पीढ़ियों के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए। बड़ों को भी बताना चाहिए।
सुयत तिवारी, झोकन बाग
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मुझे दादा की याद है, उनके बारे में पता है। बाकी पता नहीं। देखा जाए तो आजकल बच्चों को रीति-रिवाजों की ज्यादा जानकारी नहीं है। सब अपनी लाइन में बिजी हैं। मोबाइल के युग में बड़ों के पास भी टाइम नहीं है। ऐसे में युवाओं को भी जानकारी कैसे होगी।
मयंक तिवारी-थापक बाग
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बिगड़ रहा है बच्चों का मनोविज्ञान
आजकल एकल परिवार, माता-पिता दोनों का नौकरी करना और मोबाइल इन तीनों चीजों ने बड़े हो रहे बच्चों के दिल और दिमाग का मनोविज्ञान बिगाड़ दिया है। अकेले बच्चे रिश्तों से दूर हो रहे हैं। उन्हें पूर्वजों के बारे में बताने वाला कोई नहीं है। वे नहीं जानते कि उनके परिवार के रीति-रिवाज क्या हैं। ऐसे में दादा-परदादा या पीढ़ियों के बारे में युवाओं को जानकारी नहीं मिल पाती। वहीं जब कई घरों में पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध आदि कर्म में बच्चों को बैठाया जाता है तो इन बातों की समझ न होने से वह भी दूर भागते हैं।
डॉ. संजीव शर्मा, असिस्टेंट प्रोफेसर-मनोविज्ञान, नेहरू डिग्री कॉलेज, ललितपुर
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पहले संयुक्त परिवार होते थे तो घर के बड़े बच्चों और बहुओं को अपने परिवार और पीढ़ियों के बारे में बताते थे। लेकिन अब बच्चों को परिवार में वो माहौल नहीं मिलता। एडमीशन होते ही बच्चों को डे बोर्डिंग में डाल दिया जाता है। माता-पिता भी बच्चों को समय नहीं दे पाते हैं। ऐसे में बच्चे भी अपने फ्रेंड सर्किल और गूगल की दुनिया में बिजी हो गए हैं। इस स्थिति में बच्चे बाबा का नाम तो बता पाते हैं लेकिन आगे की पीढ़ियों की जानकारी उन्हें नहीं मिल पाती है। पर जरूरी है कि माता-पिता बच्चों को पीढ़ियों, संस्कारों और रीति-रिवाजों के बारे में बताएं।
डॉ. सुरेंद्र नारायण, असिस्टेंट प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, बुंदेलखंड महाविद्यालय
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अपने बाबा का नाम तो हमें पता है, लेकिन उसके पीछे की पीढ़ी के बारे में ज्यादा नहीं मालूम। इसके बारे में कोई खास चर्चा नहीं होती। हमारे बड़े हमें बताएं तो हमें भी इसकी जानकारी होगी। आजकल की पीढ़ी तो गूगल बाबा को ज्यादा जानती है।
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-मोहित विश्वकर्मा, शिवाजी नगर
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मुझे दो पीढ़ियों के बारे में तो पता है। बड़े पापा कई बार पूर्वजों के बारे में बताते हैं, लेकिन इसके अलावा ज्यादा जानकारी नहीं हो पाती है। पितृ पक्ष में ही पता चलता है कि पूर्वजों के लिए पूजा है। लेकिन रीति-रिवाज युवाओं को पता नहीं हो पाते।
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-आस्था, वीरांगना नगर
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बाबा-दादी और नाना-नानी के नाम पता हैं। नानी और दादी पीढ़ियों के बारे में बताती थीं। बाकी आजकल पूर्वजों के बारे में घर के लोग भी बच्चों को नहीं बताते, इससे युवाओं को भी भला जानकारी कहां से होगी। इसमें बच्चों की क्या गलती है।
अवि अग्रवाल, मानिक चौक
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हमारी दादी हमारे दादा-परदादा और उनके पिताजी के बारे में बताती थीं, वही कुछ याद है। इसके अलावा जानकारी नहीं है। लेकिन ये बात सही है कि हम युवाओं को अपनी पीढ़ियों के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए। बड़ों को भी बताना चाहिए।
सुयत तिवारी, झोकन बाग
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मुझे दादा की याद है, उनके बारे में पता है। बाकी पता नहीं। देखा जाए तो आजकल बच्चों को रीति-रिवाजों की ज्यादा जानकारी नहीं है। सब अपनी लाइन में बिजी हैं। मोबाइल के युग में बड़ों के पास भी टाइम नहीं है। ऐसे में युवाओं को भी जानकारी कैसे होगी।
मयंक तिवारी-थापक बाग
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बिगड़ रहा है बच्चों का मनोविज्ञान
आजकल एकल परिवार, माता-पिता दोनों का नौकरी करना और मोबाइल इन तीनों चीजों ने बड़े हो रहे बच्चों के दिल और दिमाग का मनोविज्ञान बिगाड़ दिया है। अकेले बच्चे रिश्तों से दूर हो रहे हैं। उन्हें पूर्वजों के बारे में बताने वाला कोई नहीं है। वे नहीं जानते कि उनके परिवार के रीति-रिवाज क्या हैं। ऐसे में दादा-परदादा या पीढ़ियों के बारे में युवाओं को जानकारी नहीं मिल पाती। वहीं जब कई घरों में पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध आदि कर्म में बच्चों को बैठाया जाता है तो इन बातों की समझ न होने से वह भी दूर भागते हैं।
डॉ. संजीव शर्मा, असिस्टेंट प्रोफेसर-मनोविज्ञान, नेहरू डिग्री कॉलेज, ललितपुर
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पहले संयुक्त परिवार होते थे तो घर के बड़े बच्चों और बहुओं को अपने परिवार और पीढ़ियों के बारे में बताते थे। लेकिन अब बच्चों को परिवार में वो माहौल नहीं मिलता। एडमीशन होते ही बच्चों को डे बोर्डिंग में डाल दिया जाता है। माता-पिता भी बच्चों को समय नहीं दे पाते हैं। ऐसे में बच्चे भी अपने फ्रेंड सर्किल और गूगल की दुनिया में बिजी हो गए हैं। इस स्थिति में बच्चे बाबा का नाम तो बता पाते हैं लेकिन आगे की पीढ़ियों की जानकारी उन्हें नहीं मिल पाती है। पर जरूरी है कि माता-पिता बच्चों को पीढ़ियों, संस्कारों और रीति-रिवाजों के बारे में बताएं।
डॉ. सुरेंद्र नारायण, असिस्टेंट प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, बुंदेलखंड महाविद्यालय