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बुंदेलखंड में तेज हुआ फसलों पर वायरस का हमला, 15 फीसदी की दर से बढ़ रही हैं बीमारियां
Fri, 04 Sep 2020 12:18 AM IST
झांसी ब्यूरो
अमर उजाला नेटवर्क, झांसी
अमर उजाला नेटवर्क, झांसी
Published by: झांसी ब्यूरो
Updated Fri, 04 Sep 2020 12:18 AM IST
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- फोटो : अमर उजाला
बुंदेलखंड में किसान सिर्फ मौसम एवं अतिवृष्टि से ही तबाह नहीं हो रहा बल्कि वायरस भी उसकी फसल को तेजी से निशाना बना रहे हैं। एक बार पहुंचने के बाद खेत में वर्षों इनका ठिकाना हो जाता है। तक तक उस खेत से कोई उपज नहीं मिलती। एक अनुमान के मुताबिक बुंदेलखंड में फसलों में वायरस जनित बीमारियां करीब पंद्रह फीसदी सालाना की दर से बढ़ रही है।
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बुंदेलखंड के झांसी, ललितपुर, महोबा, जालौन आदि इलाकों में वातावरण के लिहाज से आधा दर्जन वायरस जनित बीमारियां फसलों को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाती हैं। इनमें सबसे अधिक घातक पीली चित्ती का रोग है, जो यैलोमोजेक नामक वायरस से फैल रहा है। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक मूंग, उर्द, मूंगफली की फसल को यह सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। खास तौर से चिरगांव, मऊरानीपुर, गुरसराय, बड़ागांव इलाके में किसान इससे सबसे अधिक परेशान हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक वायरस के चलते फसल पीली पड़कर खराब होने लगती है। इससे उपज नहीं मिलती। कीटों के जरिए आसपास के खेतों तक भी यह वायरस आसानी से पहुंच जाता है। इसी तरह रोजक नामक वायरस भी मूंगफली का नुकसान पहुंचाता है।
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इन वायरस की खासियत यह है कि खेतों में सालों-साल ठिकाना बनाए रखते हैं लेकिन, सिर्फ खरीफ की फसल के समय ही सक्रिय होते हैं। सिर्फ मूंगफली, उर्द जैसी फसल को ही अपना निशाना बनाते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक करीब पांच वर्ष तक इनका जीवन काल होता है। खेत में रोपाई होने के बाद वायरस उसको नष्ट करने मेें जुट जाता है। एक खेत से दूसरे खेत में इसे पहुंचने मे अधिक समय नहीं लगता। जब तक किसान समझ पाते हैं, तब तक नुकसान हो चुका होता है। इन दिनों चिरगांव, बड़ागांव आदि इलाकों में इसका प्रकोप देखने को मिल रहा है। इसी तरह सब्जियों में वेमेसिया टेबिकाई नामक वायरस लीव कर्व नामक बीमारी पैदा करता है। इससे भी उत्पादन खत्म हो जाता है। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक बुंदेलखंड के वातावरण को देखते हुए यह वायरस यहां काफी तेजी से पैठ बना रहा है। करीब दस फीसदी की दर से यह बीमारी लगातार बढ़ रही है। कोरोना वायरस की तरह ही इससे निपटने के लिए भी अभी तक कोई कीटनाशक प्रभावी नहीं हो सका लेकिन, कुछ उपाय करके इसके नुकसान को कम किया जा सकता है।
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वायरस पर कीटनाशकों का प्रभाव नहीं
कोरोना वायरस की तरह ही इस वायरस से निपटने के लिए भी कोई सटीक कीटनाशक कृषि विभाग के पास नहीं है। डाईमोथोएट का छिड़काव करके इसके प्रभाव को कम करने की कोशिश की जाती है लेकिन, इससे शत प्रतिशत उपचार नहीं होता।
पांच साल तक नहीं होती उपज
यह वायरस जिस खेत में ठिकाना बना लेते हैं वहां, अपने न्यूनतम जीवनकाल करीब पांच वर्ष तक जमे रहते हैं। इस बीच यह वायरस हर खरीफ सीजन में लगने वाली फसल को नष्ट कर देते हैं। अगर खेत में खरीफ की जगह दूसरी फसल की बुवाई हो तभी उनकी फसल बच सकती है।
वायरस से लड़ने में प्रतिरोधक प्रजातियां कारगर
फसलों को इस वायरस से बचाने के लिए कृषि रक्षा विभाग की ओर से कई प्रजातियां सुझाई जाती हैं। जिला कृषि रक्षा अधिकारी विवेक कुुमार के मुताबिक इन वायरस की प्रतिरोधक प्रजातियों के तौर पर मूंग के लिए एमएल-5, उर्द के लिए पंत यू-30 आदि लगाकर बचाव किया जा सकता है लेकिन, फिर भी इनको खत्म होने में दो साल से अधिक का समय लग सकता है।
समय पर रोग की पहचान कर लेना ही इससे सबसे बड़ा बचाव है। शुरू में ही पौधे को उखाड़कर जला देने से वायरस खत्म हो सकता है। जहां भी वायरस का प्रभाव मालूम चलता है वहां हमारी ओर से टीम भेजी जाती है। इससे कितनी फसल खराब हुई, इसका कोई सर्वे नहीं किया गया है।- विवेक कुमार , जिला कृषि रक्षा अधिकारी