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नाल की जांच से पता चल सकता है बच्चे को तीन दिनों में होने वाला संक्रमण
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झांसी। ओरछा में हुए बाल रोग विशेषज्ञों के दो दिवसीय प्रदेश स्तरीय सम्मेलन में गाजियाबाद से आए डॉ. प्रभु मुनीरत्नम ने कहा कि जन्म के बाद बच्चे की नाल के रक्त की जांच कराकर आगामी तीन दिनों (72 घंटे) में उसे मां से होने वाले संक्रमण के बारे में पता लग सकता है। इससे शिशु मृत्युदर में भी कमी लाई जा सकती है, क्योंकि संक्रमण ही नवजात की मृत्यु का एक अहम कारण होता है।
उन्होंने बताया कि गाजियाबाद में सौ नवजात शिशुओं पर किए गए शोध में ये बात सामने आई है। अभी भारत में नाल के रक्त की जांच बहुत कम अस्पतालों में कराई जाती है। वहीं, बरेली के डॉ. अतुल अग्रवाल ने बताया कि कोरोना की वजह से बच्चों का नियमित टीकाकरण प्रभावित हुआ है। इस वजह से बच्चों में काली खांसी के मामले काफी बढ़ गए हैं। वहीं, एशियाई देशों में पोलियो के केस भी बढ़े हैं। इसलिए अब टीकाकरण पर बहुत ज्यादा फोकस है। उन्होंने बताया कि काली खांसी जीवाणु का संक्रमण होता है, जो कि शुरू में नाक और गले को प्रभावित करता है। ये प्राय: दो साल से कम आयु के बच्चों की श्वसन प्रणाली को प्रभावित करता है। काली खांसी दस सप्ताह तक रह सकती है और इससे निमोनिया व अन्य जटिलताएं हो सकती हैं। मुरादाबाद के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. गिरीश अग्रवाल ने ग्रोथ हार्मोन को लेकर अहम जानकारी दी। बताया कि हार्मोन की कमी समेत अन्य कारणों से बच्चों की लंबाई नहीं बढ़ पाती है। यदि शुरूआती दो-तीन सालों में ही इसकी जानकारी हो जाए तो ग्रोथ हार्मोन थेरेपी के जरिए बच्चा औसत लंबाई तक पहुंच सकता है। वहीं, दस साल की आयु या इसके बाद ये थेरेपी कारगर साबित नहीं होती है। बमुश्किल बच्चे की लंबाई एक इंच बढ़ जाती है। जबकि, थेरेपी में सात से आठ लाख रुपये खर्च भी हो जाते हैं। यूके से आए डॉ. राहुल भरत ने बच्चों में मिर्गी की बीमारी गंभीर होने पर सावधानी और इलाज के बारे में बताया। कनाडा से आए डॉ. विनय कुकरेती ने वर्कशॉप आयोजित करके एसएनसीयू, पीआईसीयू में नवजात के इलाज को लेकर अहम जानकारी दी। आयोजन सचिव डॉ. ओमशंकर चौरसिया ने बताया कि सम्मेलन में 70 शोधपत्र प्रस्तुत किए गए। डॉक्टरों ने कई अहम जानकारियां साझा कीं। इस दौरान आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. प्रमोद गुप्ता, डॉ. जीएस चौधरी, डॉ. अनिल कौशिक, डॉ. आरएस सेठी, डॉ. कंवलप्रीत छाबड़ा, डॉ. तरनप्रीत भुसारी, डॉ. अनुज सेठी, डॉ. सपना गुप्ता, डॉ. अरुण गुप्ता, डॉ. शालू गुप्ता, डॉ. धीरेंद्र गुप्ता, डॉ. प्रमोद गुलाटी, प्रदीप श्रीवास्तव मौजूद रहे।
बच्चा ऐसा नहीं कर रहा तो डॉक्टर को दिखाएं
- तीन से पांच महीने में गर्दन सधने लगे
- छह से आठ माह में बैठना शुरू कर दे
- एक साल में खड़ा होने लगे
- 13 महीने में एक कदम बढ़ाने लगे
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उन्होंने बताया कि गाजियाबाद में सौ नवजात शिशुओं पर किए गए शोध में ये बात सामने आई है। अभी भारत में नाल के रक्त की जांच बहुत कम अस्पतालों में कराई जाती है। वहीं, बरेली के डॉ. अतुल अग्रवाल ने बताया कि कोरोना की वजह से बच्चों का नियमित टीकाकरण प्रभावित हुआ है। इस वजह से बच्चों में काली खांसी के मामले काफी बढ़ गए हैं। वहीं, एशियाई देशों में पोलियो के केस भी बढ़े हैं। इसलिए अब टीकाकरण पर बहुत ज्यादा फोकस है। उन्होंने बताया कि काली खांसी जीवाणु का संक्रमण होता है, जो कि शुरू में नाक और गले को प्रभावित करता है। ये प्राय: दो साल से कम आयु के बच्चों की श्वसन प्रणाली को प्रभावित करता है। काली खांसी दस सप्ताह तक रह सकती है और इससे निमोनिया व अन्य जटिलताएं हो सकती हैं। मुरादाबाद के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. गिरीश अग्रवाल ने ग्रोथ हार्मोन को लेकर अहम जानकारी दी। बताया कि हार्मोन की कमी समेत अन्य कारणों से बच्चों की लंबाई नहीं बढ़ पाती है। यदि शुरूआती दो-तीन सालों में ही इसकी जानकारी हो जाए तो ग्रोथ हार्मोन थेरेपी के जरिए बच्चा औसत लंबाई तक पहुंच सकता है। वहीं, दस साल की आयु या इसके बाद ये थेरेपी कारगर साबित नहीं होती है। बमुश्किल बच्चे की लंबाई एक इंच बढ़ जाती है। जबकि, थेरेपी में सात से आठ लाख रुपये खर्च भी हो जाते हैं। यूके से आए डॉ. राहुल भरत ने बच्चों में मिर्गी की बीमारी गंभीर होने पर सावधानी और इलाज के बारे में बताया। कनाडा से आए डॉ. विनय कुकरेती ने वर्कशॉप आयोजित करके एसएनसीयू, पीआईसीयू में नवजात के इलाज को लेकर अहम जानकारी दी। आयोजन सचिव डॉ. ओमशंकर चौरसिया ने बताया कि सम्मेलन में 70 शोधपत्र प्रस्तुत किए गए। डॉक्टरों ने कई अहम जानकारियां साझा कीं। इस दौरान आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. प्रमोद गुप्ता, डॉ. जीएस चौधरी, डॉ. अनिल कौशिक, डॉ. आरएस सेठी, डॉ. कंवलप्रीत छाबड़ा, डॉ. तरनप्रीत भुसारी, डॉ. अनुज सेठी, डॉ. सपना गुप्ता, डॉ. अरुण गुप्ता, डॉ. शालू गुप्ता, डॉ. धीरेंद्र गुप्ता, डॉ. प्रमोद गुलाटी, प्रदीप श्रीवास्तव मौजूद रहे।
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बच्चा ऐसा नहीं कर रहा तो डॉक्टर को दिखाएं
- तीन से पांच महीने में गर्दन सधने लगे
- छह से आठ माह में बैठना शुरू कर दे
- एक साल में खड़ा होने लगे
- 13 महीने में एक कदम बढ़ाने लगे