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कुल्हाड़ियों से शरीर का एक-एक अंग काटा जा रहा था फिर भी नारायण दास लगा रहे थे भारत मां का जयकारा

Thu, 05 Aug 2021 01:09 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Thu, 05 Aug 2021 01:09 AM IST
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Every part of the body was being cut with axes, yet Narayan Das was praising Mother India
झांसी। शरीर का एक-एक अंग काटकर अलग किया जा रहा था, इसके बाद भी स्वतंत्रता संग्राम के रणबांकुरे नारायण दास खरे भारत माता की जय का उद्घोष कर रहे थे। टीकमगढ़ जिले के बड़ागांव के पास स्थित नरौैसा नाला पर सामंतों ने कुल्हाड़ियों से काटकर उनकी उस समय हत्या कर दी थी जब वह रात के समय बड़ागांव में रियासतों के विलीनीकरण आंदोलन के सत्याग्रहियों की सभा को संबोधित करके टीकमगढ़ की ओर साइकिल से आ रहे थे। उनके शव को एक बोरे में बंद करके नरौसा नाले में फेंक दिया था, जिसे सुबह चरवाहों ने देखकर उनके परिजनों और सत्याग्रहियों को सूचना दी थी। यूं तो उन्हें स्वतंत्रता संग्राम के दौैरान कई बार अंग्रेज सरकार की लाठियां खाना पड़ीं तथा जेल भी जाना पड़ा। आजादी के बाद जब उन्होंने अंग्रेजों की हिमायती रहीं रियासतों के विलीनीकरण का आंदोलन चलाया तो एक दिसंबर 1947 को उनकी हत्या कर दी गई।
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स्वतंत्रता संग्राम का आंदोलन चलाने पर पीटकर ओरछा स्टेट से निकाले गए थे खरे
उत्तरप्रदेश के पूर्व वित्तमंत्री एवं स्वतंत्रता संग्राम से ताल्लुक रखने वाले परिवार से संबंध रखने वाले ओमप्रकाश रिछारिया बताते हैं कि बात उन दिनों की है जब स्वतंत्रता आंदोलन अपने चरमोत्कर्ष पर था। झांसी को छोड़कर आसपास की अन्य रियासतों का अंग्रेज सरकार को मूक समर्थन था। 1857 की क्रांति के बाद झांसी रियासत के साथ अंग्रेजों ने जो किया उससे बुंदेलखंड की रियासतों के राजा महाराजा सहमे हुए थे। झांसी में भले ही क्रांतिकारी गतिविधियां चल रहीं थीं, पर बुंदेलखंड की पड़ोसी रियासतों पर अंग्रेजी कंपनी सरकार का इस बात का दबाव था कि किसी भी कीमत पर सत्याग्रहियों का झंडा आंदोलन संचालित नहीं होना चाहिए। 14 फरवरी 1918 को बुंदेलखंड के दैलवारा गांव में जन्मे नारायण दास खरे एक ऐसे क्रांतिकारी थे जिनकी मुलाकात कई बार महात्मा गांधी से हुई तथा उन्हीं से प्रेरित होकर 1937 में टीकमगढ़ (ओरछा रियासत में) उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के सत्याग्रहियों का पहला झंडा आंदोलन शुरू किया। यह न केवल अंग्रेज सरकार को बल्कि रियासत को भी नागवार गुजरा। नारायण दास खरे की जमकर पिटाई की गई और उन्हें ओरछा स्टेट से निष्कासित कर दिया गया। यहां से जाने के बाद उन्होंने 1938 में टोड़ीफतेहपुर रियासत में भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को एकत्र करके झंडा आंदोलन किया तो अंग्रेज सरकार ने उन्हें गिरफ्तार करके छह माह के कारावास की सजा सुनाई। इस दौरान उन्हें झांसी व इलाहाबाद की जेल में रखा गया।
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रियासतों के खिलाफ आंदोलन बना हत्या का कारण
इतिहास के प्रोफेसर डा. अजय सिंह कुशवाहा बताते हैं कि कंपनी सरकार के साथ अंदरूनी समझौता करके स्वतंत्रता आंदोलन को दबाने वाली रियासतों के कर्ताधर्ता नारायण दास खरे से जहां इस बात से नाराज थे कि उनकी स्टेट में स्वतंत्रता आंदोलन को हवा दी थी, वहीं आजादी के बाद वह सत्याग्रहियों के बीच जाकर रियासतों के विलीनीकरण को लेकर आंदोलन चला रहे थे। कंपनी सरकार भले ही जा चुकी थी पर उसके कारिंदे और सामंत अब भी मौजूद थे।
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उन दिनों नारायण दास खरे लोगों को जागरूक करने के लिए साइकिल से दूर-दूर के गांवों तक जाते थे। लोगों को एकत्र करके उन्हें रियासतों के विलीनीकरण के आंदोलन के प्रति जागरूक करते थे। 1 दिसंबर 1947 को वह टीकमगढ़ (ओरछा स्टेट) के गांव बड़ागांव में सत्याग्रहियों की सभा को संबोधित करने गए थे। उस समय उनकी उम्र महज तीस साल थी, जोश से लवरेज नारायण ने रियासतों का विलय करने की वकालत कर इसके लिए आंदोलन चलाने को कहा। यह उनकी आखिरी सभा साबित हुई। बड़ागांव के निकट नरौसा नाला के पास पहले से घात लगाए बैठे सामंतों ने रात के अंधेरे में साइकिल से जा रहे युवा नारायण दास खरे को रोककर कुल्हाड़ियों से उनका एक-एक अंग काटा, वह भारत माता की जय का उद्घोष करते हुए शहीद हो गए। उनके शरीर के अंगों को बोरे में भरकर हत्यारों ने नाले में फेंक दिया। आजाद भारत में उनकी पत्नी को सरकार द्वारा 150 रुपये प्रतिमाह सम्मान निधि दी जाती रही। एक लंबे समय बाद मध्यप्रदेश की सरकार को सुध आई तथा उसने टीकमगढ़ जिले में अमर शहीद नारायण दास खरे की प्रतिमा स्थापित की, जिसका अनावरण मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किया था।
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