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भूल कर बड़े-बुजुर्गों का प्यार-दुलार...कर रहे तिरस्कार
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झांसी। जीवन में उम्र का आखिरी पड़ाव कुछ ऐसा होता है जहां एक बुजुर्ग बच्चों की तरह परिवार की उंगली थामकर चलना चाहता है। लेकिन कई बुजुर्ग ऐसे हैं जिन्हें कहीं उनके परिवार तो कहीं समाज ने बोझ समझकर सड़कों पर तिल-तिल मरने के लिए छोड़ दिया। शहर में आईटीआई के पास स्थित वृद्धाश्रम में पिछले तीन-चार वर्षों में ऐसे कई बुजुर्ग आश्रम के बाहर मिले जिनमें से किसी को परिवार के लोगों ने ट्रेन में अकेला बैठाकर बेसहारा मरने के लिए छोड़ दिया तो किसी के बच्चे अस्पताल में तड़प रहे अपने बुजुर्ग पिता का चेहरा देखना भी अपनी शान के खिलाफ समझ रहे हैं। मनोवैज्ञानिक डॉ. मनीष का कहना है कि समाज में बुजुर्गों का ऐसा तिरस्कार परिवार में संस्कारों की जड़ें खोखली कर रहा है।
केस-1
सड़क पर छोड़ गए लाचार
झांसी। 75 साल की केसर ठीक से चल फिर नहीं पाती हैं। नगरा की रहने वाली यह महिला बेटी के आत्महत्या करने के बाद मानसिक रूप से परेशान रहने लगीं। वृद्धाश्रम की मानें तो बेटी के अलावा इनका कोई नहीं था। उसकी मौत के कुछ दिन बाद दामाद वृद्धाश्रम के बाहर छोड़ गया।
केस-2
ऑपरेशन के दर्द से नहीं, बेटों के दिए गम से कराहते हैं
झांसी। शहर के रहने वाले 75 साल के रामेश्वर तीन साल पहले वृद्धाश्रम आए थे। कारोबार और मकान हैं। बेटे भी हैं। पर बुढ़ापे में कोई उन्हें देखना भी नहीं चाहता। वृद्धाश्रम प्रबंधन का कहना है कि रामेश्वर को गॉल ब्लाइडर में पथरी थी। कुछ पहले उन्हें असहनीय दर्द हुआ। बेटों को सूचना दी लेकिन कोई नहीं आया। आश्रम की ओर से उन्हें मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया। वहां उनकी जान बचाने के लिए डॉक्टरों ने गॉल ब्लाइडर निकाल दिया। ऑपरेशन के बाद बेटों से संपर्क किया गया तो भी कोई नहीं पहुंचा। मंगलवार को डॉक्टरों ने उन्हें डिस्चार्ज दिया, लेकिन बेटों से मिलने की चाह में वह दर्द से कम और अपने गम से ज्यादा कराहते रहे।
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केस-3
बुजुर्ग का पैर सड़ रहा, बेटा देखना नहीं चाहता शक्ल
झांसी। 77 साल के तुलसीदास तालपुरा के रहने वाले हैं। 10 दिनों से जिला अस्पताल के सर्जिकल वार्ड में भर्ती हैं। चार साल से वृद्धाश्रम में रह रहे। कुछ माह पहले एक दिन बेटे से मिलने की इच्छा हुई तो खुद को रोक नहीं पाए और अपने घर चले गए। शाम को ही बेटा उन्हें गाड़ी पर बैठाकर दोबारा वृद्धाश्रम के गेट पर छोड़ गया। जल्दबाजी में गाड़ी से गिर गए लेकिन बेटे ने पलट कर भी नहीं देखा। उनके कूल्हे और पैर में गंभीर चोट आई। अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। अब उनका पैर सड़ने की स्थिति में है। वृद्धाश्रम वालों की मानें तो डॉक्टर पैर काटने को कह रहे हैं। वह कहते हैं कि अंतिम समय में मुझे मेरे बेटे के पास पहुंचा देना लेकिन बेटा कहता है कि मैं उन्हें देखना नहीं चाहता।
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बाल विधवा को सड़क पर छोड़कर चले गए
केस-4
झांसी। 75 साल की काशीबाई बाल विधवा हैं। एक साल पहले कुछ लोग उन्हें वृद्धाश्रम के बाहर छोड़ गए थे। वह पूछने पर बताती हैं कि शादी के एक साल बाद ही पति की मौत हो गई। बाल-बच्चे भी नहीं हुए। कुछ दिन मां-बाप के साथ रहीं। लेकिन उनकी मौत के बाद वह असहाय हो गईं। भाई-भतीजों ने भी कोई मोह नहीं रखा तो बुढ़ापे में सब छोड़ गए।
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केस-5
बुजुर्ग पिता के लिए घर में नहीं जगह
झांसी। शहर के ही रहने वाले 70 साल के मुमताज खान को उनका बेटा वृद्धाश्रम के बाहर छोड़ गया था। वह दो-दो बैसाखी के सहारे भी चल नहीं पा रहे थे। वृद्धाश्रम के लोग किसी तरह उन्हें पकड़कर अंदर लेकर आए थे। मुमताज कहते हैं कि घर में बेटा पत्नी व अपने बच्चों के साथ रहता है लेकिन उनके लिए जगह नहीं है। वह एक साल से आश्रम में हैं। आश्रम के सह प्रबंधक प्रमोद शर्मा बताते हैं मुमताज बेटे को याद कर रोते हैं।
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ट्रेन में बैठाकर बेसहारा छोड़ गए घरवाले
केस-6
झांसी। तकरीबन 70 साल की महिला शकुंतला को उनके परिवार वाले ट्रेन में बेसहारा छोड़ गए। वह कहां की रहने वाली हैं? शकुंतला ये सब बता नहीं पाती हैं। बस इतना बताती हैं कि परिवार के लोग उन्हें ट्रेन में बैठाकर चले गए। वृद्धाश्रम की प्रबंधक अनुराधा चौहान बताती हैं कि बुजुर्ग महिला सड़क पर असहाय मिलीं तो एक संस्था की सदस्य इन्हें आश्रम में छोड़ गई थीं। उस वक्त उनकी हालत बेहद खराब थी, वह चलने-फिरने में लाचार थीं।
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केस-1
सड़क पर छोड़ गए लाचार
झांसी। 75 साल की केसर ठीक से चल फिर नहीं पाती हैं। नगरा की रहने वाली यह महिला बेटी के आत्महत्या करने के बाद मानसिक रूप से परेशान रहने लगीं। वृद्धाश्रम की मानें तो बेटी के अलावा इनका कोई नहीं था। उसकी मौत के कुछ दिन बाद दामाद वृद्धाश्रम के बाहर छोड़ गया।
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केस-2
ऑपरेशन के दर्द से नहीं, बेटों के दिए गम से कराहते हैं
झांसी। शहर के रहने वाले 75 साल के रामेश्वर तीन साल पहले वृद्धाश्रम आए थे। कारोबार और मकान हैं। बेटे भी हैं। पर बुढ़ापे में कोई उन्हें देखना भी नहीं चाहता। वृद्धाश्रम प्रबंधन का कहना है कि रामेश्वर को गॉल ब्लाइडर में पथरी थी। कुछ पहले उन्हें असहनीय दर्द हुआ। बेटों को सूचना दी लेकिन कोई नहीं आया। आश्रम की ओर से उन्हें मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया। वहां उनकी जान बचाने के लिए डॉक्टरों ने गॉल ब्लाइडर निकाल दिया। ऑपरेशन के बाद बेटों से संपर्क किया गया तो भी कोई नहीं पहुंचा। मंगलवार को डॉक्टरों ने उन्हें डिस्चार्ज दिया, लेकिन बेटों से मिलने की चाह में वह दर्द से कम और अपने गम से ज्यादा कराहते रहे।
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केस-3
बुजुर्ग का पैर सड़ रहा, बेटा देखना नहीं चाहता शक्ल
झांसी। 77 साल के तुलसीदास तालपुरा के रहने वाले हैं। 10 दिनों से जिला अस्पताल के सर्जिकल वार्ड में भर्ती हैं। चार साल से वृद्धाश्रम में रह रहे। कुछ माह पहले एक दिन बेटे से मिलने की इच्छा हुई तो खुद को रोक नहीं पाए और अपने घर चले गए। शाम को ही बेटा उन्हें गाड़ी पर बैठाकर दोबारा वृद्धाश्रम के गेट पर छोड़ गया। जल्दबाजी में गाड़ी से गिर गए लेकिन बेटे ने पलट कर भी नहीं देखा। उनके कूल्हे और पैर में गंभीर चोट आई। अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। अब उनका पैर सड़ने की स्थिति में है। वृद्धाश्रम वालों की मानें तो डॉक्टर पैर काटने को कह रहे हैं। वह कहते हैं कि अंतिम समय में मुझे मेरे बेटे के पास पहुंचा देना लेकिन बेटा कहता है कि मैं उन्हें देखना नहीं चाहता।
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बाल विधवा को सड़क पर छोड़कर चले गए
केस-4
झांसी। 75 साल की काशीबाई बाल विधवा हैं। एक साल पहले कुछ लोग उन्हें वृद्धाश्रम के बाहर छोड़ गए थे। वह पूछने पर बताती हैं कि शादी के एक साल बाद ही पति की मौत हो गई। बाल-बच्चे भी नहीं हुए। कुछ दिन मां-बाप के साथ रहीं। लेकिन उनकी मौत के बाद वह असहाय हो गईं। भाई-भतीजों ने भी कोई मोह नहीं रखा तो बुढ़ापे में सब छोड़ गए।
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केस-5
बुजुर्ग पिता के लिए घर में नहीं जगह
झांसी। शहर के ही रहने वाले 70 साल के मुमताज खान को उनका बेटा वृद्धाश्रम के बाहर छोड़ गया था। वह दो-दो बैसाखी के सहारे भी चल नहीं पा रहे थे। वृद्धाश्रम के लोग किसी तरह उन्हें पकड़कर अंदर लेकर आए थे। मुमताज कहते हैं कि घर में बेटा पत्नी व अपने बच्चों के साथ रहता है लेकिन उनके लिए जगह नहीं है। वह एक साल से आश्रम में हैं। आश्रम के सह प्रबंधक प्रमोद शर्मा बताते हैं मुमताज बेटे को याद कर रोते हैं।
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ट्रेन में बैठाकर बेसहारा छोड़ गए घरवाले
केस-6
झांसी। तकरीबन 70 साल की महिला शकुंतला को उनके परिवार वाले ट्रेन में बेसहारा छोड़ गए। वह कहां की रहने वाली हैं? शकुंतला ये सब बता नहीं पाती हैं। बस इतना बताती हैं कि परिवार के लोग उन्हें ट्रेन में बैठाकर चले गए। वृद्धाश्रम की प्रबंधक अनुराधा चौहान बताती हैं कि बुजुर्ग महिला सड़क पर असहाय मिलीं तो एक संस्था की सदस्य इन्हें आश्रम में छोड़ गई थीं। उस वक्त उनकी हालत बेहद खराब थी, वह चलने-फिरने में लाचार थीं।