{"_id":"60f872568ebc3e6d9f080988","slug":"every-hour-it-was-said-that-there-is-no-oxygen-take-your-patient-from-the-hospital-jhansi-news-jhs2000895149","type":"story","status":"publish","title_hn":"हर घंटे कहा जाता था ऑक्सीजन नहीं है, अस्पताल से ले जाइए अपने मरीज को","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हर घंटे कहा जाता था ऑक्सीजन नहीं है, अस्पताल से ले जाइए अपने मरीज को
विज्ञापन
झांसी। उद्यमी मनीष वर्मा की रूह वक्त के उस सबसे बुरे मंजर को याद कर आज भी कांप उठती है। पहले दादी को खोया और उसके पांच दिन बाद मां की सांसों की डोर टूट गई। पानी की तरह पैसा बहाने के बाद भी वे हाथ मलते ही रह गए। आलम ये था कि अस्पताल से हर घंटे कहा जाता था कि ऑक्सीजन नहीं है, मरीज को ले जाइए, लेकिन लेकर जाते कहां, हर ओर यही हाल था।
बीकेडी के पास रहने वाले मनीष ने बताया कि कोरोना पॉजिटिव रिपोर्ट आने के बाद उनकी दादी को सरकारी एंबुलेंस से पैरा मेडिकल कॉलेज जाया गया था। उस वक्त उनका ऑक्सीजन लेवल 64-65 के इर्दगिर्द था। लेकिन, वहां ऑक्सीजन की कोई व्यवस्था नहीं थी। जबकि, दादी की सांसें अटक रहीं थीं। पैरा मेडिकल कॉलेज से उन्हें रेलवे हॉस्टिल रेफर कर दिया गया। रेलवे अस्पताल पहुंचने पर वहां के स्टाफ ने साफ मना कर दिया कि उनके पास कोई व्यवस्था नहीं है। इस दरम्यान अस्पताल स्टाफ से भर्ती करने की विनती की, जहां संभावना नजर आई, वहां फोन किए, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। थर हारकर दादी को मेडिकल कॉलेज लेकर पहुंचे। यहां उनकी सांसों की डोर टूट गई। मनीष बताते हैं कि दादी का अंतिम संस्कार करके लौटे ही थे कि मां की हालत बिगड़ गई। बड़ी मुश्किल से उन्हें शहर के एक प्रतिष्ठित निजी अस्पताल में दाखिल कराया था। अस्पताल से हर घंटे फोन आता था ऑक्सीजन नहीं है, मरीज को ले जाइए। आखिर लेकर जाते भी तो कहां, हर ओर यही हाल मचा था। दादी की मौत के पांच दिन बाद मां भी चल बसीं।
अस्पताल के दरवाजे पर गाड़ी में ही तोड़ दिया था दम
झांसी। बड़ाबाजार निवासी तरुण भटनागर के छतरपुर में रहने वाले बहनोई की कोरोना वायरस के संक्रमण की चपेट में आने से हालत बिगड़ गई थी। उन्होंने जिला अस्पताल में भर्ती कराने का प्रबंध कर बहनोई को 25 अप्रैल को झांसी बुला लिया था। लेकिन, अस्पताल में पहुंचने पर उन्हें दाखिल करने से साफ मना कर दिया गया। बहनोई की लगातार सांसें फूलती जा रहीं थीं। तरुण सीएमओ से लेकर सभी हेल्पलाइन नंबरों पर मदद मांग रहे थे। लेकिन, कहीं से कोई उम्मीद की किरण नहीं जग रही थी। आखिरकार ऑक्सीजन की कमी की वजह से गाड़ी में ही उनकी मौत हो गई थी।
विज्ञापन
विज्ञापन
बीकेडी के पास रहने वाले मनीष ने बताया कि कोरोना पॉजिटिव रिपोर्ट आने के बाद उनकी दादी को सरकारी एंबुलेंस से पैरा मेडिकल कॉलेज जाया गया था। उस वक्त उनका ऑक्सीजन लेवल 64-65 के इर्दगिर्द था। लेकिन, वहां ऑक्सीजन की कोई व्यवस्था नहीं थी। जबकि, दादी की सांसें अटक रहीं थीं। पैरा मेडिकल कॉलेज से उन्हें रेलवे हॉस्टिल रेफर कर दिया गया। रेलवे अस्पताल पहुंचने पर वहां के स्टाफ ने साफ मना कर दिया कि उनके पास कोई व्यवस्था नहीं है। इस दरम्यान अस्पताल स्टाफ से भर्ती करने की विनती की, जहां संभावना नजर आई, वहां फोन किए, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। थर हारकर दादी को मेडिकल कॉलेज लेकर पहुंचे। यहां उनकी सांसों की डोर टूट गई। मनीष बताते हैं कि दादी का अंतिम संस्कार करके लौटे ही थे कि मां की हालत बिगड़ गई। बड़ी मुश्किल से उन्हें शहर के एक प्रतिष्ठित निजी अस्पताल में दाखिल कराया था। अस्पताल से हर घंटे फोन आता था ऑक्सीजन नहीं है, मरीज को ले जाइए। आखिर लेकर जाते भी तो कहां, हर ओर यही हाल मचा था। दादी की मौत के पांच दिन बाद मां भी चल बसीं।
विज्ञापन
अस्पताल के दरवाजे पर गाड़ी में ही तोड़ दिया था दम
झांसी। बड़ाबाजार निवासी तरुण भटनागर के छतरपुर में रहने वाले बहनोई की कोरोना वायरस के संक्रमण की चपेट में आने से हालत बिगड़ गई थी। उन्होंने जिला अस्पताल में भर्ती कराने का प्रबंध कर बहनोई को 25 अप्रैल को झांसी बुला लिया था। लेकिन, अस्पताल में पहुंचने पर उन्हें दाखिल करने से साफ मना कर दिया गया। बहनोई की लगातार सांसें फूलती जा रहीं थीं। तरुण सीएमओ से लेकर सभी हेल्पलाइन नंबरों पर मदद मांग रहे थे। लेकिन, कहीं से कोई उम्मीद की किरण नहीं जग रही थी। आखिरकार ऑक्सीजन की कमी की वजह से गाड़ी में ही उनकी मौत हो गई थी।
विज्ञापन